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अंधी जवानी ही नरकमय बुढ़ापे की जन्म दात्री

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                                            गुर सिष बधिर अंध का लेखा 
                                             एक न सुनहिं एक नहीं देखा ll 

यह सत्य है कि बचपन अबोध और माता-पिता पर आश्रित होता है, परन्तु यही अबोधता अंधी जवानी की जननी भी तो होती है और अंधी जवानी ही नरकमय बुढ़ापे की जन्म दात्री--ही अनुभव गम्य सत्य है. वे अति सौभाग्यशाली और यशस्वी होते हैं, जिनके नेत्र अबोध बचपन में ही खुल जाते हैं.

परन्तु इन वचनों का मर्म तो दशरथ और नन्दबाबा जैसी कुछ बिरली विभूतियाँ ही जानती है/थी, तभी तो उन्होंने अपने पुत्रों को गुरुकुल भेजा था. दुर्भाग्य से आज गुरुकुल-प्रथा ही प्राय: विनिष्ट है. और यदि है भी तो ज्ञानान्ध गुरुओं और बहरे शिष्यों (ज्ञान के प्रति अरुचि रखने वाले) का ही बाहुल्य है. सो उसका परिणाम भी सामने है---

                            मातु-पिता गुर विप्र न मानहिं उदर भरे सोइ धरम सिखावहि l

सोचिये यदि द्रौपदी ने दुर्योधन से कहा था कि--- अंधे का पुत्र अंधा---तो क्या गलत कहा था? व्यवहारिक दृष्टि से द्रौपदी के वचन अवश्य गलत और महाभारत का मूलाधार हो सकते हैं, किन्तु आध्यात्मिक दृष्टि से तो सत्य ही प्रतीत होते हैं, क्योंकि ज्ञानान्ध माता-पिता के आँगन में भला राम और कृष्ण जैसे शिशु कैसे क्रीडा कर सकते हैं? राम का जन्म तो अयोध्या नरेश के यहाँ होना ही सम्भव है, किसी लंकेश के यहाँ नहीं और हम जैसे महानुभावों के यहाँ तो स्वप्न में भी नहीं.

धृतराष्ट्र 100 पुत्रों का पिता तो बन सकता है सत्य है, किन्तु अंधों का ही, यही परम सत्य है. अत: उत्तम और कल्याणकारी सन्तान की कामना पूर्ण करने के लिए माता-पिता को स्वयं अपना आचरण तो सुधारना ही होगा. 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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