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prashn vahi hai

राधिकाजी जय श्री राधे ! आपने भगवान की भगवत्ता और उनकी अनंत गुणों का वर्णन कर दिया , सबमे प्रेम होता तो समाज में इतनी घृणा क्यूँ ? ये सब तो मानस में लिखा है \"बिनु पग चलहिं सुनहि बिनु काना ,कर विनु करम करहिं विधि नाना ||\" मेरा प्रश्न भगवान के विषय में नहीं और न ही उनके अवतारों के विषय में , अपितु मेरी जिज्ञासा है परमात्मा ने इस संसार को , इस दुनिया को , इतने प्राणियों को , और पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि, आकाश आदि का निर्माण क्यूँ किया ? इन सब वस्तुयों की आवश्यकता तो जीव को है ,किन्तु परमात्मा तो स्वयं प्रेम व आनंद स्वरुप हैं तब उनका हेतु क्या है ?

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2305 days 9 hrs 22 mins ago By Neeru Arora
 

मैं प्रशन से सहमत हूँ भगवन तो आनंद स्वरुप हैं| आनंद स्वरुप के मतलब को समझना जरूरी है| जिसके पास आनंद होगा वोही तो दुसरे को आनंद दे पायेगा| प्रशन में यह भी कहा गया है की जीव को इसकी आवश्यकता है तो जिसे जरूरत होगी उसे ही आनंद स्वरुप भगवन आनंद देंगे| दरअसल प्रशनकर्ता ने अपने आप ही प्रशन का उत्तेर दे दिया है की भगवान तो स्वयं प्रेम व आनंद स्वरुप हैं और जीव को आवश्यकता है| तो परमात्मा अपने अंदर जो प्रेम था उसे किसी को देना चाहते थे इस लिए उन्हें सृष्टि की रचना करनी पड़ी|

2305 days 12 hrs 56 mins ago By Gulshan Piplani
 

आपका प्रश्न है ईश्वर में अहं नहीं होता | वह राग- द्वेष ,अहंता -ममता से सर्वथा परे है |ईश्वर की तुलना जीव से करना व जीव का द्रष्टान्त देना अपराध होता हैं | मैं अपनी अल्पबुद्धि से आपके प्रश्नों का शास्त्र मतों के अनुसार उत्तर देने का मात्र प्रयास कर रहा हूँ उसको सही या गलत समझाना, या समझना मेरा कार्य नहीं है| आप और प्रशन भी पूछ सकते हैं पर अन्यथा न लें ऐसी मेरी प्रार्थना है| आपने बिलकुल सही कहा की ईश्वर में अहम नहीं होता, राग नहीं होता, अहंता-ममता से वह सर्वथा परे है| पर प्रभु मानुष को मुक्त भी तो तभी जानते-मानते हैं जब वह काम,क्रोध,लोभ,मोह, मद और माया को त्याग देता है| और मनुष्य में यह सब अवगुण होते हैं तभी तो भगवान कृष्ण ने गीता का उपदेश अर्जुन को दिया और अपने ज्ञान विज्ञान योग अध्याय - ७ के दोहा संख्या ३ के उपदेश में ही उन्होंने अर्जुन को बताया: यतन प्राप्ति का मेरा, हजारों में करे कोई एक| ऐसे हजारों योगियों में, रखे विरला तत्वपूर्ण विवेक|| (दोहानुवाद गीताजी-कविताजी से उद्धृत है) | तो जब भगवान ने ही मनुष्य को अपने में समाहित हो जाने का सुअवसर प्रदान किया है तो क्या भगवान मनुष्य से अपनी तुलना करवाना चाहते थे? नहीं वोह अध्याय - ७ में शलोक संख्या ७-६ में स्वं कहते हैं -- मैं ही उदभव, मैं ही प्रलय, सम्पूर्ण जगत का कारण हूँ| हर वक़्त मुझमें होते विलय और मैं ही करता धारण हूँ|| भगवान् श्री कृष्ण स्वं कह रहे हैं की सम्पूर्ण जगत का कारण मैं ही हूँ और जब भी प्रलय होती है सब को मैं ही धारण कर लेता हूँ, क्योंकि जीव भी अजन्मा है उसकी भी मृत्यु नहीं हो सकती| अहंकार से दूषित जीव को प्रभु स्वं प्रलय काल में धारण करने को तत्पर रहते हैं क्यों? फिर अध्याय - ७ के ही शलोक ७-८ में वह कहते हैं: -- मुझसे भिन्न नहीं कोई कारण, जगत सूत्रधार हूँ मैं| जल में रस, चन्द्र-सूर्य किरण, पुरूषत्व, शब्द ओंकार हूँ मैं|| जब हर तत्व में स्वम भगवान् कृष्ण ही व्याप्त हैं तो तुलना का कोई प्रश्न ही नहीं उठता उन्होंने स्पष्ट किया है की पुरुष में पुरूषत्व (पुरूषत्व का मतलब होता है की पुरुष में जो पुरुष होने का तत्व है अर्थात बीज है वोह भी में ही हूँ) और शब्द ओंकार भी में ही हूँ| यह सब दृष्टान्त भगवान् श्री कृष्ण के ही हैं और शास्त्र सम्मत हैं| - राधे राधे करता जा आगे आगे बढता जा| - राधे राधे

