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क्या कभी क्रोध नहीं करना चाहिये?


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2654 days 10 hrs 48 mins ago By Neeru Arora
 

prashan ka utter to yahi hai ki nahin karna chahiye. ans. - nahin(per ata hai alag baat hai)

2663 days 19 hrs 14 mins ago By Gulshan Piplani
 

क्रोध कमजोर को आता है अगर हम अपनी कमजोरी दूर करने में समर्थ न हों तो हमें क्रोध कर के अपनी कमजोरी का इज़हार जरूर करना चाहिए यह भी प्रभु प्रदान भाव है| कम से कम कमजोरी का इज़हार कर के हम शांत तो हो जायेंगे| पर अगर कारण को दूर करें तो अच्छा होगा|

2665 days 13 hrs 14 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... स्वार्थ की भावना के मिटने पर ही क्रोध का अंत संभव है।

2667 days 19 hrs 25 mins ago By Bhakti Rathore
 

jai shree radhe radhe ha karodh kerne se humhra man ashant ho jaata he aur hum raah bhtak jaate he

2669 days 17 hrs 14 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

क्रोध के मूल में तो काम है काम अगर पूरा हो जाए तो लोभ में बदल जाता है और अधुरा रह जाए तो क्रोध में | क्रोध जीव के षड विकारों में से एक है और इसकी एक और खूबी है वो ये की जब ये आता है सबसे पहले उसे हानि देता है जिसको आता है लेकिन हम सब जानते हैं की ऐसा है फिर भी आता है क्योंकि अहम् की तुष्टि क्रोध के आने से ही होती है | अब सवाल ये है क्रोध नहीं करेंगे तो बहुत से काम गलत होने लगेंगे तो हर बार चुप रहे या इगनोरे कर दें तो भी काम नहीं चलेगा | फिर क्या करें संत कहते हैं क्रोध ना करो और संसार में क्रोध न करें तो भी काम नहीं चल सकता | अब संत तो गलत नहीं हो सकते वो जो कहते हैं सही ही कहते हैं उनके कहने का तात्पर्य ये है की क्रोध अहम् की तुष्टि के लिए न करो ह्रदय से ना करो क्रोध जब ह्रदय में उत्पन्न होता है तब नुक्सान करता है | क्रोध नहीं करना केवल फुन्कारना है | इसे एक उदहारण से समझ सकते हैं | एक सर्प था एक गाँव के बाहर रहता था | जब भी कोई उसके पास से गुजरता वो उसे डस लेता | एक दिन एक सन्यासी उधर से निकले जैसे ही उसने उन्हें डसने के लिए फन उठाया सन्यासी का तेज देख डस न सका | तब सन्यासी ने कहा की क्यों किसी को डसते हो क्यों पाप में पढ़ते हो इसे छोड़ दो | सर्प ने उनकी बात मान ली | कुछ दिनों बाब वही सन्यासी वहां से निकले तो देखा सर्प अधमरा सा पड़ा है | सन्यासी ने पूछा ये कैसे हुआ सर्प बोला आपकी शिक्षा का असर है ये | ये गाँव वाले जो मुझसे डरते थे आज मुझे पत्थर मारते हैं इसलिए ऐसा हो गया हूँ | तो सन्यासी बोले मैंने डसने के लिए मन किया था पगले फुंकारने के लिए नहीं | कहने का तात्पर्य ये है की क्रोध करना नहीं क्रोध का नाटक करना है जब जरूरत पड़े सिर्फ दिखावा करना है क्रोध का पर अन्दर से मस्त रहना है | राधे राधे

 
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