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सन्त

संत तो मेरे लिए पूज्य है! फिर भी.... संन्तो का व्यक्तिगत जीवन कैसा होना चाहिए| क्या भगवा कपडे पहनना, माथे पर तिलक लगाना ये जरुरी है |अगर नहीं तो ये दिखावा क्यों,अगर हा तो इतने आडम्बर का क्या अर्थ निकलना चाहिए|

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2660 days 15 hrs 10 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

सन्त का व्यक्तिगत जीवन कैसा हो प्रश्न तो विचारणीय है | सन्त कौन है, सन्त वो है जिसकी सभी समस्याओं का अंत हो चुका हो जो पूर्ण संतुष्ट हो जिसमे मन में अब किसी तरह का ना संकल्प उठता हो ना विकल्प बनता हो | बिल्कुल शांत हो | ना केवल बाहर से देखने में शांत लगे वरन अन्दर से भी पूर्ण शांत हो | कई बार बाहर से देखने में व्यक्ति बढ़ा शांत नज़र आता है पर अन्दर से नहीं होता | हो सकता कई बार देखने में ऐसा लगे कि कोई सन्त बाहर से शांत ना नज़र आता हो पर अन्दर से पूर्णतया शांत हो ऐसे सन्त को उसके साथ रहकर पहचाना जा सकता है | कहते है सन्त की पहचान करनी हो तो उनके साथ रात बितायो जानो की रात को वो कितना शांत सोते हैं | जो अन्दर शांत होगा उसकी नींद उतनी ही बेफिक्र और मस्त होगी सोते समय चेहरे पर एक अद्भुत आभामंडल होगा | क्योंकि वही एक अवस्था ऐसी होती जिसमे किसी तरह की बनावट नहीं होती | सन्त को उसके कपड़ो से नहीं उसकी बाहरी बनावट से नहीं उसके भीतरी गुणों से पहचाना जाता है | पर ये कहना गलत है की भगवा कपडे पहनना या माथे पर तिलक लगाना कोरा आडम्बर है | ये एक सन्त की पोशाक है कोई आडम्बर नहीं है भगवा पोशाक में एक सात्विकता है और तिलक तो लगाया ही दसवें द्वार पर जाता है उसका तो वैज्ञानिक और अध्यातिमिक महत्त्व है ही | अगर कोई इस पोशाक का गलत इस्तेमाल करता है तो इसका मतलब ये नहीं की पोशाक और तिलक का महत्व ख़त्म हो गया | ये बिल्कुल ऐसा ही है जैसे कोई व्यक्ति पुलिस की पोशाक पहन कर कहे की मैं पुलिस वाला हूँ तो इसका मतलब ये थोड़े ही है की पुलिस की ड्रेस आडम्बर है और पुलिस वाले उसे धारण ना करें | वो उनकी ड्रेस है वो तो धारण करेंगे ही बस हमें सावधान रहना है ऐसे नकली लोगो से | राधे राधे

2660 days 23 hrs 17 mins ago By Gulshan Piplani
 

वह मनुष्य जो विरागी हो, संतुष्ट हो, संभावी हो, समिष्टि के लिए कर्म करे,स्वम अपने लिए खाना न बनाये, धरम नियम का पालन करे, नित्ये स्वाध्याय करे, लोभी न हो, आत्मचिंतन करे, परमातमचिंतन करता हुआ परमात्म तत्व को प्राप्त हो जाये उसे संत कहते हैं| हमको भगवे कपड़ों से कोई परहेज़ नहीं होना चाहिए, तिलक से भी, सोचने वाली बात यह है कि हम वर्तमान परिवेश में भगवे कपड़ों को एक वर्दी अर्थात समरूपता के समान ग्रहण कर सकते हैं| तिलक भी हर सम्प्रदाए के अलग अलग होते हैं यह भी एक पहचान है दिखावा नहीं, दिखावा छुपाये नहीं छुपता यहाँ एक शेर अर्ज़ है: सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के असूलों से| के खशबू आ नहीं सकती कभी कागज़ के फूलों से|| बनावट पकड़ी जाती है| झूठ का अस्तित्व बहुत देर तक नहीं ठहरता| आडम्बर भी बहुत देर तक नहीं टिकता| इस को यूं समझ सकते हैं कि अगर आप ने किसी के साथ भलाई की और वह उसे गलत समझ जाये तो आपको क्या करना चाहिए, क्या हमें भलाई करनी छोड़ बुराई के रस्ते पर चल देना चाहिए, कभी नहीं न|

2660 days 23 hrs 29 mins ago By Nidhi Nema
 

राधे राधे,माथे पर तिलक लगाना और भगवा कपडे पहिनना आडम्बर नहीं है उसे अपने महत्व है.जैसे तिलक अलग-अलग तरह हा होता है जो अलग अलग इष्ट को मनाने वाले लगते है दोनों भोहो के बीच में तिलक लगाने से जो शरीर के अन्दर चक्र कहे गए है उनकी क्रियाशीलता के लिए लगाया जाता है. इसी तरह भगवा वस्त्र का रंग अग्नि कि तरह होता है,जिस प्रकार अग्नि में तेज और तप होता है उसी तरह भगवा वस्त्र भी संत के तेज और सात्विकता को दर्शाते है,इसलिए भगवा वस्त्र और तिलक का महत्व है.

2660 days 23 hrs 33 mins ago By Nidhi Nema
 

राधे राधे,संत जीवन तो बड़ा विलक्षण होता है.एक चोटी सी कहानी याद आती है,एक संत के पास एक व्यक्ति गया और बोला कि मै सबकुछ छोडकर संत बनना चाहता हूँ,तो संत ने कहा - कि यदि तुम्हारा ऐसा भाव है तो हम संत ही हो,तो वाह व्यक्ति बोला- कि मै संत बनाने कि अभी तैयारी कर रहा हूँ,मैंने पोशाक सिलने डाल दी है,इतना सुनते ही संत जोर से हँसे और बोले फिर तो उम्र भर पोशाक ही सिलवाते रहना,क्योकि संत बनने कि तैयारी नहीं की जाती,अन्दर से त्याग और वैराग्य का भाव आ जाने पर व्यक्ति संत बन जाता है.मन में सांसारिक इच्छाएं है तो फिर वाह व्यक्ति वन मै भी नहीं राह सकता,और यदि सांसारिक इच्छाएँ शांत हो गई है तो वह व्यक्ति घर में भी संत ही है,उसे वन जाने कि जरुरत नहीं है,न ही भगवा कपडे पहिनने की.

2661 days 14 hrs 25 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... संत की परिभाषा अति सूक्ष्म हैं।.... जो व्यक्ति संतुष्टि के भाव में पूर्ण रूप से निरन्तर स्थिर रहता है वही संत होता है चाहे वह किसी भी वर्ण का हो या किसी भी वर्णाश्रम में ही क्यों न स्थित हो।.... जो व्यक्ति संतुष्टि के भाव में पूर्ण रूप से स्थित नहीं है और वाह्य रूप से साधु-संतो का वेष धारण करता है वह व्यक्ति पाखंडी होता है। ऎसा व्यक्ति स्वयं का ही शत्रु होता है।

 
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