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टीका लिखने की अनाधिकार चेष्टा ,

स्वामी अड़गड़ानंदजी ने अपनी भगवद गीता(११/४१) की टीका में लिखा -\" जो राधा स्वयं श्री कृष्ण से नहीं मिल सकी ,वो तुमको क्या मिलवाएंगी | जो राधे -राधे कहते हैं वो मूर्ख होते हैं \"|क्या ऐसे स्वामियों को टीका लिखने का अधिकार है ?

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2227 days 14 hrs 47 mins ago By Pt Chandra Sagar
 

jay shri radhey

2294 days 23 hrs 15 mins ago By Dasabhas DrGiriraj N
 

आपकी-मेरी तारह एक सामान्य व्यक्ति नही हैं =

= aap n m ek samaanya vyakti hn.
kam se kam m to samanya hi hun.jsr.

2295 days 14 hrs 8 mins ago By Pt Chandra Sagar
 

पांच स्थानों में विरोध प्रकट करना निंदा के अंतर्गत नहीं आता-

१) यदि कोई मातृभूमि की निंदा करे |
२) यदि कोई माँ-बहन की निंदा करे |
३) धर्म व प्रभु नाम की निंदा जो करे , चाहे राम हों या अल्ला -खुदा अथवा जीसस क्राइस्ट    |
४) किसी भी धर्म के शास्त्र की निंदा जो करे |
५) अधिक जनमत से स्वीकृत कोई परंपरा का विरोध यदि करे |
इन ५ स्थानों पर यदि कोई विरोध न करे तो वह आध्यत्मिक नहीं हो सकता अपितु नपुंसक कहलाने का अधिकारी है |
प्रमाण हैं श्री राम एवं श्री कृष्ण , |जैसे बाली का वध , पौन्ड्रक का वध  ,नारद का शूद्र बनना , हनुमान द्वारा लंका -दहन ,|
निंदा उसे कहते हैं जो किसी के व्यक्तिगत  चरित्र ,गुण, जाती, कर्म, स्वाभाव ,अथवा किसी भी रहन- सहन  की आलोचना 
यदि करे तो वह निंदा के अंतर्गत आता है | अतः मैंने किसी भी व्यक्ति की निंदा नहीं की ,केवल नाम-अपराध करने वाले 
का विरोध किया है और आगे करता रहूँगा , क्योकि मै शास्त्रवादी हूँ |मै अब इस चर्चा को यहीं विराम दे रहा हूँ |
अपराध के लिए क्षमा चाहता हूँ |

2296 days 17 hrs 42 mins ago By Diwakar Kushwaha
 

Dasabhas DrGiriraj AAP APNEY KO SAMANYA NA KEHKAR SABHI KO SOOCHIT KAR RAHE HAI KI AAP ME AHAM BHAAV SHANKH NAAD HO CHUKA HAI. YEH MANCH SABHI KO SAMANTA AUR ADHYATMIKTA ME PARIPAKVATA HETU UPLABDH KARWAYA GAYA HAI, AB YAHA AAP JAISE GYANI AGAR AISI BAAT KARENGE TO HAMARE JAISE AGYANIYO KO GYAN KA PRAKASH KAISE MILEGA. 

2296 days 17 hrs 51 mins ago By Diwakar Kushwaha
 

Dasabhas DrGiriraj AAP APNEY KO SAMANYA NA KEHKAR SABHI KO SOOCHIT KAR RAHE HAI KI AAP ME AHAM BHAAV SHANKH NAAD HO CHUKA HAI. YEH MANCH SABHI KO SAMANTA AUR ADHYATMIKTA ME PARIPAKVATA HETU UPLABDH KARWAYA GAYA HAI, AB YAHA AAP JAISE GYANI AGAR AISI BAAT KARENGE TO HAMARE JAISE AGYANIYO KO GYAN KA PRAKASH KAISE MILEGA. 

