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पाप किसे कहते हैं विस्तार से बतायें?

क्या पुण्यों द्वारा पापों को भस्म किया जा सकता है? अपना मत शास्त्रानुसार दें|

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2411 days 2 hrs 8 mins ago By Balvinder Aggarwal
 

हरी ओम तत्सत :जीवन में किया वो हर मन,वचन,कर्म से किया हुआ कर्म जिससे किसी भी प्राणी मात्र का बुरा होता हो वोह पाप है

2472 days 22 hrs 29 mins ago By Jaswinder Jassi
 

PAAP... vo kirya hai jo smajj ko asshi nhi lggti aur smajj chahta hai ke ye koyi na krre....
PUUN... vo kirya hai jo smajj ko asshi lggti hai aur smajj chahta hai ke ye sbbi krre...
**JASSI**

2472 days 22 hrs 39 mins ago By Jaswinder Jassi
 

PAP kya HAI...?
ये दुनिया भगवान ने अपनी प्रकिती से बनवाई और प्रकीर्ति ही इससे चला रही है ] और
प्रकीर्ति ने जीवों की रचना अपनी प्रकीर्ति को चलाने के लिए की है न के किस्सी धर्मकर्म के कारेओ के लिए जीव(मानुष) पैदा किये हैं ] प्रकिरती के नौ मूल स्रोत हैं (सूरज, चाँद ,तारे, मिटी ,अग्नि ,पानी, वायु{हवा }, जी{मनं }, और आकाश{आवाज़ } मिटी-अग्नि - पानी वायु और आकाश के मुख स्रोत से कण निकल कर आपस में जुर्ते हैं और एक बॉडी (सरीर) की रचना होती है ] जे रचना जब से प्रकीर्ति होन्द में आई तब्ब से लगातार हो रही है ] जिस के कारण मुख स्रोतों में कम्मी आना लाजमी है अगर प्रकीर्ति उस कमी को पूरा नही करेगी तो एक सम्मे ऐसा आयेगा जब प्रकीर्ति में बॉडी ही बॉडी होंगी ]
इस लिए प्रकीर्ति ने बॉडी( तन्न ) के साथ मनं लग्गा कर जीवों की रचना कर दी , जीव क्या करते हैं ,सबबी प्रकार के जीव वस्तू (बॉडी/तन्न ) खुराक के रूप अपने सरीर के अंदर ले जाते हैं जीवों के सरीर के अंदर रर्सैनिक किर्या होती है जिस से वस्तु अपने मूल तत्व में टूट जाती है ,मल के रूप में जीव उस को सृष्टी बखेर देता है जो अपने मूल तत्व (पानी पानी में हवा हवा में मिटी मिटी में अग्नि अग्नि में और आकाश आकाश में मिल कर उन स्रोतों आई कम्मी को पूरा कर देते हैं ] मानुष का तिआगा मल पशु खा जाते हैं , पशुओं का तिआगा मल पक्षी खा जाते हैं और पक्षिओं की बीठ बनस्पति खाती है ]ये किर्या चारोँ प्रकार के जीव मिल कर लगातार करते रहते हैं ]
प्रकीर्ति ने जीवों की रचना केवल इस्सी लिए की हुई है , ये धर्म कर्म पाप पुन स्वर्ग नरक मानुष की अपनी रचना है और कुश नही ]
अब्ब विचारण की बात ये है के जीव निर्जीव की रचना में परमात्मा का रोल है ] किओके परमात्मा कोई वस्तु नही केवल ख़ाली स्थान जो के हर समय हर जगह मजूद रहता है , इस को कोई वस्तु नही कहा जा सकता मगर सभी वस्तुए इस के कारण इस के भीतर से ही दिखाई देती एक कण से ले कर ग्रेह तक इस के घेरे में हैं ] सबी इस में ही चल रहे हैं ] ये वस्तु से पहले बी होता है , वस्तू नज़र आते सम्मे ये वस्तु के चोगिर्द रहता है और जब वस्तु नही होती ये फिर बी व्ही पर होता है ] ये कही से नही आता और न ही कही जाता ] जीव निर्जीव वस्तुओं के कण इस में चल कर ही आपस में jur कर पंज तत्व वस्तुओं की रचना करते हैं ] सारी प्रकीर्ति सभी वस्तुए इस में टिकी हुई हैं और चल रही हैं >>>>>>>>> जस्सी

2476 days 5 hrs 29 mins ago By Diwakar Kushwaha
 

पाप और पुण्य ये वह पहलु है जीवन के जिनपर सभी प्राणियो का जीवन निर्भर करता है , सभी प्राणी कर्म करते हैं और ये कर्म दो प्रकार के होते हैं पुण्य कम और पाप कर्म और उन्ही कर्मो के अनुसार योनी प्रदान होती है अब प्रश्न यह है की पाप कर्म क्या हैं
मेरे विचार से किसी भी जीव को बिना किसी अनुपयुक्त चेष्टा(किसी को हानि) के दण्डित करना चाहे वह शब्दों के माध्यम से हो , चाहे धन के माध्यम से या फिर शरीर के माध्यम से वह पाप है और यदि हम किसी ऐसे के प्रति शक्ति अपनाते हो जिसने अनुपयुक्त चेष्टा की हो तो वह धर्म को समर्पित हमारा कर्म होगा जो हमे पाप का नहीं पुण्य का भागी बनाता है ----हरी ॐ तत्सत

 
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