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भक्ति का कष्ट निवारण

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श्रीमद्गागवत की शुरुआत इस मंत्र से है –

 

सच्चिदानन्दरुपाय  विश्र्वोत्पत्यादिहेतवे . 

तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुम: .. 

 

अर्थ – सच्चिदानन्दस्वरुप भगवान श्रीकृष्ण को हम नमस्कार करते है, जो जगत की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश के हेतु तथा आध्यात्मिक, आधिदैविक, और आधिभौतिक - तीनो प्रकार के तापों का नाश करने वाले है.

 

एक बार मुनिवर शौनकजी ने नैमिषारण्य क्षेत्र में विराजमान महामति सूतजी को नमस्कार करके उनसे पूछा- सूतजी आपका ज्ञान अज्ञानान्धकार को नष्ट करने के लिये करोंडो सूर्यो के समान है . आप हमारे लिये अमृत स्वरुप सारगर्भित कथा कहिये इस घोर कलिकाल में जीव प्राय: आसुरी स्वभाव के हो गये है विविध क्लेशो से आक्रांत इन जीवो को शुद्ध बनाने का सर्वश्रेष्ठ उपाए क्या है?

 

सूत जी ने कहा – मैं तुम्हे सम्पूर्ण सिंद्धान्तो का निष्कर्ष सुनाता हूँ .

 

शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को यह कथा सुनाई, जब मनुष्य के जन्म-जन्मान्तर का पुण्य उदय होता है तभी उसे इस भागवत शास्त्र की प्राप्ति होती है.

 

इसे सर्वप्रथम ब्रह्मा जी ने नारद को सुनाया था, पर सप्ताहश्रवण की विधि तो उन्हे सनकादि ने ही बताई थी.एक दिन विशालपुरी में वे चारो निर्मल ऋषि सत्संग के लिये आये, वहाँ उन्होने नारद जी को देखा.

 

सनकादि ने पूछा – ब्राह्मण आपका मुख उदास क्यों हो रहा है?आप चिंतातुर कैसे है,इतनी जल्दी-जल्दी कहाँ जा रहे है ?

 

 

नारदजी ने कहा- मै पृथ्वी में आया, यहाँ पुष्कर, प्रयाग, काशी, हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, श्रीरंग, कई तीर्थो में गया, पर मुझे मन को संतोष देने वाली शान्ति नहीं मिली, इस समय अधर्म के सहायक कलयुग ने सारी पृथ्वी को पीड़ित कर रखा है, मैं विचरता हुआ वृंन्दावन में गया, वहाँ एक युवती स्त्री, खिन्न मन से बैठी थी, उसके पास दो वृद्ध पुरुष अचेत अवस्था में पड़े जोर-जोर से साँस ले रहे थे उसके चारो ओर सैकड़ो स्त्रीयाँ उसे पंखा झल रही थी.

 

 

युवती ने कहा – महात्मा जी. क्षणभर ठहर जाइये मेरी चिन्ता को भी नष्ट कर दीजिए, आपका दर्शन तो संसारियो के सभी पापों को सर्वथा नष्टकर देने वाला है.

 

 

नारद जी ने कहा – तब मैंने उस स्त्री से पूछा- देवी तुम कौन हो? ये दोनों पुरुष तुम्हारे क्या होते है? तुम अपने दुख का कारण बताओ ?  

 

 

युवत ने कहा – मेरा नाम भक्ति है. ये ज्ञान ओर वैराग्य मेरे पुत्र है, समय के फेर से ही ये ऐसे जर्जर हो गये है, ये देवियाँ गंगाजी आदि नदियाँ है इनसे सेंवित होने पर भी मुझे सुख शांत नहीं है ?

 

 

कलयुग के प्रभाव से पांखण्यिो ने मुझे अंगभंग कर दिया, चिरकाल तक यह अवस्था रहने के कारण मै अपने पुत्रो के साथ दुर्बल और निस्तेज हो गयी, अब जब से इस वृन्दावन में आई हूँ, तब से मै तो सुंदरी जवान हो गयी हूँ परन्तु मेरे ये दोनों पुत्र बूढे हो गये है,इसी से में दुखी हूँ.

 

नारद जी ने कहा – साध्वी. मै अपने हृदय में ज्ञान दृष्टि से तुम्हारे दुख का कारण देखता हूँ.

 

 

देखने के बाद नारदजी ने कहा – देवी सुनो कलियुग में इस समय सदाचार, योगमार्ग और तप आदि सभी लुप्त हो गये है, लोग शठता और दुष्कर्म में लगकर आसुरी बन रहे है . यह वृन्दावन धन्य है जहाँ भक्ति सर्वत्र नृत्य कर रही है, परन्तु तुम्हारे इन दोनों पुत्रो का यहाँ कोई ग्राहक नहीं है इसलिए ये सोते से जान पड़ते है.