2296 days 18 hrs 21 mins ago By Dasabhas DrGiriraj N
 

एक होता है भाव, एक होता है शब्द या वाक्य . शब्द या वाक्य से हि भाव क ग्यान होता है, लेकिन कभी कभी इन्में विरोध भी देखा जाता है, जो विवाद और भ्रम क कारण बान्ता है, जैसा कि यहाँ हो रहा है . अनेक लोगों क विचार पदने से मुझे लग रहा है कि स्वामी जी का भाव अशुद्ध नहीं है, लेकिन, पुज्य चंद्रसागर जी महाराज ने स्वामी जी द्वारा लिखित  जो वाक्य उद्धृत किए हैं, वे निश्चित हि 'आपत्तिजनक' हैं

यहाँ में आप सभी को बताना चाहुंगा कि पुज्य चन्द्र सगर जी भी आपकी-मेरी तारह एक सामान्य व्यक्ति नही हैं- ये ब्रिज्वासी हैं, हजारों भागवत सप्ताह कर चुके हैं, इन्के भी लाखों कि संख्या में भक्त, शिष्य हैं, शायद राधाक्रिपा के लिए ये नाम नया हो, हमारे लिए ये भी परम् पुज्य हैं, विद्वान है, सन्त हैं  अतः इन्के भाव क भी हमें सम्मान कर्णा चाहिए 
रही बात टीका लिखने कि तो हर व्यक्ति जो टिका लिखता है , वह उसका अपना अनुभव होता है, नाम-जप में स्वामी जी का विश्वास नहीं होगा -इसलिए उन्होने ऐसा लिखा
पुज्य चन्द्र सगर जी से भी में यह निवेदन कर्णा चाहुंगा कि आप तो विद्वान हैं, आप जन्ते हैं कि इन्ही तीकाओं के कारण, विभिन्न विचारों के कारण अनेक मत, सम्प्रदाय हैं  अतः स्वामी जी ने यदि कुछ ऐसा लिखा है, जो हमें अच्छा नहीं लगा तो हम उसे न पढें. स्वामी जी के अनुयायी तो उनका अनुगमन करेंगे हि.
देश, काल, परिस्थिति को देखते हुए अब यहाँ और चर्चा कर्णा उचित नहीं है, इससे राजोगुन और तमोगुन रुपी अहङ्कार कि वृद्धि हि होगी. प्रत्येक व्यक्ति को टिका लिखने का अधिकार है, प्रत्येक व्यक्ति को विरोध कर्ने क अधिकार है, विरोध एक नेगतिव शब्द है, विरोध = विचार. एक पोसितिव शब्द है,
पुनः मेरा सभी से निवेदन है कि इसे यहीं समाप्त करें और संतों के अपराध से बचें, मेरे इस अपराध को क्षमा करें ....... जे श्री राधे 

2297 days 2 hrs 16 mins ago By Diwakar Kushwaha
 

Chandra sagar ji aap ka tark shastra sammat hai. agar bhgwan sirf vidwata ke bhukhe hote to shayad un bhole bhale logo ko kabhi prapt nahi ho sakte thay jinke paas na shastro ka gyan aur na he akshar gyan hai. bhagwan vidwata ke nahi apitu bhaav ke bhookhe hai. bhaav se jo bhi unhe japta hai chhe dhani ho ya nirdhan,gyani ho ya agyani , shastra pandit ho athwa moorkh bhagwaan ko nischit prapt karta hai.

         mere anusaar shuddha bhakti aur bhav ke dwara ishwar ko darshan hetu vivash kar dene ki shakti  param gyani(jinhone apne ko ishwar ko saup diya ho) ya Moorkh(jinka ek he bhav ho ishwar darshan iske atirikt har or se vimukh) me he hoti hai. ye dono he jag me anuthe hai, sansar se vimukh hai. Inhe he nischit lakshya ke prapti hoti hai bus ishwar ka sumiran karney ki der hai.

2297 days 11 hrs 54 mins ago By Pt Chandra Sagar
 

आदरणीय राजेन्द्रजी , निधिजी ,रविजी, नेमाजी अवं समस्त सम्मानित पाठक गण सबको भक्ति पूर्ण प्रणाम !

