Theme :
Home
Granth
eBook
Saint
Leelaye
Temple
Yatra
Jap
Video
Shanka
Health
Pandit Ji

पूर्व जन्मों के कर्मों के संचित फल प्रारब्ध बन इस जन्म में कैसे फलीभूत होते हैं?


  Views :693  Rating :0.0  Voted :0  Clarifications :4
submit to reddit  
2719 days 9 hrs 7 mins ago By Gulshan Piplani
 

होनी तो होकर रहे नहीं हाथ हमारे टाल | आत्मा बुद्धि करे भ्रष्ट तब गुरु ही करे संभाल || जीव के पूर्वजन्म के अच्छे बुरे कर्म जो की संचित रह गए होते हैं और वह कर्म प्रारब्ध बन परिपक्व अवस्था को प्राप्त होने के समय, जीवात्मा के साथ घुल-मिल जाते हैं| जिस प्रकार अग्नि लकड़ी में प्रवेश करती है, वैसे ही पके हुए संचित कर्मफल जीव में प्रवेशकर सुलगते रहते हैं और सरंचना होती है वासना की, इसे स्वभाव या फिर मनुष्य की प्रकृति भी कहा जाता है| जब अच्छे कर्म फलीभूत होने होते हैं तो अज्ञानी से अज्ञानी व्यक्ति एव्म गरीब से गरीब व्यक्ति से भी आत्मा ऐसा कार्य संपन करवा देती है जिससे उसे अतिशय संसारिक सुखों की प्राप्ति हो जाती है| प्राय: हमें ऐसा भासित होता है की यह कार्य हमने अपनी बुद्धि से किया है और हमारे ज्ञान का दंभ हमारे अन्दर अहंकार का सृजन कर देता है और अपार संसारिक सुख होते हुए भी कर्मानुसार सुख:-दुःख प्राप्त होते रहते हैं| ज्योंही बुरे प्रारब्ध के फलीभूत होने का समय आता है, मनुष्य की बुद्धि पथ भ्रष्ट हो जाती है और प्रारब्ध को फलीभूत कर देती है| यहाँ हम इस बात को एक और ढंग से समझते हैं जिससे विषय को समझना आसान हो जायेगा| सामान्यता लोग इसी बात को नहीं समझ पाते की पूर्व जन्मों के कर्मफल इस जन्म में फलीभूत कैसे होते हैं| यहाँ एक दोहा जोकि मेरी ही पुस्तक ‘ गुरु-गीता ‘ से लिया गया है विषय को समझाने के तर्कसंगत होगा: रथी आत्मा, रथ शरीर, बुद्धि को सारथि मान| विषय चारा इन्द्रिय घोड़ों का, मन को लगा लगाम|| पीछे बेठी आत्मा रथी है और शरीर रथ है और बुद्धि रुपी सारथि उस रथ को चला रहा है| हमारी इन्दिरियां रथ पर जुड़े घोड़े हैं और मन रुपी लगाम का सहारा सारथि को है जिस से वोह रथ को चला रहा है| विषय इन्दिरियों का चारा हैं| यहाँ समझने वाली बात यह है की आत्मा रथी है अर्थात सारथि (बुद्धि) रथी (आत्मा) के अधीन है| जीवन में ज्योंही हमारे पूर्व जन्मों के प्रारब्धों के फलीभूत होने का समय आता है रथी अर्थात आत्मा बुद्धि को निर्देश दे कर पूर्व जन्मों के अच्छे-बुरे फलों को फलीभूत करवा देती है| बुद्धि अर्थात सारथि को अपने मालिक अर्थात रथी की बात का पालन करना पड़ता है| अपने जीवन में अगर हम नज़र डालें तो कई बार इस तरह की परिस्थितियाँ आती हैं जहाँ हम अपने अन्तकरण से दो आवाजें सुनते हैं| जिसमें एक आवाज़ आत्मा की होती है और दूसरी बुद्धि की| इस जन्म के सारे कार्य बुद्धि ही करती है क्योंकि मन रुपी लगाम भी बुद्धि के ही हाथ में होती है अगर वोह नहीं चाहे तो मन बुद्धि के अधीन होने के कारणवश बुद्धि पर हावी नहीं हो सकता परन्तु पूर्वेजन्मों के कर्मानुसार फलों को फलीभूत कराने हेतु रथी ( आत्मा) मन को भी हथियार बना उसे विषयों में उलझाकर भी अर्थात नयी नयी चाहतें उत्पन कर पूर्वेजन्मों के प्रारब्ध को फलीभूत करवा लेती है| हम अपने जीवन के इतिहास पर ध्यान दें तो ज्ञात होता है की कई बार हमारे पास समुचित वक्क्त होते हुए भी हम कई कार्यों को लंबित छोड़ देते हैं अर्थात आलस्य के वशीभूत हो हम महत्वपूर्ण कार्यों को भी लंबित छोड़ देते हैं जिसको करने हेतु हम सक्षम भी होते हैं और उसी कारणवश हमें हार या घाटे का मुंह देखना पड़ता है| दरअसल प्रारब्ध को फलीभूत कराने हेतु आत्मा (रथी) मन को भटका कर भी पूर्वेजन्मों के कर्मफल प्रदान कर देती है| क्योंकि आत्मा इस शरीर रुपी रथ की मालिक है इस कारणवश लगाम सारथि के अधीन होते हुए भी अपने असली मालिक रथी के ही अधीन है| यहाँ समझने वाली बात यह है कि रथी अर्थात आत्मा सारथि अर्थात बुद्धि को निर्देश देकर उसे मन कि बात मानने को विवश कर देती है और पूर्वेजन्मों के कर्मफल फलीभूत हो जाते हैं| अगर हम होनी को टालना चाहें तो भी नहीं टाल सकते| संचित कर्मो के फलों को तो स्वयं भगवान् भी नहीं टालते परन्तु परमात्मा एवं गुरु उन फलों के ताप को कम अवश्य कर सकते हैं| ‘ गुलशन हरभगवान पिपलानी ‘

