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आध्यात्मिक पथ पर दान का क्या महत्व है ?

इस बारे में आपका क्या द्रष्टिकोण है ?

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2839 days 22 hrs 28 mins ago By Waste Sam
 

radadhey radhey, daan ka artha meri drishti mein hai tyaag... adhyatam ke path mein badna hai toh hume ek param pita parmatama ka varan karna hai usske liye hume sabka tyaag karna hai aur daan hum mein tyaag karne ke bhawana ko sudhir karta hai... jai shri radhey

2860 days 16 hrs 7 mins ago By Gulshan Piplani
 

जब तक प्रभु प्राप्ति नहीं हुई अर्थात माया नहीं छूटी तब तक दान-तप-यज्ञ का उतना ही महत्व है जितना पानी का शरीर के साथ - गुलशन हरभगवान पिपलानी

2881 days 8 hrs 9 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... निष्काम भाव से किये जाने वाले दान का ही आध्यात्मिक पथ पर महत्व होता है।

2886 days 4 hrs 26 mins ago By Aditya Bansal
 

daan dene se dhan ki shudi ho hoti ha kayi baar na chahte huye aisa dhan haamre pass aa jata hai jo paap dwara aya hota hai...par ki itni zayda mahim ahaihum daan de sabhi kuch shudh ho jata hai nd ksii ki madad ho jati hai

2886 days 20 hrs 50 mins ago By Nidhi Nema
 

राधे राधे, दान का बड़ा भारी महत्व है,जैसे स्नान से शरीर की शुद्धि होती है वैसे ही दान से धन की शुद्धि होती है, दान देश काल पात्र को देखकर देना चाहिये.दानो में सबसे उत्तम दान अन्न का दान है कर्ण को दानियो की श्रेणी में बहुत ऊपर स्थान था जब कर्ण की मृत्यु हुई तो उन्हें उत्तम लोक मिले जो अनेक रत्नों आदि ऐश्वर्य से भरा था.परन्तु उनके महल में अन्न नहीं था कारण पता करने पर पता चला कि कर्ण ने सभी कुछ दान किया पर अन्न दान नहीं किया.इसलिए वे पृथिवी पर वापस आये और अन्न का दान किया फिर उन्हें अपने लोक में अन्न के भंडारे भरे मिले इस प्रकार अन्न दान सर्वश्रेष्ट है.

2887 days 5 hrs 21 mins ago By Anu Mehta
 

अर्थ शुद्धि के लिए दान आवश्यक है स्वर्गारोहण के समय यक्ष ने धर्मराज युधिष्ठिर से प्रश्न किया- मृत्यु के समय सब यहीं छूट जाता है, सगे-संबंधी, मित्र कोई साथ नहीं दे पाते, तब उसका साथी कौन होता है, कौन उसका साथ देता है? युधिष्ठिर ने कहा- मृत्यु प्राप्त करने वाले का मित्र दान है, वही उसका साथ दे पाता है। यक्ष का अगला प्रश्न था- श्रेष्ठ दान क्या है? उत्तर था-जो श्रेष्ठ मित्र की भूमिका निभा सके। फिर प्रश्न था-दान किसे दिया जाए? उत्तर था- दान सुपात्र या सही व्यक्ति को दिया जाए। जो प्राप्त दान को श्रेष्ठ कार्य में लगा सके, उसी को दिया गया दान श्रेष्ठ होता है। वही पुण्य फल देने में समर्थ होता है। दान को धर्म में एक जरूरी और उत्तम कार्य बताया गया है। अथर्ववेद में स्पष्ट कहा गया है कि सैकड़ों हाथों से कमाओ और हजारों हाथों से बांट दो। शास्त्रकारों ने कहा है कि जो सम्पन्न व्यक्ति अपनी सम्पत्ति का भोग बिना दान के करता है, वह अच्छे लोगों की श्रेणी में नहीं माना जा सकता। वह निंदनीय है। कबीर दास ने कहा है कि अर्थ की शुद्धि के लिए दान आवश्यक है। जिस प्रकार बहता हुआ पानी शुद्ध रहता है उसी तरह धन भी गतिशील रहने से शुद्ध होता है। धन कमाना और उसे शुभ कामों में लगा देना अर्थ शुद्धि के लिए आवश्यक है। यदि धन का केवल संग्रह होता रहे तो संभव है एक दिन वह उसी नाव की तरह मनुष्य को डुबो देगा, जिसमें पानी भर जाता है। नाव का पानी उलीचा न जाए तो निश्चय ही वह डूब जाएगी। पानी की टंकी से जब तक पानी निकलता रहता है तभी तक टंकी में ताजा जल आने की गुंजाइश रहती है। धन के अति संग्रह से अनेक व्यक्तिगत और सामाजिक बुराइयां भी पैदा हो जाती हैं जिससे बोझिल होकर मनुष्य कल्याण पथ से भटक जाता है, जीवन की राह से फिसल जाता है। इसीलिए कमाने के साथ-साथ धन को दान के माध्यम से परमार्थ कार्यों में भी लगाना चाहिए ताकि दुनिया के अभावग्रस्त लोगों का उद्धार हो सके। स्वामी रामतीर्थ ने कहा था, 'दान देना ही आमदनी का एकमात्र द्वार है। जहां दिया नहीं जाता, खर्च नहीं किया जाता, वहां धीरे-धीरे आमदनी की संभावना भी कम हो जाती है। आय का स्त्रोत उन्मुक्त भाव से उन्हीं के लिए खुला रहता है जो दान करते हैं, उसे समाज के लिए खर्च करते हैं।' दान व्यावहारिक जीवन में एक ऐसी साधना पद्धति है जिसके माध्यम से हम अपने भीतर अनेक आध्यात्मिक, मानसिक तथा चारित्रिक गुण और विशेषताएं विकसित कर सकते हैं। दूसरों को देकर जिस आत्मसंतोष, प्रसन्नता और आंतरिक सुख की अनुभूती होती है,उसे सिर्फ देने वाला ही समझ सकता है। इसके साथ ही दान एक बहुत बड़े सामाजिक कर्त्तव्य की पूर्ति भी है। किसी भी समाज में सभी तो कमाने की स्थिति में नहीं होते पर दान समाज के दुर्बल अंग को जीवन देता है। यदि संसार में चल रही दान व्यवस्थाएं बंद कर दी जाएं तो मानव समाज के एक बड़े हिस्से के नष्ट हो जाने की आशंका बढ़ जाएगी।

2887 days 10 hrs 37 mins ago By Manish Nema
 

दान भी धन को पवित्र कर देता है। जब आप अपने अर्जित धन का एक हिस्सा किसी अच्छे कार्य हेतु दान में देते हो, तो आपका जो बचा हुअ धन रहता है, वह पवित्र होता है। इसी तरह तन शुद्ध होता है स्नान से, मन शुद्ध होता है प्राण शक्ति से - प्राणायाम व ध्यान से, और बुद्धि शुद्ध होती है ज्ञान से। हम जब ज्ञान की बातें सुनते हैं तो पवित्र होते हैं।"राधे राधे"

 
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