मेरे प्रश्न को लगभग ४१५ लोगों ने पढ़ा है इसलिए कुछ कहने का साहस जुटा रहा हूँ |
सात वर्ष पहले उज्जैन सिंघस्त कुम्भ में किसी सज्जन ने मुझे निशुल्क 'यथार्थ गीता ' की एक प्रति भेंट की थी |
अपने शिविर ने जाकर मैंने अनायास एक पृष्ठ खोला तो अचानक वही पृष्ठ खुला जिसमे नाम जप का विरोध किया गया 
था | अपने इष्ट स्वरुप श्री कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति किशोरी जी के विषय में ऐसा पढ़कर मैंने तुरंत २ पेज पढ़कर 
किसी ब्राह्मण  को वह पुस्तक दान कर दिया |
आप सब विचार करके बताईये क्या भारत की १२० करोड़ जनता आप सबकी तरह विद्वान हो सकते हैं ?
क्या सब लोग व्याकरण का अध्ययन करके भगवान का नाम लेंगे ?क्या सब लोगों के लिए राधा नाम की व्याख्या 
जानकर राधा नाम लेना संभव है ? लोग तो भाव से नाम जपते हैं , क्यों की नाम जपमे कोई शर्त नहीं होती | 
आप सब जानते है -यग्य में विधि का भय , पूजा में सामग्री का अभाव , तीर्थ यात्रा में शरीर का भय ,व्रत में 
संकल्प का अभाव , योग में मन का भय होता है जबकि नाम जप में कोई भय नहीं होता , मानस में कहा है-
"भाय -कुभाय अनख आलसहू  ,नाम जपत मंगल दिसी दसहू |"भागवत में भी अजामिल उपाख्यान में  स्वयं यमराज 
यमदूतों से कह रहे हैं "-सांक्येत्यम  परिहास्यम वा -----" अर्थात संकेत में भी नाम जपे तो उस पर यमराज का अधिकार नहीं होता |
अब हम शास्त्र  की माने अथवा पूज्य स्वामिजिकी? गुरु पूर्णिमा में जो लाखो गाँवों के भक्त गोवेर्धन की परिक्रमा करते 
हैं उनको क्या पता राधा नाम का अर्थ क्या है , उन्हें बस नाम जपना होता है |बिदेशी अंग्रेज भी नाम अशुद्ध उच्चारण करते है 
तो क्या उन्हें उसका कोई फल नहीं मिलेगा ? फिर तो मानस की चौपाई झूंठी हो गयी | अब आप सब विद्वान मुझे बताएं की 
मानस सत्य है या स्वामीजी ?ऐसे कितने लोग हैं जो कृष्ण नाम का अर्थ जानकर नाम जपते हैं ? सब लोग आप जैसे विद्वान 
नहीं होते , अधितर लोग मेरे जैसे मूर्ख हैं जो सिर्फ नाम जपना जानते हैं , अर्थ तो श्री कृष्ण स्वयं जानते हैं | आपके कृष्ण कैसे हैं 
ये तो मैं नहीं जानता किन्तु मेरे कृष्ण सिर्फ भाव के भूंखे हैं , वो तो कैसे भी नाम जपो रीझ जाते हैं ,केवट से चरण धुलवा लेते हैं ,
शबरी बेर खा जाते हैं ,विदुर के घर साग खा लेते है | पर आप सबके कृष्ण केवल विद्वानों की सुनते हैं तो ऐसे विद्वता की 
बलिहारी हो |मैंने पूज्य रामसुखदास जी की टीका पढ़ी , प्रभुपादजी की भी पढ़ी , रामकिंकर जी का सम्पूर्ण साहित्य पढ़ा 
,पूज्य अखंडा नन्द जी का सम्पूर्ण साहित्य पढ़ा किन्तु कहीं भी नाम जप का विरोध किसी ने भी नहीं किया |केवल स्वामीजी एकमात्र 
अपवाद हैं | 

2298 days 14 hrs 36 mins ago By Nidhi Nema
 

राधे राधे,सभी ने राधा नाम कि व्याख्या तो की ही है साथ साथ आपकी शंका का समाधान भी किया है.क्योकि सभी ने यथार्थ गीता (११/४१)कि वह लाइन पढ़ी है जिसमे आपको शंका थी.और भक्तो को अपने-अपने,अवस्था से उसका गूढ अर्थ भी समझा है.अर्थ समझ लेने के बाद ही अपने अपने मत सभी ने रखे है.

