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रामहिं केवल प्रेमु पिआरा

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जब भगवान चित्रकूट में वास करने लगे,उस समय देवता, नाग, किन्नर, दिक्पाल, चित्रकूट में आये, भगवान ने प्रणाम किया उन्होंने अपने दुःख सुनाये और दुखो का आश्वासन पाकर अपने पुण्यो का फल लेकर अपने-अपने स्थानों पर चले गए.इसी प्रकार से मुनि मंडल आये है. अपनी साधना का फल,भजन का फल राम दर्शन लेकर चले गए.


फिर कोल-भील आये है खाली हाथ नहीं आये है,दोनों में कन्द मूल फल भर-भर कर चले है,ऐसे चले है मानो दरिद्र सोना लूटने चले है.भगवान ने जो दूर से देखा, तो बड़े प्रसन्न हो गए सोच रहे है जो भी आता है फल मांगने आता है- ये कौन आ रहे है? जो फल लेने नहीं, देने आ रहे है. भीलो ने भेट तो भगवान के आगे रख दी, और अत्यंत अनुराग के साथ एकटक प्रभु को देख रहे है, नेत्रो में प्रेमाश्रुओं के जल की बाढ़ आ रही हो.


भगवान ने जितना सम्मान देवताओ और मुनियों का नहीं किया, उतना सम्मान भगवान उन अनपढ़,अशिक्षित भीलो को दिया है,भीलो ने भगवान से कहा- प्रभु! आपने चरणों का दर्शन पाकर अब हम सब सनाथ हो गए, जो वेदों के वचन और मुनियों के मन को भी अगम है, वे करुणा के धाम प्रभु उन भीलो के वचन इस तरह सुन रहे है जैसे पिता बालको के वचन सुनता है.

                                           रामहिं केवल प्रेमु पिआरा,जानि लेउ जो जाननिहारा
 
अर्थात - भगवान को केवल प्रेम प्यारा है.जो ये बात जानना चाहता है वह जान लेता है. उन भीलो ने भगवान से कुछ माँगा नहीं,  

जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।

बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु

भावार्थ:-
जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिए और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मन में निरंतर निवास कीजिए, वह आपका अपना घर है.

इसलिए संत कहते है भगवान से मांगो मत ये बिलकुल वैसा ही है जैसे मान लो किसी घर में दो बच्चे है.एक बड़ा बच्चा है एक छोटा बच्चा है बड़ा बच्चा अपने आप लेकर कभी खाता नही,और छोटा बच्चा स्वयं रसोई घर में जाकर अपने हाथ से ले लेकर खाता है. 

अब यदि परिवार के लोग चिंता करेगे तो किस बच्चे की ज्यादा करेगे? जाहिर है बड़े बच्चे की ज्यादा करेगे,क्योकि उन्हें पता है छोटा तो स्वयं लेकर खा लेता है.परन्तु बड़ा ऐसा नहीं करता,उसे मानकर खिलाना पडता है नहीं तो वह भूखा रह जायेगा.

बस इसी तरह भगवान है यदि हम उनसे मांगते ही रहेगे तो वे हमारी इतनी चिंता नहीं करगे,क्योकि उन्हें पता है इसको जिस चीज की जरुरत होगी ये तुरंत माग लेता है.और जो भक्त माँगता नहीं है भगवान उसकी ज्यादा चिंता करते है,कि ये तो कुछ माँगता नहीं मुझे स्वयं ही इसे देना पड़ेगा तभी लेगा. 
 
भगवान श्री राम ने सभी को सबकुछ दिया विभीषण को लंका का पद दिया सुग्रीव को किष्किन्धा का पद दिया,सबको दिया,परन्तु हनुमान जी को नहीं दिया.भगवान को मालूम था हनुमान जी नहीं मांगेगे,इसलिए भगवान ने स्वयं हनुमान जी से कहा - हनुमान मैंने सबको दिया पर तुमने कुछ नहीं माँगा मै जानता हूँ तुम नहीं माँगोगे इसलिए मै स्वयं तुमसे पूछता हूँ तुम्हे क्या चाहिये?

हनुमाना जी भगवान के चरण पकड़कर बोले -  प्रभु! जितने पद है वे तो आप सबको दे दीजिये, लंका का पद,किष्किन्धा का पद,पर मुझे तो अपने दोनों पद दे दीजिये,बस और कुछ नहीं चाहिये.


 
DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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