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भक्ति और ज्ञान मार्ग क्या है ? इनमे क्या अंतर है ?

इस बारे में आपका क्या द्रष्टिकोण है? कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है, और क्यों ?

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2478 days 8 hrs 43 mins ago By Waste Sam
 

radhey radhey, yeh prashan bhagwad geeta ka saar hai... gyan ka marg hai astang yog aadi iss marg mein sadhak aapni shawas aadi ko vash mein karta hai... bhakti marg prem marg, yeh woh marg hai jismein hum bhagwan ke saath koi bhi sambandh jod bhagwan ke usse bhawana se sewa kar sakte hai... inmein bahut antar hai.. santo ke mukharbind se jo suna hai wahi bhav yahan likh rahi hoon- bhakti marg mein bhagwan humare indriyon ke vishay bankar hume sukh dete hai jabki gyan marg mein bhawan ko hum mehsoos kar sakte hai jaise ek mrig kastoori ki khoosboo hee le sakta.. jai shri radhey

2498 days 16 hrs 54 mins ago By Gulshan Piplani
 

भक्ति श्रद्धा जागृत होने से होती है आसान रास्ता है हर कोई कम यतन से कर सकता है ज्ञान योग मुश्किल रास्ता है भटकने कि गुन्जायिश रहती है परन्तु यह मनुष्य के स्वभाव पर निर्भर करता है ऐसा समझ लें तो आसान होगा | राधे राधे

2545 days 13 hrs 16 mins ago By Balvinder Aggarwal
 

bhagti mein bhagvan ka hi chintan rahta hai jabki gyan yog mein bhagvan ke sath apna dhyan bhi rahta hai

2547 days 17 hrs 15 mins ago By Aditya Bansal
 

radhey radhey

2574 days 16 hrs 3 mins ago By Aditya Bansal
 

bhakti jo hum karte hai..nd gyaan jo hum baantate hai

2591 days 16 hrs 23 mins ago By Jaswinder Jassi
 

कोई मनं डर जाता है कोई मनं डरा देता है, कब्बी प्रभु के पास लाता है कब्बी प्रभु से दूर भगा देता है, “मनं ” में कितनी खुबियां है जो एक पल में किसी को हस्सा ,किसी को रुला देता है इसको प्रभु का गियान होते ही , ये अविकारों (काम,क्रोध,लोभ,मोह और अहंकार) को दूर भगा देता है जस्सी

2591 days 16 hrs 27 mins ago By Jaswinder Jassi
 

जग पे दीप जगन भावें लखां , मेरा चानण मेरीया अखां, जब अखां और चानण मिल जान , फिर न सकण इससे (प्रभु) पहचान , उंग संग है पर अनजाना ल्ग्दै , हाज़र नाजर है फिर बी बे पहचाना ल्ग्दै ]>>>>>>>>>जस्सी

2591 days 16 hrs 30 mins ago By Jaswinder Jassi
 

SUM DRISHTI ********* MAI*(ATMA) nu Jbb bi soch aey , ESS (PRMATMA) ki hi soch aey, Binn ESS ke kuss aur na bhave, Jbb MAI kissi ko dekhu to YEH** ee YEH NAZAR aey>>>>> JASSI

2591 days 16 hrs 35 mins ago By Jaswinder Jassi
 

Assal me MAI*(ATMA) JEEV nhi han JEEV ta mai* nu mila hua TNn+ MNn hai, ,MAI* PRMATMA sroop ATMA ha,jiss ke karn aur jiss ke duara MAI* nu mila hoya mera Tnn-Mnn Prkashvan hai .MAI(ATMA) Tnn-Mnn badlti rehti hu ,MRti kbbi nhi .Na mera koyi JNNM hota hai aur na hi Mrrn .MAI* addikal se essi ki essi hu .........MAI nu NAM se jana pehchana jata hai ,MAI* pind(SREER) bdalti hu NAM nhi bdalti ! ATMA- is a circle of NOTHING (KHALISTHAN) around one body & PRMATMA is also A CIRCLE of NOTHIN around the UNIVERSE .Both are similar .BOTH are KHALISTHAN around the bodies . BODIES always move into this & due to this but this is nevere moved .THis is always nearest to bodies . NAM aur SATNAM ( ATMA aur-PRMATMA) Never changeble in the UNIVERSE ATMA-MHATMA PRMATMA is not a subject of WORSHIP .THis a subject of VICHARn.YE Sharda ke dyere me b nhi hai .! JASSI