2298 days 15 hrs 14 mins ago By Pt Chandra Sagar
 

आप सबको कोटि कोटि प्रणाम ! भगवन आप सबने राधा नाम की व्याख्या करदी |" राधा रस सुधानिधि "ग्रन्थ किशोरीजी की महिमा से ओतप्रोत है | मेरा प्रश्न है उस श्लोक की व्याख्या जिसमे स्वामीजी ने नाम जप के विरोध का द्रष्टान्त दिया |श्लोक है - सखेति मत्वा -------वापि| गीता (११/४१) अर्जुन ने क्षमा इसलिए मांगी की उसने अनजाने में भगवान की भगवत्ता का ध्यान न रखते हुए हे कृष्ण ! हे यादव ! हे सखा आदि शब्दों से उपेक्षित रूप से सम्बोदन किया | यहाँ नाम का विरोध अर्जुन ने कब किया ?श्लोक में स्पष्ट कहा --'अजानता महिमानं तवेदं अर्थात अनजाने में कृष्ण की महिमा को न जानकर जो आचरण किया जैसे साथ में उठना -बैठना , खाना पीना आदि के कारन क्षमा मांग रहे हैं | अस्तु आप सबने राधा नाम की व्याख्या करने की कृपा करी सो आप सबको अनेक -अनेक धन्यवाद |क्या करूँ मै तो मूर्ख हूँ , पर आप सब महापुरुषों का सानिद्ध मिला हैं तो अब कुछ अवश्य सीखने का प्रयास करूँगा |हम ब्रिजवासी तो जनम से ही अभिमानी होते हैं क्योंकि वृज में जन्म लेने का झूंठा अहंकार जो होता है |घर की वस्तु की हमेशा उपेक्षा होती है इसलिए हम अपनी किशोरीजी को कहाँ समझ पाते हैं ?आप लोग वृज से बाहर रहते हैं इसलिए किशोरीजी से अधिक प्रेम करते हैं |क्या करूँ भाई! कोई हंसी में , व्यंग में अथवा गूड ज्ञान की चर्चा में ही राधा नाम की निंदा करे तो भी हमें बर्दास्त नहीं होता , अब आगे से कोशिश करेंगे की आप जैसे महापुरुषों का पद धूल बन सकें | जय श्री राधे !

2298 days 21 hrs 28 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

आदरणीय पंडित जी यूँ तो मैं हमेशा ही विवादित बातों से दूर रहता हूँ क्योंकि अब आपने इसमें पूछा ही है तो मेरी समझ में जो आता है या यूँ कहिये जहाँ तक किसी बात को समझने की मुझमे शक्ति है मैं इतना ही कहूँगा की हर बात को कहने अर्थ वो ही नहीं होता जो हम समझते हैं | राधा नाम जितना आपको प्रिय है ब्रिजवासी होने के नाते उससे भी कहीं ज्यादा वो नाम मुझे प्रिय है यही नाम है जिसने मुझे इस मार्ग तक पहुचाया है मैं इस नाम का कितना ऋणी हूँ इसको मुझसे ज्यादा कोई नहीं जान सकता | आज मैं जहाँ भी हूँ इसी नाम के कारण हूँ "राधा नाम महाधन मेरो" | मैं व्यक्ति गत रूप से अड़गड़ानन्द जी से भी मिल चूका हूँ | और एक प्रश्न मैंने उसने किया था की मुझे आज तक गुरु प्राप्ति नहीं हुई है ये घटना है सन २००१ की शक्तेसगढ़ में मैं गया था उनसे मिलने एक सत्संग उनका सुनके यहाँ फरीदाबाद में हुआ था | मेरे प्रश्न के जबाब में उन्होंने मुझसे पुछा की क्या नाम जपते हो मैंने कहा अभी जपता तो नहीं पर हाँ अक्सर मुख से राधे राधे निकल जाता है तो उनका ही उत्तर था इस नाम की धारा में बह जाना गुरु तुम्हे स्वयं ढून्ढ लेंगे तुम गुरु को नहीं ढून्ढ पाओगे वो ही तुम्हे ढूँढेंगे और वाकई मैंने कभी अपने जीवन में गुरु की तलाश भी नहीं की और एक दिन इसी नाम की बदौलत मुझे गुरूजी ने स्वयं बुला कर नाम की दौलत से नवाजा | और मेरे गुरु हैं श्री लाडली दास जी महाराज बरसाने में | स्वामी जी ने जो कहा है उसमे एक लाइन ये भी लिखी है की राधा जैसा प्रेम अपने अंतर में उतार लेना वैसे विरह में डूब जाना तभी कृष्ण प्रेम तुम्हारे अन्दर जागृत होगा | ये नहीं की थोड़ी देर हँसी ठिठोली में राधा राधा कहते रहे और चाह की कृष्ण प्रेम जागृत हो जाए | शुरुवात यहाँ से हो सकती है पर गंभीरता से नाम की धारा में बहने पर ही कृष्ण का प्रेम ह्रदय में जागृत होगा | राधे राधे

