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गोकर्ण जी की कथा

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सनकादि ने कहा – नारदजी अब हम आपको एक प्राचीन इतिहास सुनाते है .

 

तुंगभद्रा नदी के तट पर एक नगर में आत्मदेव नामक ब्राहाण रहता था,वे समस्त वेदों के विशेषज्ञ थे,उनकी पत्नी धुन्धुली कुलीन और सुन्दर थी. स्वभाव था क्रूर, और झगडालू भी थी, घर में सब प्रकार का सुख था पर ब्राह्मण बड़े चिंतातुर रहते थे क्योकि बहुत उम्र ढल गई तो भी उन्हे संतान का मुख देखने नहीं मिला .

 

एक दिन ब्राहाणदेव बड़े दुखी मन से घर से निकलकर प्राण त्यागने वन को चल दिये एक तालाब में कूदने लगे, तभी एक संन्यासी ने इन्हें देखा और पूछा -

 

संन्यासी ने कहा – ब्राहमण ! तुम्हे ऐसी कौन-सी भारी चिंता है ? जिसके कारण तुम प्राण त्याग रहे हो, जल्दी से मुझे अपने दुख का कारण बताओ !

 

आत्मदेव ने कहा – महाराज ! मै संतान के लिये इतना दुखी हो गया हूँ कि मुझे सबकुछ सूना-सूना लगता है, संतानहीन जीवन को धिक्कार है, मै जिस गाय को पालता हूँ वह भी सर्वथा बाँझ हो जाती है, जो पेड़ लगता हूँ  उस पर भी फल-फूल नहीं लगते, मै घर में जो फल लाता हूँ वह भी बहुत जल्दी सड़ जाता है. ऐसा कहकर वह फूट-फूटकर रोने लगा, तब यति ने उसके ललाट की रेखाएँ देखी और सारा वृतान्त जानकर कहने लगे .

 

संन्यासी ने कहा – ब्राहमण देव ! कर्म की गति बड़ी प्रबल है, वासना को छोड़ दो, सुनो ! मैंने तुम्हारा भाग्य देख लिया है, इस जन्म में तो क्या अगले सात जन्मो तक तुम्हारे कोई संतान किसी भी प्रकार नहीं हो सकती !

 

ब्राहमण ने कहा – मुझे तो बलपूर्वक पुत्र दीजिए नहीं तो मै आपके सामने ही प्राण त्याग दूँगा .

जब महात्मा जी ने देखा कि ये किसी प्रकार अपना आग्रह नहीं छोड़ता तब उन्होने उसे एक फल देकर कहा- इसे तुम अपनी पत्नी को खिला देना इससे उसके एक पुत्र होगा .

 

ब्राहाण ने फल लाकर अपनी पत्नी को दे दिया पर वह तो कुटिल बुद्धि की थी उसने सोचा मैं ये फल नहीं खाऊँगी,इसे खाने से गर्भ रह जायेगा और तो कुछ खाया पीया भी नहीं जायेगा,  प्रसव के समय में मर गयी तो ? वह ऐसे ही तर्क-कुतर्क करने लगी .

 

एक दिन उसकी बहन उसके घर आई उसने सारी बात अपनी बहन से कही बहन ने कहा-मेरे पेट में बच्चा है, प्रसव होने पर वह बालक मै तुम्हे दे दूँगी, तब तक तुम गर्भावती के समान घर में रहो मै कह दूँगी, मेरा बच्चा मर गया, तू ये फल गाय को खिला दे .उसने ऐसा ही किया .

 

समय व्यतीत होने पर उसकी बहन ने बच्चा लाकर धुन्धुली को दे दिया, पुत्र हुआ है, सुनकर आत्मदेव को बड़ा आनंद हुआ . धुन्धुली ने अपने बच्चे का नाम धुंधकारी रखा.

 

इसके तीन महिने बिताने पर एक दिन ब्राहमण देव सुबह गाय को चारा डालने गये तो उन्होंने गाय के पास एक बच्चा देखा वह मनुष्याकार था, पर उसके कान गौके जैसे थे . वह सर्वागसुन्दर, दिव्य, निर्मल, तथा सुवर्ण की-सी कान्तिवाला था, उसे देखकर ब्राहाणदेव को बडा़ आनंद हुआ आत्मदेव जी ने उसके गौके-से कान देखे तो उसका नाम ‘गोकर्ण’ रखा.  

 

कुछ समय बाद दोनों बालक जवान हो गये उनमे गोकर्ण तो बड़ा पंडित और ज्ञानी हुआ किन्तु धुंधकारी बड़ा ही दुष्ट निकला, स्नान शौचादि ब्राहाणोनोचित आचारो का उसमे नाम भी ना था, क्रोध उसमे बहुत था, चोरी करना, घरो में आग लगाना, हर समय अस्त्र-शस्त्र धारण किये रहता, वेश्याओ के जाल में फँसकर उसने अपने माता-पित्ता की सारी संपत्ति नष्टकर दी.