2591 days 16 hrs 41 mins ago By Jaswinder Jassi
 

केवल बुधिवान जीव (मनुष ) ही परमात्मा के प्रति विचारवान होते हैं ,बुद्धिहीन मनुष विचारवान नही होते केवल सर्धावान होते हैं ] विचारवान विश्वासी होते है और सर्धावान अन्धविसवासी होते है ] इस लिए विश्वास और सरधा में बौहत अन्तेर है ] किस्सी फार्मूले ( GUR ) के प्रति विचारवान ही सवाल का हल ढून्ढ सकता है , फोर्मुले के प्रति श्रदा रखने से सवाल हल नही होता ] * जस्सी

2601 days 10 hrs 29 mins ago By Murli Dhar
 

Bhakti marg hi jivan naya tairane ke liye sbse sirl rasta hai lekin gyan ka hona bhi jaruri hai ...kunki kalyog me chlkapat bahut hai ....gyan hme ye btayega ki bhakti me kya krna hai kya nahi magar bahut jayada jyan or ghmand to bahkti ko jla hi dega..islye balance jaruri hai radhey radhey!!

2607 days 14 hrs 50 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा....स्वयं को भक्त या ज्ञानी समझने वालो को भक्ति का ज्ञान ही नहीं होता है, स्वयं को ज्ञानी समझना और स्वयं को भक्त समझना दोनो ही अज्ञानता ही है। जिस दिन जीवात्मा को भक्ति का पूर्ण ज्ञान हो जाता है तो वह जीवात्मा का अस्तित्व परमात्मा से एकाकार होकर परमात्मा स्वरूप ही हो जाता है।.......जिस प्रकार बिन्दु सागर में मिलकर स्वयं का अस्तित्व खोकर सागर बन जाती है। इसलिये ज्ञान और भक्ति एक दूसरे के पूरक होते हैं।.......शास्त्रों के अनुसार भक्ति के पास आँखे नहीं होती है और ज्ञान के पास पैर नहीं होते हैं, भक्ति ज्ञान की आँखो की सहायता से देख पाती है और ज्ञान भक्ति के पैरों की सहायता से चल पाता है तभी परमात्म पथ की दूरी तय हो पाती है।

2607 days 15 hrs 23 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा......बिना ज्ञान-कर्म के भक्ति-कर्म नहीं हो सकता है, बिना भक्ति-कर्म के ज्ञान-कर्म नहीं हो सकता है, ज्ञान-कर्म से भक्ति-कर्म हो या भक्ति-कर्म से ज्ञान-कर्म हो एक ही बात है। ज्ञान-कर्म और भक्ति-कर्म दोनों ही एक दूसरे के बिना अधूरे हैं, जब तक दोनों बराबर मात्रा में स्वयं के अन्दर प्रकट नहीं हो जाते तब तक किसी भी व्यक्ति को भक्ति-मार्ग की प्राप्ति नहीं हो सकती है। जब तक कोई भी व्यक्ति कर्म के बंधन से मुक्त नहीं हो सकता है। जब तक व्यक्ति कर्म बंधन से मुक्त नहीं होता है तब तक भगवान का दर्शन प्राप्त नहीं हो सकता है।

2607 days 15 hrs 35 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जिसे सांसारिक लोग भक्ति मार्ग समझते है वह वास्तव में भक्ति कर्म है जो कर्म मार्ग के अन्तर्गत ही आने वाला एक कर्म ही है। यह भक्ति-कर्म तो केवल उन लोगों के लिये ही जिनके कर्तव्य-कर्म पूर्ण हो चुके हैं, जो व्यक्ति कर्तव्य-कर्म को त्यागकर भक्ति करता है ऎसा व्यक्ति स्वयं का सबसे बड़ा शत्रु होता है। वास्तविक भक्ति मार्ग की तो भगवान की कृपा से साक्षात्कार के बाद ही प्राप्त होता है इस मार्ग पर पहुँचा हुआ जीव फिर कभी इस संसार में लौट कर नहीं आता है।