2298 days 22 hrs 5 mins ago By Nidhi Nema
 

राधे राधे,मैंने अड़गडा़ नन्द जी कि गीता में वह लाइन पढ़ी है,वास्तव में उनके अर्थ में कितनी गहराई छिपी हुई है,बिलकुल सत्य कहा है उन्होंने कि केवल राधा राधा कहने से क्या होता है.राधा का अर्थ क्या है,राधा किसी देवी का नाम नहीं है,राधा एक प्यास है. कौन सी प्यास ? कृष्ण से मिलन की प्यास. जब तक एक साधक उस प्यास को अपने अन्दर नहीं उतारेगा,तब तक कैसे श्याम मिल सकते है.राधे राधे करोडो लोग कहते है पर सबके सब क्यों नहीं तर जाते क्योकि उन्होंने राधे राधे कह तो दिया पर वह प्यास तो दिल में है ही नहीं जिसका नाम राधा है.और राधे राधे श्याम मिलादे का तो कोई अर्थ ही नहीं है क्योकि भगवान ने स्वयं ही कहा कि -हे राधे मुझमे और तुममे कोई भेद नहीं है और जो भेद करता है वह जब तक सूरज चाँद रहेगा तब तक भी मेरी कृपा का पात्र नहीं बन सकता.जब राधा कृष्ण अलग ही नहीं है,तो फिर हम क्यों कहे राधे राधे श्याम मिला दे.स्वामी जी कि गूढ़ बात का रहस्य न जानने के कारण ही ऐसी शंका उठी है वरना संत के विचार में कभी शंका उठ ही नहीं सकती.यहाँ पर साईट का नाम बदलने कि जरुरत नहीं है,जरुरत है तो आपको संत के द्वारा कहे गए,विचार पर मनन करने कि और उनके गूढ रहस्य को समझने कि जरुरत है.और संत ने यहाँ कोई ऐसी धर्म विरुद्ध बात कही ही नहीं है.

2298 days 22 hrs 17 mins ago By Nidhi Nema
 

राधे राधे,मैंने अड़गडा़ नन्द जी कि गीता में वह लाइन पढ़ी है,वास्तव में उनके अर्थ में कितनी गहराई छिपी हुई है,बिलकुल सत्य कहा है उन्होंने कि केवल राधा राधा कहने से क्या होता है.राधा का अर्थ क्या है,राधा किसी देवी का नाम नहीं है,राधा एक प्यास है. कौन सी प्यास ? कृष्ण से मिलन की प्यास. जब तक एक साधक उस प्यास को अपने अन्दर नहीं उतारेगा,तब तक कैसे श्याम मिल सकते है.राधे राधे करोडो लोग कहते है पर सबके सब क्यों नहीं तर जाते क्योकि उन्होंने राधे राधे कह तो दिया पर वह प्यास तो दिल में है ही नहीं जिसका नाम राधा है.और राधे राधे श्याम मिलादे का तो कोई अर्थ ही नहीं है क्योकि भगवान ने स्वयं ही कहा कि -हे राधे मुझमे और तुममे कोई भेद नहीं है और जो भेद करता है वह जब तक सूरज चाँद रहेगा तब तक भी मेरी कृपा का पात्र नहीं बन सकता.जब राधा कृष्ण अलग ही नहीं है,तो फिर हम क्यों कहे राधे राधे श्याम मिला दे.स्वामी जी कि गूढ़ बात का रहस्य न जानने के कारण ही ऐसी शंका उठी है वरना संत के विचार में कभी शंका उठ ही नहीं सकती.यहाँ पर साईट का नाम बदलने कि जरुरत नहीं है,जरुरत है तो आपको संत के द्वारा कहे गए,विचार पर मनन करने कि और उनके गूढ रहस्य को समझने कि जरुरत है.और संत ने यहाँ कोई ऐसी धर्म विरुद्ध बात कही ही नहीं है.

2298 days 22 hrs 23 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... प्रभु जी, स्वामी जी ने कहीं भी यह नहीं लिखा है कि "जो राधे -राधे कहते हैं वो मूर्ख होते हैं।" यह शब्द आपकी अपनी अवस्था का परिचायक हैं।........ आपने पूछा है इसलिये केवल इतना ही कह सकता हूँ कि कृष्ण प्रेम की अविरल धारा ही राधा है।.... राधा का अर्थ तो वेदों की ऋचायें भी नहीं समझा सकी तो एक आम जीव की क्या विसात है.... प्रत्येक व्यक्ति शब्दों अर्थ अपनी अवस्था के अनुसार ही समझ पाता है।...... आप भी अपनी अवस्था के अनुसार ही शब्दों का अर्थ समझ सकते हैं।..... शब्दों का वास्तविक अर्थ तो तभी समझ में आता है, जब व्यक्ति कृष्ण कृपा की पात्रता कर्म के द्वारा हासिल हो जाती है।...... भगवान श्री कृष्ण स्वयं गीता (१०/१०) में कहते हैं..... "तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌ । ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥" .....जो सदैव अपने मन को मुझमें स्थित रखते हैं और प्रेम-पूर्वक निरन्तर मेरा स्मरण करते हैं, उन भक्तों को मैं सदबुद्धि प्रदान करता हूँ, जिससे वह मुझको ही प्राप्त होते हैं।........... हम आपके लिये प्रार्थना करते हैं कि प्रभु आपको राधा नाम के वास्तविक अर्थ को समझने की शक्ति प्रदान करें।.... संसार में सभी व्यक्ति अपनी अवस्था के अनुसार सही ही बोलते हैं और सही ही लिखते हैं, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति अपनी अवस्था के अनुसार सही या गलत समझते हैं..... प्रभु जी, हमारे द्वारा लिखे गये इन शब्दों का अर्थ भी आप अपनी अवस्था के अनुसार ही समझ पायेंगे।