 

 

तुम चिंता ना करो मै इनके नवजीवन का उपाय सोचता हूँ,इस लोग में, मै तुम्हे घर-घर में प्रत्येक पुरुष के हृदय में स्थापित कर दूँगा .कलयुग में भक्ति ही सार है,जो जीव तुम से युक्त होगे वे श्रीकृष्ण के अभय धाम को प्राप्त होगे.

 

 

फिर नारदजी ने वेदध्वनि वेदांतघोष और बार-बार गीता का पाठ सुनाया दोनों जँभाई लेते रहे और फिर सो गये तो नारद जी को बड़ी चिंता हुई, वे सोचने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये? तभी आकाशावादी हुई की इसके लिये तुम एक सत्कर्म करो वह कर्म तुम्हे संतशिरोमणि बतायेगे.

 

सूतजी कहते है –शौनकजी ज्ञान और वैराग्य को वही छोडकर नारदमुनि वहाँ से चले गये प्रत्येक तीर्थ में जा-जाकर मार्ग में मिलने वाले मुनिश्र्वर से वह साधन पूछनेुनिश्र्वर से वह साधन पूछने लगे,उनकी बात सुनते तो सब, पर निश्चित उत्तर कोई भी नहीं दे सका.

 

तब नारद जी बदरीवन में आये उन्होंने निश्चय किया की मै तप करुगा. इसी समय उन्हे अपने सामने करोडो सूर्यो के सामान तेजस्वी सनकादी मुनिश्र्वर दिखाई दिये, नारद जी ने उन्हे सब वृतांत सुनाया तब वे कहने लगे - श्रीमद्भागवत की ध्वनि से कलयुग के सारे दोष नष्ट हो जाएगे.

 

नारदजी ने कहा – मैंने वेद-वेदांत की ध्वनि और गीता पाठ करके उन्हे बहुत जगाया, किन्तु फिर भी भक्ति ज्ञान और बैराग्य-ये तीनो नहीं जगे, ऐसी स्थिति में श्रीमद्भागवत सुनाने से वे कैसे जगेगे आप यह मेरा संदेह दूर कर दीजिये.

 

सनकादि ने कहा - श्रीमद्बगवत की कथा वेद और उपनिषदों के सार से बनी है इसलिए उनकी फलरूप होने के कारन वह बड़ी उत्तम जान पड़ती है जिस प्रकार रस वृक्ष की जड़से लिकर शाखाग्र्पर्यंत रहताहै किन्तु इस स्थिति में उसका आस्वादन नहीं किया जा सकता बही जब अलग होकर फल के रूप में आ जाता है, तब उसका स्वाद आता है ऐसी ही यह भागवत की कथा है. 

 

नारदजी ने कहा – ये बताइये कि श्रीमद्भागवत की कथा कितने दिनों में सुनानी चाहिये और उसके सुनाने की क्या विधि है ?

 

सनकादि ने कहा – हरिद्वार के पास एक आनद नाम का घाट है वह ऋषि रहते है तथा देवता और सिद्धालोग भी उसका सेवन करते है.

 

सूतजी कहते है – इस प्रकार कहकर नारद जी के साथ सनकादि भी श्रीमद्भागवत कथामृत का पण करने के लिये वह से तुरत गंगातट पर चले आये सभी ऋषि मुनि, देव,दानव सभी गंगातट पर आ गये.

 

सनकादि ने कहा-  सदा सेव्या सदा सेव्या श्रीमद्भागवती कथा . 

                        यस्या:श्रवण मात्रेण हरिश्र्चित्तं समाश्रयेत .. 

 

अब हम आपको इस भागवत की महिमा सुनाते है इसके श्रवण मात्र से मुक्ति हाथ लग जाती है और श्रीमद्बगवत कथा का सदा-सर्वदा सेवन, आस्वादन करना चाहिये, इसके श्रवण मात्र से श्रीहरि हृदय में आ विराजते है.

 

सूतजी कहते है –शौनकजी! जिस समय सनकादि मुनिश्र्वर इस प्रकार सप्ताह श्रवण की महिमा का बखान कर रहे थे, उस सभा में एक बड़ा आश्र्चर्य हुआ, भक्ति तरुणावस्था को प्राप्त हुए अपने दोनों पुत्रो को साथ लिये विशुद्ध प्रेमरूपा भक्ति बार-बार भगवान के नामो का उच्चारण करती हुई अकस्मात प्रकट हो गयी.

 

भक्ति ने कहा – मै कलियुग में नष्ट हो गयी थी आपके कथामृत से सीचकर मुझे फिर पुष्ट कर दिया. अब आप बताये की मै कहाँ रहूँ.

 

यह सुनकर सनकादि ने उससे कहा - तुम भक्तो को भगवान का स्वरुप प्रदान करने वाली अत:तुम विष्णु भक्तो के हृदय में ही निवास करों.  

 

जय जय श्री राधे  


DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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