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जिनके कान समुद्र है वहाँ निवास कीजिये

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वाल्मीकि जी भगवान राम को एक एक स्थान बता रहे है सबसे पहले बोले है - 


 "सुनहु राम अब कहउ निकेता, जहाँ बसहु सिय लखन समेता

जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना, कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना"

 

जिनके कान समुद्र की भांति है जिसमे आपकी सुन्दर कथारूपी अनेको सुन्दर नदियों दौड दौड कर आती है और समुद्र उनसे निरंतर भरते रहते है, परन्तु कभी पूरे (तृप्त) नहीं होते.उनके ह्रदय आपके लिए सुन्दर घर है.समुद्र में यदि बाढ़ वाली नदी भी आ जाए तो भी वह अघाता नहीं है. 

इसी तरह हमारे कान होने चाहिये,जो कितनी भी प्रभु की कथा सुने पर कभी तृप्त न हो. संत कहते है व्यक्ति को दो चीजों से कभी तृप्त नहीं होना चाहिये पहला "भगवान की कथा" और दूसरा "दान".जिन्होंने ये कहा कि बस हमने तो बहुत बार कथा सुनी है,वही तो कथा है चाहे एक बार सूनो या बहुत बार, तो समझना अभी उसने कथा सुनी ही नहीं है.


जो हम मुह से खाते है वह मल द्वार से बाहर निकलता है और जो हम कान से सुनते है वही मुख से बाहर आता है.जैसे यदि हम कान में कोई दवाई डाल दे तो कभी-कभी हम देखते है कि दवा मुह में आ जाती है. व्यक्ति वही मुख से बोलता है जो उसने सुना है,अब हमें ये देखना है कि हम कान से क्या अन्दर ले जा रहे है. भगवान की चर्चा या संसार का कचरा.


वास्तव में हमने अपने कानो को कचरा घर बना रखा है.यदि कोई हमारे घर के आँगन में कचरा डाल जाए तो हम उससे लडने लगते है,परन्तु जब कान में कोई किसी की बुराई ,अश्लीलता भरी बात रूपी कचरा डालता रहता है तब हम उससे कुछ भी नहीं कहते,यदि दो चार दिन ये कचरा न डाले तो हम पडोसी को बुलाते है कि हमारे कानो में ये कचरा डाल दे.


हम जो सुनते है वो हमारे मन में चला जाता है,और मन अब जो हमें दिखाता है हम वही देखते है.इसे कहते है "मन की आँखों से देखना" फिर जब हम इससे देखने लग जाते है तो कुछ और दिखायी नहीं देता,जैसे घर में कोई बीमार है डॉक्टर ने कहा ये दवा तुरंत ले आईये, नहीं तो बचाना मुश्किल हो जाएगा.हम बाजार कि ओर भागे उस समय रास्ते में हमने किसे धक्का मारा,क्या बाजार में बिक रहा है कौन सी नई वस्तु आई है हमें कुछ भी नहीं दिख रहा हमें दिखती है केवल (केमिस्ट) दवाई वाले की दूकान.क्यों ?क्योकि मन में दवाई बैठी है.


ठीक इसी तरह जिसके मन में जो बैठा है उसे वही दिखायी देता है कथा में गए, कोई चप्पल जूते की चोरी करता है, कोई दर्शन करता है, कोई जेब काटता है. क्योंकि किसी ने मन में चप्पल बैठा रखी है, किसी ने पैसा बैठा रखा है,तो उसे भगवान नजर नहीं आते,लोगो की जेब ही उसे दिखायी देती है.जिसने भगवान को बैठा रखा होगा उसे भगवान ही नजर आयेगे.  


सुन्दर काण्ड में विभीषण जी भगवान से कह रहे है कि मै कानो से आपका सुयश सुनकर आया हूँ.विभीषण जी ने भगवान को देखा नहीं था केवल सुना था.हनुमान जी जब लंका गए थे तब हनुमान जी ने कथा सुनाई थी.सोचने लगे कि जिनकी कथा इतनी सुन्दर है वे स्वयं कितने सुन्दर होगे. 

इसलिए सुनना अति आवश्यक है. नहीं तो सब बिगड़ जायेगा.क्योकि सत्संग में,कथा में संतजन भगवान के बारे में बताते है जबतक हम जानेगे नहीं तब तक प्रेम कैसे कर पायेगे.
 

"जाने बिना नहीं होय प्रतीति और बिन प्रतीति नहीं होय प्रीति.

 

जब हम इन कानो से बार बार भगवान की कथा,गुण,लीला सुनते है तो वही हमारे मन मै बैठ जाता है.और फिर वही हमें दिखायी देता है और जिसकी चर्चा कानो से सुनी तो उसी की चर्चा मुख से भी हम करते है.तन का मैल तो साबुन से धो लेते है पर वैज्ञानिको ने आज तक मन को धोने वाला कोई डिटर्जेंट नहीं बनाया. 

                                "रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं

                                  कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावही."

 

अर्थात-  जो रघुवंश के भूषण श्री रामजी का यह चरित्र कहते हैं, सुनते हैं और गाते हैं, वे कलियुग के पाप और मन के मल को धोकर बिना ही परिश्रम श्री रामजी के परम धाम को चले जाते हैं.इसलिए वाल्मीकि जी कह रहे है.उनके कानो में निवास कीजिये जो कथा सुनते है.  

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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