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Kis Prakaar Jeevan Ko Saarthak Banaye?

hum sabhi ne is sansar me kisi na kisi pariwaar me janma liya hai aur bahut se rishto se bandhe hain humare apne pariwaar ke liye bahut se kartavya hai, yadi hum in sabhi sansarik chestao se dhyan hatakar kaam,krodh,made,mohe aur lobh ko tyagkar apna dhyan keval un ishwar me lagate hain,to kya apne sansarik karmo se vimukh hokar karmvihin nahi ho jayenge,jinke nirvaah per humara he nahi balki aur praniyo ka bhi jeevan nirbhar hai.

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2292 days 15 hrs 2 mins ago By Waste Sam
 

राधे राधे, भगवन का स्मरण सदा बनाये रखे किसी भी परस्थिति में,बस यही सब चिन्ताओ का हरण करता है अर्थात चिंता नही चिंतन करे | जय श्री राधे  

2294 days 14 hrs 47 mins ago By Bhakti Rathore
 

radhe radhe subka palan haar thakur ji he na fir kis baat ki chinta

2294 days 14 hrs 47 mins ago By Bhakti Rathore
 

subka wo palnhaar he ye chinta uski he na ki hanari bus apna kerm ker o aur fal us per chod do radhe radhe

2294 days 14 hrs 49 mins ago By Bhakti Rathore
 

radhe radhe subka palan haar thakur ji he na fir kis baat ki chinta

2294 days 19 hrs 57 mins ago By Gulshan Piplani
 

आप स्पष्ट रूप में यह कहना चाहते हैं कि सांसारिक होने के नाते जब हम बन्धनों में बंध जाते हैं तो मात्र हमारे ही नहीं और प्राणियों का भी जीवन हम पर निर्भर करता है| २) और अगर हम बन्धनों अर्थात आपके शब्दानुसार सभी सांसारिक चेष्टाओं से ध्यान हटा कर काम,क्रोध, लोभ, मोह, मद माया इत्यादि को त्यागकर ध्यान मात्र इश्वर में लगाते हैं तो हमसे बंधे हुए लोग और अन्य प्राणी जो हम पर निर्भर हैं उनका क्या होगा?........new paragraph .........हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे .......पहले प्रश्नानुसार हम यह मानते हैं कि हम बन्धनों में बंधे हैं और ऐसा सोचना कि उस वजह से हम पर और प्राणियों की भी जिम्मेवारी है तो यह मात्र अज्ञानता है क्योंकि अगर हम इसके विपरीत ढंग से सोचेंगे कि हम नहीं रहंगे तब हमारे बच्चों की जिम्मेवारी किसकी होगी| इस सृष्टि का नियंता कौन है? संसार में ८४,००,००० लाख योनियों में मनुष्य मात्र एक ऐसी योनी है जो यह समझती है| बाकि की ८३,९९,९९९ योनियाँ इस धरती पर जो पाल रहा है क्या वोह एक योनी के सम्बन्धियों का ध्यान नहीं रख सकता? जब पालनहार मोजूद है फिर भी बिना बात अपने उपर बोझ लेना ही मोह है मैं यह सब कुछ कर रहा हूँ यह मद है और सम्बन्धी माया का रूप हैं और यह सब ही हमें लोभी बनाते है और काम , क्रोध और लोभ ही नरक भोगने का कारन हैं जब हम ऐसा समझने लगते हैं तो कुछ भी त्यागने की आवश्यकता नहीं रह जाती और काम क्रोध, मोह मद, लोभ इत्यादि स्वम नष्ट होने लगते हैं| जीवनपर्यंत मनुष्य बन्धनों में स्वम को यही समझ कर फंसाए रखता है और मुक्त नहीं हो पाता|.......................new paragraph...........................................गीता जी के मोक्षसंन्यासयोग अध्याय - १८ के ७ शलोक का दोहा अनुवाद मेरी पुस्तक गीताजी कविताजी से उद्धृत है ,................................. निषिद्ध कर्म काम्य कर्म का करो स्वरूप से त्याग| नित्य कर्म का त्याग तामसी, मोहवश न इससे भाग|| १८.७ | ...................इसमें स्पष्ट निर्देश भगवान् श्री कृष्ण ने दिया है कि हमें वेदों और शास्त्रों द्वारा निषिद्ध कर्म और काम्य कर्मों का स्वरूप से (मन, वचन और कर्म से) त्याग करना है परन्तु दूसरी तरफ ये भी स्पष्ट निर्देश दिया है कि नित्य कर्म जिसका माध्यम और निमित प्रभु ने हमें बनाया है जिससे सृष्टि चलायेमान है उनका त्याग नहीं करना है उनके त्याग को भगवान् कृष्ण ने तामसी बताया है|.......... दूसरा आप सौभाग्येशाली हैं जो काम क्रोध लोभ मोह और मद इत्यादि को समझने और निकलने का रास्ता ढूंढ रहे हैं| आपके प्रश्न से आपकी प्रभु के प्रति आस्था स्पष्ट होती है और यही आपको जल्दी ही आनंद की स्थिति में पहुँचाने में सहायक होगी| ..........................गीता जी के अध्याय - १६ देवासुरसम्पदविभागयोग के शलोक संख्या - २१ का हिंदी में मेरी पुस्तक गीताजी - कविताजी से एक दोहा उद्धृत है : नरक के समझो तीन द्वार हैं, काम, क्रोध और लोभ| बुद्धिमान जन तजते इन्हें, नहीं रखते आत्मन क्षोभ|| १६.२१ || अर्थात इनका त्याग ज्यों ज्यों हम करते जायेंगे त्यों त्यों आनंद प्राप्त होने लगेगा परन्तु जिम्मेवारी स्वम पर न लेते हुए भगवान् पर सौंप दे और अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते रहें| - बाकि तो बस राधे राधे करता जा आगे आगे बढ़ता जा - राधे राधे

2295 days 4 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

....जय श्री कृष्णा....
 
जीवन केवल उसी व्यक्ति का सार्थक होता है जो अपने कर्तव्य-कर्मो को निष्काम भावना (फल की आसक्रि के बिना) से करता है, वशर्त व्यक्ति को अपने कर्तव्य-कर्म का ज्ञान होना चाहिये।

इसी को गीता के अनुसार भक्ति-योग कहा गया है, इसके अतिरिक्त अन्य किसी भी भावना से कोई भी कर्म किया जाता है उनसे मनुष्य जीवन व्यर्थ हो जाता है।

 
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