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भगवान का सत्रहवा अवतार - श्रीवेद व्यास जी

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पौराणिक-महाकाव्य युग की महान विभूति, महाभारत, अट्ठारह पुराण, श्रीमद्भागवत, ब्रह्मसूत्र, मीमांसा जैसे अद्वितीय साहित्य-दर्शन के प्रणेता वेदव्यास जी का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा को लगभग ३००० ई. पूर्व में हुआ था. वेदांत दर्शन, अद्वैतवाद के संस्थापक वेदव्यास जी ऋषि पराशरजी  और माता सत्यवती जी के पुत्र थे.


वेदव्यास जी की जन्म कथा -
ऐसा कहा जाता है कि सत्यवती का जन्म एक मछली के गर्भ से हुआ और एक निषाद ने जब उस मछली के पेट को जब चीरा तब एक कन्या उन्हें प्राप्त हुई जिसका नाम उन्होंने सत्यवती रखा, बड़ी होने पर वह नाव खेने का कार्य करने लगी एक बार पाराशर मुनि को उसकी नाव पर बैठ कर यमुना पार करना पड़ा.

पराशर 
 मुनि सत्यवती रूप-सौन्दर्य पर आसक्त हो गये और बोले, "देवि! मै तुम्हे के पुत्र देना चाहता हूँ, सत्यवती ने कहा, "मुनिवर! आप ब्रह्मज्ञानी हैं और मैं निषाद कन्या,और अभी तो मै कुवारी हूँ, तब पाराशर मुनि बोले, "बालिके! तुम चिन्ता मत करो। प्रसूति होने पर भी तुम कुमारी ही रहोगी.

समय आने पर सत्यवती के गर्भ से वेद वेदांगों में पारंगत एक पुत्र हुआ. जन्म होते ही वह बालक बड़ा हो गया और अपनी माता से बोला, "माता! तू जब कभी भी विपत्ति में मुझे स्मरण करेगी, मैं उपस्थित हो जाउँगा" इतना कह कर वे तपस्या करने के लिये द्वैपायन द्वीप चले गये. द्वैपायन द्वीप में तपस्या करने तथा उनके शरीर का रंग काला होने के कारण उन्हे कृष्ण द्वैपायन कहा जाने लगा. 

वेदव्यास जी की पत्नी वीटीका से महान बाल योगी "शुकदेव" जी का आर्विभाव हुआ, श्रीमद्भागवत गीता विश्व के सबसे बड़े महाकाव्य 'महाभारत' का ही अंश है. गुरु पूर्णिमा का प्रसिद्ध पर्व व्यास जी की जयन्ती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है.


वेद पुराणों की रचना - महर्षि व्यास त्रिकालज्ञ थे तथा उन्होंने दिव्य दृष्टि से देख कर जान लिया कि कलियुग में धर्म क्षीण हो जायेगा
. धर्म के क्षीण होने के कारण मनुष्य नास्तिक, कर्तव्यहीन और अल्पायु हो जावेंगे. एक विशाल वेद का सांगोपांग अध्ययन उनके सामर्थ से बाहर हो जायेगा. इसीलिये महर्षि व्यास ने वेद का चार भागों में विभाजन कर दिया जिससे कि कम बुद्धि एवं कम स्मरणशक्ति रखने वाले भी वेदों का अध्ययन कर सकें. व्यास जी ने उनका नाम रखा - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद,  और अथर्ववेद, १८ पुराण, महाभारत,आदि की रचना की.

वेदों का विभाजन करने के कारण ही व्यास जी "वेदव्यास" के नाम से विख्यात हुये. "ऋग्वेद","यजुर्वेद","सामवेद" और "अथर्ववेद" को क्रमशः अपने शिष्य "पैल", "जैमिन", "वैशम्पायन" और "सुमन्तुमुनि" को पढ़ाया. 


"ऋग्वेद को  
 २१  यजुर्वेद"को   १०१ ,सामवेद को १००० और  "अथर्ववेद" को  ९ भागो में विभक्त किया. जो कुल ११३१ है और वेद की शाखाओ के नियम निर्धारित किये, जिससे कि प्रत्येक व्यक्ति वेद की कम से कम एक शाखा का तो अवश्य ही अध्ययन कर सके. वेद व्यास जी केवल विद्वान ,वेदों के ज्ञाता लेखक और वेदों के वाचक ही नहीं थे अपितु महान योगी युग द्रष्टा भूत भविष्य और वर्तमान के ज्ञाता भी थे 


वेद में निहित ज्ञान के अत्यन्त गूढ़ तथा शुष्क होने के कारण वेद व्यास ने पाँचवे वेद के रूप में "पुराणों की रचना" की जिनमें वेद के ज्ञान को रोचक कथाओं के रूप में बताया गया है
. पुराणों को उन्होंने अपने शिष्य "रोम हर्षण" को पढ़ाया. व्यास जी के शिष्यों ने अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार उन वेदों की अनेक शाखाएँ और उप शाखाएँ बना दीं. 


DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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