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परिग्रह क्या है और साधना में ये कितना बाधक है ?


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3089 days 20 hrs 57 mins ago By Vandana Goel
 

Parigrah means to accumalate material things for future use indirectly it cud mean not to have complete faith on paramtma as super soul and care taker of living entity.

3169 days 17 hrs 31 mins ago By Gulshan Piplani
 

परिग्रह का अर्थ है जो हमें चारों ओर से ग्रहण कर रहा है , अथवा जिसे हमने चारों ओर एकत्रित कर लिया है ; वही परिग्रह है| साधना मैं यह उतना ही बाधक है जितना अग्नि के प्रज्वलित होने में पानी|

3179 days 1 hrs 22 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा..... जो वस्तु अपनी नहीं होती उसे अपना समझना ही परिग्रह कहलाता है।..... जब तक व्यक्ति स्वयं को शरीर समझता रहता है तब तक व्यक्ति परिग्रह का शिकार बना रहता है, यह परिग्रह ही आध्यात्मिक पथ की साधना में सबसे बड़ी बाधा है।

3179 days 11 hrs 17 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

nidhi bahut sundar likha hai.......radhe radhe

3180 days 9 hrs 38 mins ago By Nidhi Nema
 

राधे राधे . परिग्रह का अर्थ है - जो हमें चारों से ग्रहण कर रहा है ,अथवा जिसे हमने चारों ओर एकत्रित कर लिया है वही परिग्रह है । अन्य प्रकार से देखा जाये तो 'ग्रह' का अर्थ होता है पीड़ित करने वाला । अर्थात जो हमें चारों ओर से पीड़ित संतापित करे एवं दुखी करे वह परिग्रह है । ऐसे इस संतापकारक परिग्रह को हम अपने इर्द-गिर्द एकत्रित कर लेते है । आगम व्यवहार की अपेक्षा अन्तरंग एवं बहिरंग पदार्थ का त्याग हो जाने पर ही आकिंचन्य स्वभाव की जाग्रति हो सकती है । विवेचना को ज्ञान का माध्यम बनाते हुये भी आचरणीय यही है कि हम ‘स्व’ और ‘पर’ के यथार्थ स्वरूप का अवलोकन कर, ‘पर’ से ‘परे’ स्व स्वरूप को प्राप्त करने की भावना बनाएं । जो दृष्टि बाह्य में है उसे अन्तर्मुखी बनाने का प्रयत्न करें और एक ही चिन्तन करें कि क्या लेकर मैं आया था और क्या लेकर मैं जाऊँगा ? इसके साथ ही सम्पूर्ण विश्व में कौन मेरा है ? जैसे एक साधु थे , जिसके हाथ अंतिम सांसें गिनते हुए कुछ टटोल रहे थे। पता चला कि वह अपनी पोटली खोज रहा है, जिसमें उसकी जमा- पूंजी थी। परिग्रह की माया ही कुछ ऐसी है, जो किसी को नहीं छोड़ती। अपरिग्रह भवसागर से तारता है, जबकि परिग्रह डुबोता है। सांसारिक जीवन में हम नाना प्रकार के प्रलोभनों से घिरे रहते हैं। भौतिक पदार्थों का आकर्षण इतना प्रबल होता है कि हम निरंतर उनका संचय करते जाते हैं। पदार्थ किसी को नहीं बांधता, हम ही बेजान पदार्थों की मूर्च्छा में बंधकर रह जाते हैं। उनके प्रति हमारी आसक्ति दिन प्रतिदिन बढ़ती जाती है। यह आसक्ति ही है कि दौलत बैंक में होती है और उसका नशा आदमी के भीतर। यह परिग्रह ही है, जो मन में अलगाव पैदा करता है, जिससे 'मैं' और 'तुम' के बीच आदमी खड़ा हो जाता है। इसी से अतृप्ति जागती है। जो सब कुछ पास होने पर भी 'अभी और चाहिए' की प्यास को जगाती है। यह इतनी नशीली होती है कि बुराई को बुरा जानते हुए भी हम स्वयं को उससे बचा नहीं पाते हैं। परिग्रह ही चंचलता को बढ़ावा देती है। मनुष्य का मन वैसे ही बड़ा चंचल होता है। और मन यदि और चंचल हो जाये तो साधना कैसे होगी क्योकि साधना में मन ही तो महत्वपूर्ण है .

 
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