2305 days 17 hrs 24 mins ago By Gulshan Piplani
 

राधिकाजी जय श्री राधे ! कि सबमें प्रेम होता तो समाज में इतनी घृणा क्यूं? सच्चिदानंद ने जब अपने अंश को शरीर प्रदान करने का सौभाग्य प्रकृति को प्रदान किया तो प्रकृति सर्वदा तीन गुणों से युक्त थी| तमो, रजो और सतोगुण उसमें सर्वदा विद्धमान रहते थे जो जीव को स्वभाव के रूप में प्राप्त हुए| हर मनुष्य में सर्वदा तीनो गुण रहते हैं बस प्रतिशत का अंतर रहता है किसी में सतोगुण अधिक तो किसी में रजो गुण तो किसी में तमोगुण की प्रचुरता रहती है| अगर हम कंप्यूटर को शरीर माने जो की मन, बुद्धि, चित और अहंकार से अलंकृत है तो अगर कोई कंप्यूटर में गलत सॉफ्टवेर (नकारात्मक विचार अर्थात तमोगुणी विचार) डालता है तो हम इसमें कंप्यूटर बनाने वाले को जिस तरह दोषी नहीं मान सकते उसी प्रकार सच्चिदानंद ने शरीर रुपी कंप्यूटरमें साथ मन, बुद्धि, चित अवम अहंकार अंत:करन के साथ केमरा रुपी ज्ञानेन्द्रियाँ प्रदान की हैं और प्रिंटर रुपी कामेंद्रियाँ दे दीं हैं और जीव को पूर्ण सवतंत्रता प्रदान कर दी है की वह जैसे कर्म करना चाहे अपने स्वभाव के अनुसार करे परन्तु उसका फल उसके हाथ में नहीं है| क्योंकि जिस तरह हम किसी की भी बात को अपने सव्भावानुसार ग्रहण करते हैं और वह काल,संग, देश और क्रिया इत्यादि पर निर्भर करता है उसी प्रकार अन्य जीव भी स्वतंत्र हैं| क्योंकि माया व्याप्त है उससे बच कर निकलना मनुष्य पर ही निर्भर करता है| उससे बच निकलने के लिए हमें सत्संग में रहने का प्रयास करना चाहिए| प्रभु की भक्ति में बहुत शक्ति है वोही हमें माया से बचाकर हममें प्रेम का संचार प्रवाहित करने में सक्षम है| लोग घृणा करें तो करें हमें नहीं करनी ऐसा शुभ्विचार हम अपने अंतर में रखें| बाकि तो बस राधे राधे करता जा, आगे आगे बढ़ता जा| जय श्री राधे राधे

2305 days 19 hrs 58 mins ago By Pt Chandra Sagar
 

ईश्वर में अहं नहीं होता | वह राग- द्वेष ,अहंता -ममता से सर्वथा परे है |ईश्वर की तुलना जीव से करना व जीव का द्रष्टान्त देना अपराध होता हैं |शेष भगवत कृपा

2305 days 20 hrs 30 mins ago By Gulshan Piplani
 

राधिकाजी जय श्री राधे| मैं अज्ञानी नहीं जानता कि आपके प्रशन का उत्तर देने में प्रभु ने मुझे सक्ष्मता प्रदान की है या नहीं परन्तु फिर भी प्रभु से अभय दान कि प्रार्थना करते हुए आपके के प्रशन के उतर में अपना पक्ष रखने का दु:साहस कर रहा हूँ| यह तो सर्वविदित है कि जीव, माया, इश्वर, ब्रह्म और परब्रह्म अनादी हैं, अजन्में हैं| प्रभु सर्वव्यापी हैं सच्चिदानंद हैं आनंद स्वरुप हैं| यहाँ प्रशन में सबसे महवपूर्ण शब्द जो हर मानस को ज्ञात है कि वह आनंद स्वरूप हैं| वह आनंद का रूप नहीं हैं वह स्वरूप हैं| रूप और स्वरूप का भेद तो हर कोई जनता ही है| गीता में भगवन कृष्ण ने अध्याय - १८ के सातवें शलोक में कहा है: उसका दोहानुवाद मेरी पुस्तक गीताजी-कविताजी से उद्धृत है | निषिद्ध कर्म काम्य कर्म, का करो स्वरूप से त्याग| नित्य कर्म का त्याग तामसी, मोहवश न इससे भाग|| तो जो प्रवचन भगवन कृष्ण ने अपने अंश को दिए हैं उसका वह स्वम भी पालन करते हैं| अर्थात प्रभु का नित्य कर्म जीव को जो कि उसका अंश है उसे आनंद (जिसका स्वरूप प्रभु स्वं हैं ) प्रदान करने हेतु ही शरीर प्रदान किया| उसके लिए प्रभु ने संकल्प मात्र से आकाश कि उत्पत्ति की, आकाश से वायु को जन्म मिला, वायु को अग्नि से जीवन प्राप्त हुआ, अग्नि से जल को जीवन मिला और जल से पृथ्वी को और प्रथ्वी से प्रकृति का जन्म हुआ और प्रकृति से जीव को शरीर कि प्राप्ति हुई| फिर प्रभु ने मनुष्य को आनंद प्रदान करने के लिए अर्थात अपने स्वरूप का ज्ञान देने के लिए उसे माया से पार पा कर आनंद कि प्राप्ति करवाने अपना संकल्प पूर्ण किया, और यही उनका हेतु था| - राधे राधे

