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भगवान का सेवक बनने में ही अनन्यगति है

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किष्किन्धाकाण्ड में उस समय का प्रसंग है जब हनुमान जी ऋषिमूक पर्वत के निकट घूमते हुए श्रीराम और लक्ष्मण जी का पता लगाने जाते है, कि ये दोनों राजकुमार कौन है.और हनुमान जी पहचान नहीं पाते,यहाँ हनुमान जी से चूक हो गई,जीवन में परमात्मा किस रूप में हमारे सामने आयेगे,ये कहना कठिन है.


जब श्री राम जी अपना परिचय देते है तब हनुमान जी श्री राम जी के चरणों में गिर पड़ते है,तब भगवान उन्हें अपने ह्रदय से लगाते है और अपने आँसूओ से सींचकर उन्हें शीतल करते है.परमात्मा का स्पर्श बहुत जरुरी है.तब भगवान एक बड़ी प्यारी बात कहते है- 


"समदरसी मोहि कह सब कोऊ,सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ"


अर्थात -
सब कोई मुझे समदर्शी कहते है (मेरे लिए न कोई प्रिय है न अप्रिय)पर मुझको सेवक प्रिय है क्योकि वह अनन्य गति होता है (मुझे छोड़कर उसको कोई दूसरा सहारा नहीं होता).यहाँ भगवान ने एक शब्द कहा "अनन्यगति".

इसका बड़ा महत्व है.क्योकि सेवक ऐसा ही होना चाहिये,एक होती है "अनन्य गति" एक होती है "अधोगति". मन की गति भी बड़ी विचित्र है मन की हमेशा अधोगति ही होती है.जितने गलत काम हम शरीर से नहीं कर पाते,वे सब गंदे काम मन से कर चुका होता है,मन का तो काम ही उल्टा है.  

मन को ऊपर उठने में आनंद नहीं आता,क्योकि मन की चार बाते है -

1.तामस 2.तुलना 3.तर्क और 4.तोडना.  

1.तामस - अर्थात अँधेरे में रखना,मन हमेशा हमें अँधेरे में रखता है,उद्देश्य नजर नहीं आता,डर लगता है,मन प्रकाश से डरता है.समाधान में कभी नहीं रहता.


2. तुलना -
चीजो में तुलना कराता है,ये ठीक है ये गलत है,ये अच्छा है ये बुरा है,बस इसी तरह के तर्क में लगा रहता है.


3.तोडना - मन हमेशा खंड-खंड करता है,भगवान को भी खंड खंड करता है और इंसान को भी,मन तोडके देखता है.


4. तर्क -
तर्क करता रहता है,किसी व्यक्ति का कोई कार्य अच्छा लगा तो अच्छा कहेगा,और यदि उसी व्यक्ति का कोई कार्य परिस्थिति बस अच्छा नहीं लगा तो घटना से प्रेरित होकर तर्क ये मन करता है.


हनुमान जी तो सच्चे सेवक थे,मन की अनन्य गति थी,इसलिए भगवान ने उठाकर ह्रदय से लगा लिया,परन्तु हमारा मन तो अधोगति में ही है.इसलिए मन को प्रशिक्षित करे,मन को प्रशिक्षित करने के लिए आठ चरण है - 

1. श्रद्धा से जोड़े - माता-पिता से जुडने पर मन में श्रद्धा आ जाती है.

2. समर्पण - गुरु के चरणों से जुडने पर मन में समर्पण आ जाता है.

3. विश्वास - पति पत्नी के रिश्ते से मन में विश्वास आता है.

4. प्रार्थना - परिवार में प्रार्थना करे.इससे मन प्रार्थना से जुडता है.

5. सेवा - समाज सेवा,राष्ट सेवा से मन में सेवा का भाव आता है. 

6. परिश्रम - व्यवसाय में लगा दो,किसी काम में लगा दो,

7. भाव से -  भाव से जोड़िए,बिना भाव कुछ भी नहीं.

8. ध्यान - ध्यान से जोड़िए.


DISCLAIMER:Small effort to expression what ever we read from our scripture and listened from saints. We are sorry if this hurts anybody because information is incorrect in any context.
!! जय जय श्री राधे !!
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