2607 days 15 hrs 42 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं......इस संसार में आत्म-साक्षात्कार की दो प्रकार की विधियाँ पहले भी मेरे द्वारा कही गयी हैं, ज्ञान योगीयों के लिये सांख्य-मार्ग और कर्म योगियों के लिये निष्काम कर्म-मार्ग नियत है।......सन्यास माध्यम से किया जाने वाला कर्म (सांख्य-मार्ग) और निष्काम माध्यम से किया जाने वाला कर्म (कर्म-मार्ग), ये दोनों ही परमश्रेय को दिलाने वाला है परन्तु सांख्य-मार्ग की अपेक्षा निष्काम कर्म-मार्ग श्रेष्ठ है।...... अल्प-ज्ञानी मनुष्य ही "सांख्य-मार्ग" और "निष्काम कर्म-मार्ग" को अलग-अलग समझते है न कि पूर्ण विद्वान मनुष्य, क्योंकि दोनों में से एक में भी अच्छी प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के फल-रूप परम-सिद्धि को प्राप्त होता है।

2607 days 16 hrs 19 mins ago By Manish Nema
 

"हिन्दू दर्शन में दो ह़ी मार्ग इश्वर की प्राप्ति हेतु बताये गए है ! जिसमे से एक है भक्ति मार्ग दूसरा ज्ञान मार्ग ! दोनों का अंतिम लक्ष्य आत्मा का परमात्मा से मिलन है” ! भक्ति का तात्पर्य है जो सीधे भगवद् प्राप्ति करा दे, यह तभी संभव है जब साधक या भक्त अपने उपास्य का स्वरूप, स्वभाव और प्रभाव को जान लेता है। भक्ति भगवत्‌ को प्राप्त होने से पूर्व प्रारंभ होती है और भगवत्‌ प्राप्ति के बाद भी सतत्‌ चलती रहती है। भक्ति वह स्थिति है जो साधक को एकरस कर भव बंधन से मुक्त कर देती है। भक्ति और ज्ञान साधन नहीं है, अपितु एक-दूसरे के पूरक हैं। इसमें एक को भी पकड़ लेने से भगवान की प्राप्ति हो जाती है। सूत्र है कि ज्ञान से भक्ति की प्राप्ति होती है और भक्ति से साधक परम ज्ञानी हो जाता है। वस्तुतः भक्ति मानव के कल्याण का सूत्र है जिसे पकड़ लेने से सीधे भगवद् प्राप्ति ही होती है।

2607 days 16 hrs 45 mins ago By Ajay Nema
 

बिल्कुल सही वर्षा .... मेरे विचार मे भक्ति अकेले से कुछ नहीं होता.... जिसकी भक्ति कर रहे हो उसका ज्ञान भी होना जरुरी है तभी भक्ति मे स्थिरता आती है .... लेकिन ज्ञान हो और भक्ति ना हो तो भी बेकार है ....

2607 days 16 hrs 54 mins ago By Varsha Pahalwani
 

Radhe Radhe,, Aj is yug mein jeevan jeene k liye sabse saral aur sabse uttam upaaye hai Bhakti aur Gyan ka Marg.. Bhakti se Ishwar ki Shakti milti hai. Aur jo Gyani hai wahi Is marg ko samaj pata hai.. aur uska jeevan tar jata hai.

2607 days 17 hrs 44 mins ago By Nidhi Nema
 

राधे-राधे, निराकार ब्रह्म की उपासना ज्ञान मार्ग है और साकार ब्रह्म की उपासना भक्ति है,ज्ञान मार्ग एक दीपक की तरह है,और भक्ति मार्ग एक चमकती मणि की तरह है,जव तेज आँधी चलती है तो दीपक की लौ टिमटिमाने लगाती है और बुझ भी सकती है जबकि मणि में ऐसा नहीं होतामणि तो अन्धेरे में भी चमकती रहती है.ज्ञान मार्ग में चलते-चलते ज्ञानी को विषय रूपी आँधी से उसका ज्ञान का दीपक बुझ भी सकता है कभी-कभी ज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है, लेकिन भक्ति में तो भक्त सदा अमानी ही बना रहता है उसे तो अपने प्रभु का ही सहारा होता है,उसके पास अहंकार करने के लिए कुछ होता ही नहीं.मार्ग दोनों ही श्रेष्ठ है पर जैसा हमने संतो के मुख से सुना है तो भक्ति मार्ग श्रेष्ठ है. "राधे-राधे"

 
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