2298 days 22 hrs 47 mins ago By Pt Chandra Sagar
 

आदरणीय राजेंद्र मेहराजी एवं रवि कान्त जी आप दोनों को प्रणाम !हम यहाँ निंदा स्तुति के लिए नहीं आये अपितु शंका का समाधान करने आये हैं | रविजी के अनुसार मुझे सद्बुद्धि मिल जाने से क्या उस लाइन का अर्थ बदल जायेगा ? कृपया मेरी शंका का समाधान करें न की मुझे दोष दें , राधा नाम की निंदा मैंने नहीं अपितु स्वामीजी की टीका मे है , पहले उस पेज को पढ़िए फिर सोचिये -- गुरु पूर्णिमा के दिन लाखों भक्त गोवेर्धन की परिक्रमा करते हुए कहते हैं "राधे राधे श्याम मिलादे "| उन लाखों भक्तों पर क्या बीतेगी जब सुनेंगे की " राधा स्वयं कृष्ण से नहीं मिल सकी तो तुमे कैसे मिलवाएंगी "|मे निंदा नहीं कर रहा हूँ ,मैं इन पंक्तियों का अर्थ समझना चाहता हूँ |यदि राधा नाम की निंदा आप सभी स्वीकार कर लेते हैं तब इस साईट का नाम बदलकर रख दीजिये " स्वामीजी कृपा .कॉम |"शिशुपाल एवं पौन्ड्रक को भगवान ने क्यों मारा ?विचार कीजिये |धर्म विरुद्ध आचरण का विरोध निंदा नहीं अपितु परम धर्म है |

2299 days 2 hrs 5 mins ago By Gulshan Piplani
 

राधे राधे| हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे| गीता में अध्याय - २ शलोक ४६ ...........................मन स्थिर हो जिसका, त्रय ताप करें न विचलित| आसक्ति, भय, क्रोध से मुक्त कहलाये मुनि जो स्थित| - तात्पर्य है कि जो व्यक्ति स्वं को तीनो तापों से अर्थात आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त कर लेता है उसे ही मुनि, पंडित, ज्ञानि और संत कहलाने का अधिकार प्राप्त है| हमारी किसी के प्रति आसक्ति(राग) हमारे क्रोध का कारण बनती है| उसके मान-अपमान भी हमारे क्रोध का कारण होते हैं| और व्यक्ति इन त्रय तापों में फंस कर अपना मूल उद्देश्य भूल विकारों से जूझता रह जाता है| जो उसकी शक्ति (उर्जा) को सही मार्ग पर प्रवाहित होने से रोकती है और उसके विकास में बाधा उपस्थित कर देती है| जब हम कृष्णभावना में स्वम को स्थिर करने लगते हैं तो जो कुछ भी हमारी इन्द्रियाँ हमारे अन्तकरण को माध्यम बना ज्ञान रूप में प्रेषित करती हैं उनका हम मात्र चिंतन और मनन ही कर के इसे प्रभु प्रदान प्रकृति (स्वभाव) के रूप में ग्रहण करने का प्रयास करते हैं| .......न्यू paragraph ....जितने भी ऋषि - मुनि ज्ञानि और संत होते हैं उन्हें यह उपाधि इसी लिए प्रदान की जाती है कि वह शुष्क चिंतन के रास्ते पर चल मन को भिन्न - भिन्न दृष्टिकोण से उद्वेलित करते रहते हैं| और किसी भी सिद्धांत से हट कर उनका चिंतन होता है ऐसा चिंतन जो किसी भी तथ्य पर नहीं रुकता| सिद्धांत का तात्पर्य होता है कि तथ्य का प्रमाणित हो कर सिद्ध हो जाना अर्थात उसके आगे किसी भी चिंतन की सम्भावना का बाकी न रह जाना| ................न्यू paragraph...... .... इस लिए प्रत्येक स्वामी, ज्ञानि, संत, मुनि और पंडित का अपना दृष्टिकोण होता है और जब तक यह सब अन्यों से भिन्न ना हो तब तक उसे वास्तविक नहीं कहा और माना जा सकता| इस लिए सब हरी भक्तों से सविनय प्रार्थना है की अपना मत आवश्य रखें पर मर्यादाओं को ध्यान में रख कर| यही हम सब के यहाँ इस मंच पर इकठ्ठा होने का मंतव्य है| और यही हमें एक अच्छे गंतव्य की प्राप्ति भी करवाएगा ऐसा मेरा मानना है आप मेरे वक्तव्य से इतिफाक रखें ऐसा में ज़रूरी नहीं समझता| - बाकी तो बस राधे राधे करता जा आगे आगे बढ़ता जा - राधे राधे