2306 days 11 hrs 3 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

हालांकि इस बात से कोई फरक नहीं पड़ता कि हम ये जाने कि सृष्टि की रचना क्यों हुई | क्योंकि सृष्टि तो अब है और जो वर्तमान है वो ज्यादा महत्व पूर्ण है | पर फिर भी प्रश्न तो है और प्रश्न है तो उसका उत्तर भी होना चाहिए | शास्त्रों में भी इस प्रश्न के अनेक उत्तर हो सकते हैं एक जगह मैंने पढ़ा था कि भगवान् को एक से अनेक होने कि इच्छा हुई तो वो अनेक हो गए | कहीं लिखा है लीला वश उन्होंने लीला करने के लिए सृष्टि कि रचना की | प्रश्न कर्ता कि ये बात भी सही है कि भगवान् स्वयं आनंदमय, प्रेममय है | फिर अपने को आनंदित करने लिए उन्होंने सृष्टि की रचना की ऐसा क्यों | शास्त्र सम्मत क्या है ये तो मुझे ज्यादा मालूम नहीं क्योंकि मैंने शास्त्रों का अध्धयन बहुत कम किया है | पर मेरी छोटी सी बुद्धि में इस प्रश्न का उत्तर इतना ही आता है कि प्रभु ने अपने अहम् को पुष्ट करने के लिए इस सृष्टि की रचना की है | जैसे एक लेखक अपनी अहम् की पुष्टि के लिए लिखता है कहानी के पात्र बनाता है कहानी पूरी करता है और तृप्त हो जाता है फिर लिखता है फिर पूरी करता है ये क्रम चलता रहता है | और एक उदहारण से हम समझने की कोशिश करते हैं हम इस संसार में पैदा होते हैं बड़े होते हैं फिर अपने जीवन यापन के लिए अपने को तैयार करते हैं लेकिन जब सब ठीक चलता है तो फिर शादी करते हैं शादी क्यों करते हैं अकेले नहीं जीवन कट सकता क्या आनंद नहीं मिल सकता मिल सकता है पर फिर भी करते हैं क्यों क्योंकि आनंद रुकने नहीं देता और चाहिए क्योंकि जो चीज रुक जाती है वो खराब हो जाती है इसलिए हम शादी करते हैं और फिर जब शादी हो जाती है बच्चे की कामना करते हैं हो जाए तो ठीक और ना हो तो कितने पीरों और फकीरों डाक्टरों के पास चक्कर लगाते हैं क्यों सिर्फ अपने अहम की तुष्टि के लिए हमें लगता है बच्चे के बिना हमारा जीवन अधुरा है और बच्चा क्यों आनंद को बढाने के लिए | बात सिर्फ इतनी ही है की प्रकृति और पुरुष का मिलन ही इस सृष्टि का हेतु है और प्रकृति के बगैर पुरुष निर्जीव है और निर्जीव ना आनंद मय होता है और ना ही प्रेम मय होता है जब तक प्रकृति से मिलन नहीं होगा आनंद और प्रेम नहीं होगा | प्रभु लीला का आनंद लेने हेतु प्रकृति को प्रकट करते हैं क्योंकि लीला के लिए दो का होना जरूरी है | साथ ही आनंद और प्रेम की प्राप्ति प्रक्रति के प्रकट होने से ही होगी और पुरुष और प्रकृति का मिलन होगा तो सृष्टि की रचना जरूर होगी अवश्यम भावी है | मेरी नज़र में सृष्टि की रचना का यही हेतु है | राधे राधे

2306 days 11 hrs 8 mins ago By Diwakar Kushwaha
 

Chandra Sagar ji prashna to vahi hai to uttar bhi wahi hai jo jag vidit hai.Ishwar apney aap me paripoorna hai,unhe kisi srishti ki kya avashyakta lakin kya koi bhi bina kisi kriya ke rah sakta hai,agar jeevan me sirf sukh he milega to dukh ko kaun samghega aur agar dukh he milega to sukh ka anand kaise koi lega,karm aur kriya yahi srishti ka mool hai,isi me sabhi prani matra ulagh kar 84 lakh yoniyon me gaman karte hai aur jo in laalsao aur sansarik mohe paash se mukt hokar un parampita ka dhyaan karte hai wahi aney isht arthaat iswar me vilay ho jate hai.

 
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