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भगवान के अवतार

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स्रष्टि के आदि में भगवान ने लोको के निर्माण की इच्छा की, इच्छा होते ही उन्होंने महतत्व आदि से, निष्पन्न पुरुषरूप ग्रहण किया, उसमे दस इन्द्रिया, एक मन, और पाँच भूत- ये सोलह कलाएँ थी, उन्होंने कारण-जल में शयन करते हुए जब योग निंद्रा का विस्तार किया.


तब उनके नाभि-सरोवर से एक कमल प्रकट हुआ और उस कमल से प्रजापति के अधिपति ब्राहाजी प्रकट हुए, योगी लोग दिव्य द्रष्टि से भगवान के उस रूप का ही दर्शन करते है भगवान के उस विराट रूप के अंग-प्रंत्यग में ही समस्त लोको की कल्पना की गयी है इसे ही 
नारयण  कहते है इसी से सारे अवतार प्रकट होते है.

 

 १.     पहला अवतार - उन्ही प्रभु ने पहले कौमार सर्ग में ‘सनक, सनंदन, सनातन, और सत्कुमार’ – इन चार ब्राहमणों के रूप में अवतार ग्रहण करके अत्यत कठिन अखंड ब्रह्मचर्ये का पालन किया.

 

२.     दूसरा अवतार - दूसरी बार इस संसार के कल्याण के लिये समस्त यज्ञ के स्वामी उन भगवान ने ही रसातल में गयी हुई पृथ्वी को निकाल लेन के लिये ‘सूकर रूप’ ग्रहण किया .

 

३.     तीसरा अवतार - ऋषियों की द्रष्टि से उन्होंने ‘देवर्षि नारद के रूप’ में तीसरा अवतार ग्रहण किया और नारद पाच्ज़रात्रका उपदेश किया, उसमे कर्मो के द्वारा किस प्रकार कर्मबंधनो से मुक्ति मिलती है इसका वर्णन है.

 

४.     चौथा अवतार - धर्म की पत्नी मूर्ति के गर्भ से उन्होंने ‘नर-नारायण’ के रूप में चौथा अवतार ग्रहण किया, इस अवतार में उन्होंने ऋषि बनकर मन और इन्द्रियों का सर्वथा संयम करके बड़ी कठिन तपस्या की.

 

५.     पाँचवा अवतार - वे सिद्धो के स्वामी ‘कपिल के रूप’ में प्रकट हुये और तत्वो का निर्णय करने वाली ‘सांख्य–शास्त्र’ का आसुरी मामक ब्राहमण को उपदेश किया .

 

६.     छँठवा अवतार - अनसूया के वर माँगने पर वे अत्री की संतान ‘दत्तात्रेय’ हुये, इस अवतार में उन्होंने अलर्क और प्रहलाद आदि को ब्रहाज्ञान का उपदेश किया.

 

७.     सातवी अवतार – रुचि प्रजापति की आकूति नामक पत्नी से ‘यज्ञ के रूप’ में उन्होंने अवतार ग्रहण किया,और अपने पुत्र यान आदि देवताओं के साथ स्वायम्भुव मन्वंतर की रक्षा की .

 

८.      आंठवा अवतार – राजा नाभि की पत्नी मेरु देवी के गर्भ से ‘ऋषभ देव’ के रूप मे भगवान ने अवतार लिया, इस रूप में उन्होंने परमहंसो का वह मार्ग दिखाया, जो सभी आश्रमियो के लिये वन्दनीय है .

 

९.     नवाँ अवतार – ऋषियों की प्रार्थना पर राजा ‘पृथु के रूप’ मे अवतीर्ण हुए, इस अवतार में उन्होंने  पृथ्वी से समस्त ओषधियो का दोहन किया.

 

१०.    दसवा अवतार – चाक्षुक मन्वंतर के अंत में जब सारी त्रिलोकी समुद्र में डूब रही थी तब उन्होंने ‘मत्स्य के रूप’ में आये पृथ्वी रुपी नौका पर बैठकर अगले मन्वंतर के अधिपति वैवस्वत मनु की रक्षा की.

 

११.   ग्यारहवाँ अवतार – जिस समय देवता और दैत्य समुद्र मंथन कर रहे थे उस समय ‘कच्छप रूप’ से भगवान ने मन्दराचल को अपनी पीठ पर धारण किया.

 

१२.  बारहवा अवतार – ‘धन्वन्तरी के रूप’ में अमृत लेकर समुद्र से प्रकट हुए.

 

१३.  तेरहवां अवतार – ‘मोहनी रूप’ धारण करके दैत्यों को मोहित करके देवताओ को अमृत पिलाया.

 

१४.  चौदहवां अवतार – ‘नरसिंह रूप’ धारण किया और अंत्यत बलवान दैत्यराज हिरण्यकश्यपू की छाती अपने नखो से अनायास इस प्रकार फाड़ डाला, जैसे चटाई बनाने वाला सीक को चीर देता है .                              

 

१५.   पंद्रहवा अवतार – ‘वामन का रूप’ धारण करके भगवान दैत्यराज बलि के यज्ञ में गये,उन्होंने केवल तीन पग पृथ्वी माँगीं .

 

१६.   सोलहवाँ अवतार – ‘परशुराम के रूप’ में अवतार लिया,इक्कीस बार इस पृथ्वी को क्षत्रियो से शून्य किया. 

 

१७.   सत्रहवाँ अवतार – सत्यवती के गर्भ से वे ‘व्यास के रूप’ में अवतीर्ण हुए, इन्होने वेदरूप वृक्ष की कई शाखाए बना दी.

 

१८.   अठारहवाँ अवतार – देवताओं का कार्ये संपन्न करने की इच्छा से उन्होंने राजा ‘राम के रूप’ में अवतार लिया, और बहुत-सी लीलाये की.

 

१९.   उन्नीसवाँ  अवतार – उन्होंने यदुवंश में ‘बलराम.

२० .  बीसवाँ अवतार- श्रीकृष्ण’ 
के रूप में अवतार लिया.

 

२१.इक्कीसव अवतार – कलयुग में ‘बुद्ध’ अवतार लिया.

 

२२.चौबीसवाँ अवतार – कलयुग के अंत में जब राजा प्राय: लुटेरे हो जायेगे तब जगत रक्षक भगवान विष्णुयश नामक ब्राहमण के घर ‘काल्कि रूप’ में अवतीर्ण होगे.

 

 यहाँ बाईस अवतारों की गणना की गयी है परन्तु भगवान के चौबीस अवतार प्रसिद्ध है, कुछ विद्वान चौबीस की संख्या यो पूर्ण करते है, राम-कृष्ण के अतिरिक्त बीस अवतार तो उपयुक्त है शेष चार अवतार श्रीकृष्ण के ही अंश है स्वयं कृष्ण तो पूर्ण परमेश्वर है वे अवतार नहीं, अवतारी है, अतः श्रीकृष्ण को अवतारों की गणना में नहीं गिनते, उनके चार अंश ये है- एक तो केशका अवतार, दूसरा सुतपा, तथा तीसरा सकंर्षण बलराम और चौथा परब्रह.  इस प्रकार इन चार अवतारों से विशिष्ट पाँचवे साक्षात् भगवान वासुदेव है इसके अतरिक्त दो और है हंस और हयग्रीव .
 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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