 

एक दिन पित्ता को मार-पीटकर घर के सब बर्तन-भाड़े उठा ले गया, सबकुछ खत्म हो जाने पर उसका पिता रोने लगा बोला इससे तो इसकी माँ का बाँझ रहना ही अच्छा था, कुपुत्र तो बड़ा ही दुखदायी होता है.तभी गोकर्णजी वह आ गये उन्होंने पित्ता को वैराग्य का उपदेश करते हुए बहुत समझाया.

 

वे बोले - पिताजी यह संसार असार है, पुत्र किसका ? धन किसका ? इस अज्ञान को छोड दीजिये सबकुछ छोडकर वन में चले जाये, भगवत भजन ही सबसे बड़ा धर्म है .पित्ता तो वन चले गये और माता ने तंग आकर कुएँ में कूदकर मर गयी.

 

धुंधकारी पाँच वेश्याओं के साथ रहने लगा उनके लिये ही धन जुटाने में लगा रहता डाका डालता उन वेश्याओ ने सोचा पकडे जाने पर राजा हम भी प्राण दंड देगा इसलिए उन्होंने सोये हुए धुंधकारी को रस्सियों से कस दिया और गले में फाँसी लगाकर उसे मारने का प्रयत्न किया,जब वह नहीं मारा तो उन्होंने उसके मुख में बहुत से दहकते अँगारे डाले इससे वह तडपकर मर गया, उसे एक गड्डे में गाड़ दिया.धुंधकारी अपने कुकर्मो के कारण भयकर प्रेत हुआ भूखा प्यास से व्याकुल होकर चिल्लाता रहता था.  

 

एक दिन गोकर्णजी कथा करते हुए अपने गाँव में आये सबसे नज़रे बचाकर अपने घर सोने गये अपने भाई को सोया देख धुंधकारी आया.

 

गोकर्ण ने पूछा – तुम कौन हो ?

 

वह कहने लगा –मै तुम्हारा भाई हूँ, मेरे कुकर्मो की गिनती नहीं की जा सकती, इसी से में प्रेत-योनी में पडा़ ये दुर्दशा भोग रहा हूँ, भाई ! तुम दया करके मुझे इस योनी से छुडा़ओ.

 

गोकर्ण ने कहा –मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है मैंने तुमहारे लिये विधिपूर्वक गयाजी में श्राद्ध किया फिर भी तुम प्रेतयोनी से मुक्त कैसे नहीं हुए, मै कुछ और उपाए करता हूँ. अंत में सूर्ये देव ने उनसे कहा कि केवल श्रीमद्भागवत कथा से मुक्ति हो सकती है इसलिए तुम सप्ताह पारायण करो.

 

गोकर्णने व्यास गद्दी पर बैठकर कथा कहने लगे देश गाँव से बहुत लोग कथा सुनने आने लगे इतनी भीड़ हो गयी कि सब आश्चर्य करने लगे तब वह प्रेत भी वहाँ आ पहुँचा वह इधर-उधर स्थान ढूँढने लगा इतने मे उसकी दृष्टि एक सीधे रखे हुए सात गाँठ के बाँस पर पड़ी वह वायु रूप से उसमे जाकर बैठ गया.

 

जब शाम को कथा को विश्राम दिया गया, तो एक बड़ी विचित्र बात हुई, सबके देखते-देखते उस बाँस की एक गाँठ तड़–तड़ करती फट गयी इसी प्रकार सात दिनो में सातो गाँ‍ठे फट गयी और बारह स्कंद सुनने से पवित्र होकर धुंधकारी एक दिव्य रूप धारण करके सामने खड़ा हो गया.उसने भाई को प्रणाम किया तभी बैकुण्ठवासी पार्षदों के सहित एक विमान उतरा, सबके देखते ही धुंधकारी विमान पर चढ़ गये.

 

उन पार्षदों को देखकर उनसे गोकर्ण ने यह बात कही –भगवान के प्रिये पार्षदों यहाँ हमारे अनेको शुद्ध हृदय श्रोतागण है उन सबके लिये एक साथ बहुत से विमान क्यों नहीं लाए यहाँ सभी ने समान रूप से कथा सुनी है फिर फल में इस प्रकार का भेद क्यों ?

 

भगवान के पार्षदों ने कहा – इस फल भेद का कारण इनमे श्रवण का भेद है श्रवण सबने समानरूप से ही किया किन्तु इसके जैसा मनन नहीं किया .इस प्रेत ने सात दिन तक सुने हुए विषय का स्थिरर्चित्त से ये खूब मनन भी करता रहता था .यो कहकर वे सब पार्षद बैकुठ को चले गये.

 

श्रावण मॉस में गोकर्ण ने फिर से उसी प्रकार सप्ताह क्रम से कथा कही वहाँ भक्तो से भरे हुए विमानों के साथ भगवान प्रकट हो गये उस गाँव में कुत्ते और चण्डा़ल पर्यंन्त जितने भी जीव थे सभी दिव्य देह धारण करके विमान पर चढ़ गये भगवान उन सभी को योगिदुर्लभ गोलोक धाम में ले गये.

 

जय जय श्री राधे  

 

DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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