2299 days 16 hrs 29 mins ago By Roopesh Nema
 

“राधे राधे श्याम मिला दे “ , इस पंक्ति में यह बात तो निश्चित है कि सभी श्याम को पाना चाहते है इसलिए संतो ने मार्ग भी बताये है , और कहा कि राधे के बिना श्याम नहीं मिल सकते | अब हमें ये समझना होगा कि कौन सी राधा के बिना श्याम मिल ही नहीं सकते , राधा , श्री कृष्ण रस को पाने की सतत प्यास का नाम ही राधा है और इसके बिना श्याम का मिलना असंभव है , हम कुएं के पास तभी जायेगे जब हमें प्यास लगी हो , ठीक इसी प्रकार श्री कृष्ण रस के सागर है, परन्तु यदि हमारे पास उस रस को पाने की प्यास नहीं होगी हम उसके पास जायेगे ही नहीं , इसलिए संतो ने यहाँ २ बार राधे कहा है पहला “नाम महिमा ” का सूचक है और दूसरा “प्यास ” का सूचक है, इनमे से एक के भी अभाब में श्याम नहीं मिल सकते , यदि ये प्रारंभ के २ शब्द ( राधे राधे ), जीवन में उतार लिए तो तीसरा ( श्याम) अपने आप आ जायेगे | शायद यही उस श्लोक का सार है की जीवन में दोनों राधे शब्दों को उतरना आवश्यक है तभी श्याम मिल पायेगे | राधे राधे

2299 days 23 hrs 50 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

भक्त्तो की भिन्न भिन्न भावनाए होती है ! उनकी अलग अलग स्थितिया होती है ! इसीलिए किसी एक ही रस्ते पर नही चला जा सकता ! एक ही नियम से सब को नही चलाया जा सकता ! एक ही तरह से सब को नही नापा जा सकता ! इसी तरह संत भी अलग अलग मार्ग के मिलते हैं और सभी पूजनीय है | सबके विचार भी अलग अलग ही होंगे लेकिन जो बुद्धिमान भक्त हैं वो सिर्फ मोती चुग लेते हैं और बाकी सब छोड़ देते हैं | श्री अड़गड़ानन्द जी ज्ञान मार्गी संत हैं गीता पर उनकी टीका को संतो की सभा में सराहाया गया है | ब्रिज में जो राधा तत्व है उसको तो प्रभु स्वयं ही जानते हैं श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित होकर उन्होंने इस तत्व का महत्व बताया है ये प्रेम मार्ग है इसकी सार तो रसिक ही जान सकते हैं | इसलिए हम इस विवाद में न पड़े और सार को जो हमारे मार्ग से मेल खाता हो उसे ग्रहण करे और अपने मार्ग पर दृढ रहें | राधे राधे

2300 days 13 hrs 18 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... पंडित जी, प्रभु आपको सदबुद्धि प्रदान करें, जिससे आप स्वामी जी द्वारा कहे गये शब्दों का वास्तविक अर्थ समझ सकें।

