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CHINTA SE KAISE MUKTI PAAYI JA SAKTI H ?

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2766 days 7 mins ago By Waste Sam
 

radhey radhey... bhagwan hanuman ke jeevan darshan se hume iss prashan ka uttar milta hai.... chinta se mukti pane ke "chintan" (bhagwan ka) kare... jai shri radhey

2774 days 1 hrs 25 mins ago By Bhakti Rathore
 

sub kuch apne east ke uper chod do wo khud sub ker dege aap apne aap chinta mukt ho jaygoge

2779 days 15 hrs 51 mins ago By Neeru Arora
 

chintan karke.

2782 days 20 mins ago By Gulshan Piplani
 

चिंता का उद्दभव स्थान कहाँ है बुद्धि| क्यों? क्योंकि बुद्धि सर्वदा लाभ हानी पर ही विचार करती रहती है| इसको हम यूं भी देख सकते हैं कि मन के अनुकूलता होती है तो प्रसन्ता होती है जब मन कि प्रतिकूलता होती है तो दुःख:| परन्तु इसके बीच की एक स्थिति होती है वोह है कि अनुकूलता हुई नहीं पर मन में अनुकूलता की उम्मीद बनी हुई है और प्रतिकूलता हुई नहीं पर मन में प्रतिकूलता का भय बना हुआ है| यह भय ही हमारी चिंता का कारण बनती है तो यह बीच कि स्थिति हमारे अन्तकरण में चिंता का प्रादुर्भाव संचित करती रहती है और हम चिंताग्रस्त हो जाते हैं| इससे मुक्ति तो मनुष्य स्वम अपने जतन से ही प्राप्त कर सकता है और उसके लिए गीता में आत्मसयम योग - ध्यान योग अध्याय -६ के ५वें शलोक का हिंदी अनुवादित दोहा प्रस्तुत है:--------------------------------------------------------- -----------------मन आप ही अपना मित्र मन अपना शत्रु होए|-------------------- -----------------कर मन का उद्दार जतन से ज्ञानि सुख संजोये|--------------------

2783 days 18 hrs 5 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... जो व्यक्ति हर परिस्थिति में संतुष्टि के भाव में स्थित हो जाता है वह सभी चिंताओं से मुक्त हो जाता है।

2783 days 22 hrs 39 mins ago By Diwakar Kushwaha
 

Gulsan Ji Ne Bilkul Theek Kaha Hai Lakin Agar Aap ne SHRIMAD BHAGWAD GITA Nahi Padhi To Simple Words Me Iska Answer Yeh Hai Ki Apney Vicharo Ko Ishwar Me Samarpit Karo Arthaat Ishwar Ke Dhyaan Se Samast Chintao Se Mukti Mil Jati Hai.

2783 days 23 hrs 47 mins ago By Gulshan Piplani
 

मन को वश में कर के, बुद्धि से कार्य करने का प्रयास दुखों से मुक्ति प्रदान करने में सक्षम है| गीता में आत्मसयम योग - ध्यान योग अध्याय -६ के ५वें शलोक में भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है: मेरी पुस्तक जो की गीता का शलोक में अनुवाद है प्रस्तुत है: मन आप ही अपना मित्र मन अपना शत्रु होए| कर मन का उद्दार जतन से ज्ञानि सुख संजोये|

 
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