2719 days 18 hrs 32 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... शारिरिक रूप में फलीभूत होते हैं..... प्रारब्ध के कारण ही भौतिक देह की प्राप्ति होती है।

2720 days 4 hrs 14 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

जन्म के साथ जो हमारे जीवन की रूप रेखा हमें मिलती है उसे ही प्रारब्ध कहते हैं और उसी के अनुसार हमारा जीवन चलता है उसी के अनुसार हमें माता पिता घर परिवार धन सम्पत्ति मित्र सहोदर मिलते हैं | यूँ तो जीव में सभी संस्कार होते हैं पर जो रूप रेखा हमें मिलती है उसके अनुसार उन संस्कारों का उदय होता रहता है | और हम अपने जीवन के उन उदय हुए संस्कारों के अनुसार भोग भोग लेते हैं | पर कभी कभी ऐसा संयोग भी होता है की जो रूप रेखा के अनुसार हमारा जीवन चल रहा होता है ठीक उसके विपरीत कोई संस्कार प्रभु कृपा से उदय हो जाते हैं और हमारा जीवन बिल्कुल पलट जाता है | हो सकता है वो भी उसी रूप रेखा में लिखा हो पर देखने में ऐसा नहीं लगता | जो भी भोग हम इस जीवन में भोगते हैं वो सब हमारा प्रारब्ध ही है | ज्योतिष विज्ञान ऐसा ही मानता है | राधे राधे

2720 days 10 hrs 59 mins ago By Avichal Mishra
 

Purva janmon ke sanchit karmon ke hi anusar hamain; is janm main priwar; bandhu; bandhaw; bairi; mitra; sukh-sampati; man aur budhi(sthir aur Anstir) Milti hai...

 
Tags :
Radha Blessings



Click here to know more about Radha Blessings
Popular Article
Latest Video
Latest Opinion Topic
Latest Bhav
Spiritual Directory


Today Top Devotee [0]

Today Opinion Topic

हम अधिक अनुशासित कैसे बने?

Radhakripa on Mobile

This Month Festivals

Guru/Gyani/Artist
Online Temple
Radha Temple
   Total #Visiters :1363
Baanke Bihari
   Total #Visiters :297
Mahakaal Temple
   Total #Visiters :
Laxmi Temple
   Total #Visiters :246
Goverdhan Parikrima
   Total #Visiters :357
Animated Leelaye
Maharaas Leela
   Total #Visiters :381
Kaliya Daman Leela
   Total #Visiters :
Goverdhan Leela
   Total #Visiters :
Utsav
Radha Ashtami
   Total #Visiters :
Krishna Janmashtami
   Total #Visiters :
Diwali Utsav
   Total #Visiters :246
Braj Holi Utsav
   Total #Visiters :
eBook Collection
सभी किताबे
राधा संग्रह
ग्रन्थ
कृष्ण संग्रह
व्रज संग्रह
व्रत कथाएँ
यात्रा
Copyright © radhakripa.com, 2010. All Rights Reserved
You are free to use any content from here but you need to include radhakripa logo and provide back link to http://radhakripa.com