2300 days 16 hrs 18 mins ago By Neeru Arora
 

आपको सविनय प्रणाम करते हुए मैं मात्र बस इतना कहना चाहूंगी की जब आप जैसा ज्ञानी यह जानते हुए कि संत का अपमान घोर अपराध होता है जैसा कि आपने अपने वक्तव्य में कहा तो इसका मतलब हुआ कि आप अपराध करने में स्वं को स्वतंत्र मानते हैं तो क्या संत अपना दृष्टिकोण रखने में परतंत्र है? हाँ किसी कि निंदा करना गलत है यह मैं भी मानती हूँ पर सच यह है कि कम से कम मुझसे तो निंदा करने जैसा अपराध कई बार हुआ है आप से न हुआ हो तो यह अलग बात है| फिर एक बात तो सत्ये है कि अगर जीवन मैं आप ने कभी किसी कि निंदा नहीं कि तो फिर आपका क्रोधित होना गलत नहीं है पर अगर कभी भी अपने किसी कि निंदा क़ी है तो सुनने का अपराध भी जरूर हुआ होगा ऐसा मुझ अज्ञानी का मानना है| हम तो कर्म में विश्वाश रखते हैं और फल भगवान् क्रिशन पर छोड़ देते हैं| साईट ने हमें अपना वक्त्ये लिखने में सवतंत्रता प्रदान क़ी है इस लिए उस का हम मान आज भी करते हैं| नहीं तो आप का वक्तव्य वोह साईट से हटा भी सकते थे| मुझसे कोई गलती हो गयी हो तो क्षमा करैं|

2301 days 3 hrs 21 mins ago By Diwakar Kushwaha
 

AB SWAMI ADGADANAND NE YE LIKHA HAI TO ISME BHI PRABHU KI HE KOI ICHA HOGI.LOG BAHUT SE COMMENTS DETE HAIN LAKIN YE HUMPER NIRBHAR HAI KI HUM JIS PRAKAAR SE BAHUT SI CHEEJO ME SE ACHI CHEEJO KO DHOONDKAR US ACHI AUR APNE YOGYA VASTU KO GAHAN KARTE HAI AUR BAAKI KO TYAG DETE HAI, YAHI SABHI KO KARNA CHAHIYE. HAMARA JEEVAN DHANYA HO JAYEGA

2301 days 13 hrs 33 mins ago By Pt Chandra Sagar
 

प्रिय अजयजी जय श्री राधे ! मै जानता हूँ संत का अपमान घोर अपराध होता है ,मै यही तो जानना चाहता हूँ की उन्होंने राधा नाम की निंदा किस भाव से किया , यही तो मेरी शंका है किन्तु आपने मुझे ही प्रवचन दे डाला, संत कभी राधा नाम की निंदा भी तो नहीं करते , आप राधा नाम की निंदा सहन कर सकते हैं किन्तु एक ठेठ बृजवासी होने के नाते मै कभी राधा नाम की निंदा सहन नहीं कर सकता |हम जब बृज में जन्म लेते है तो अपनी माँ का नाम बाद में लेते हैं पहले" राधा" नाम मुख से निकलता है ,राधा नाम सुनकर ही इस वेब साईट को मैंने जोइन किया , फिर राधा नाम की निंदा संत क्यों करे ? शेष भगवत कृपा , किसी का भी अपमान करना मेरा उद्दयेश नहीं है , मै तो सब संतो को शीश झुकाकर वंदन करता हूँ |

2301 days 15 hrs 27 mins ago By Ajay Nema
 

इस साईट का उद्देश्य जिसने जो अच्छा लिखा उसका प्रचार करना है. ना की किसी की निंदा करना. संत संत है. हम किसी संत की निंदा पसंद नहीं करते. आपसे अनुरोध है इस साईट पर किसी की निंदा नहीं करे. हमें नहीं मालूम है संत ने किस भाव में क्या लिखा और किसके लिए लिखा है. यदि आपको कुछ अच्छा नहीं लगा तो ये आपका वयक्तिगत मामला है. हमारे लिए संत वन्द्निए है, उनके भाव बन्द्निये है. स्वामी अड़गड़ानंदजी बहुत ही उच्चकोटि के संत है. और उनका राधा कृपा बहुत आदर करती है. रही बात भगवान से मिलने और ना मिलने की और किसी टिपण्णी की, वो एक भाव है, वो कुछ भी हो सकता है.

2301 days 17 hrs 40 mins ago By Pt Chandra Sagar
 

मुझे दुःख इस बात का है की जिसने राधा नाम की निंदा की हो उसी की टीका का प्रचार इसी वेब साईट पर आप बेच रहे हैं , जबकि स्वामीजी नाम जप के घोर विरोधी हैं | आप गीता के उपरोक्त श्लोक की टीका को पढ़कर देखिएगा - उन्होंने लिखा -'अर्जुन नाम लेने के कारण क्षमा मांग रहा है इसलिए तुमलोग भी नाम लेकर अपराध कर रहे हो '| काश स्वामीजी ने एकबार भी गीता पढी होती तो इसप्रकार का अनर्गल प्रलाप नहीं करते |

 
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