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अंतर्ज्ञान को कैसे बढ़ाया जा सकता है?

इस बारे में आपका क्या द्रष्टिकोण है?

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2448 days 1 hrs 11 mins ago By Waste Sam
 

राधे राधे, अंतर्ज्ञान सदा से ही हमारे अंदर स्थित रहता है आत्मा के रूप में क्यों हमारी आत्मा भगवान् का प्रतीक है जो ज्ञान से पूर्ण है | बस ज़रुरत है तो उस माया के आवरण को हटाने का जिसके कारण ये ज्ञान ढक जाता है | इस आवरण को हटाते है सद्गुरु और उनसे प्राप्त सत्संग | जय श्री राधे

2455 days 11 mins ago By Meenakshi Goyal
 

aap kabhi aapne aapke saath kuchh vakt bitaiye aapko pata chalega ki hamare thakur hamare har ek kary ke sakshi bante hain. jab ham kuchh achcha karya karne jaate hain to hamare andar se ek awaz aati hai aisa lagta hai ki jaise thakur protsahit kar rahe hon aur jab ham kuchh galat kary karne jaa rahe hote hain tab fir ek awaz aati hai aur is baar thakur hame rok rahe hote hain. ab bat yah hai ki ham aapni vyasttataon ke karan us awaz ko ansuna kar dete hain, agar aap is awaz ko sach mei sunna chahte hain to har roz kuchh vakt shanti ke saath ekant mei aapne saath guzariye aur thoda prabhu ka dhyan kijiye aapko swayam hi abhaas hone lagega is baat ka. पानी में मीन पियासी, पानी में मीन पियासी. मोहे सुण-सुण आवै हांसी, पानी में मीन पियासी. आतम ज्ञान बिना सब सूना, क्या मथुरा, क्या काशी. कस्तूरी मृग नाभी माहीं, बन-बन फिरत उदासी. जल बिच कमल कमल बिच कलियां, तां बिच भंवरलुभासी. विषयन बस सब लोग भयो है, जती-सती संन्यासी. प्यास और पानी का गहरा रिश्ता है. प्यास का अनुभव होते ही मनुष्य क्या, पशु-पक्षी भी पानी की खोज शुरू कर देते हैं. गर्मी के मौसम में गहरी प्यास के बाद पानी मिलता है तो वह अमृत-सा मीठा लगता है. मछली पानी में रहती है. उसके ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं सब ओर पानी-ही-पानी होता है. फिर भी वह प्यासी रहती है. क्यों? यदि वह प्यासी नहीं होती तो कबीर को ऐसा गीत क्यों लिखना पड़ता? मछली प्यासी है पर कैसे? इस प्रश्न के समाधान में एक ही बात उभर कर आती है कि यह एक रूपक है. प्रश्न पानी और मछली का नहीं, आंतरिक तड़प का है, लगन का है. जिस व्यक्ति को जिस व्यक्ति या जिस तत्त्व की अपेक्षा होती है, उसके लिए वह काशी, मथुरा या वृंदावन कहीं चला जाए, जब तक उसकी प्राप्ति नहीं होती, प्यास नहीं बुझ सकती. इसी तरह जिस व्यक्ति की अध्यात्म में आस्था है, जो अध्यात्म को समझने और जीने के लिए उत्सुक है, उसके लिए सबसे अभीष्ट तत्त्व है आत्मा या परमात्मा से साक्षात्कार. जब तक आत्मज्ञान नहीं होता, व्यक्ति भटकता रहता है. मृग की नाभि में कस्तूरी होती है. वह इस रहस्य को जानता नहीं. कस्तूरी की गंध उसे आकृष्ट करती है. वह इधर दौड़ता है, उधर दौड़ता है पर कस्तूरी को पा नहीं सकता. क्योंकि वह अज्ञानी है. उसके अज्ञान पर कोई भी हंस सकता है, तरस खा सकता है. किंतु मनुष्य का अपना आचरण कैसा है? इस सम्बंध में वह नहीं सोचता. 'जब जागे तभी सबेरा से'

2456 days 2 hrs 32 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... संसार में सभी व्यक्ति अंतर्ज्ञान से परिपूर्ण होते हैं।...... जिस प्रकार धूल से दर्पण ढक जाता है, उसी प्रकार सभी व्यक्तियों का ज्ञान रूपी दर्पण कामना रूपी धूल से ढक जाता है।....... जब व्यक्ति स्वार्थ की भावना का त्याग करके निरन्तर कर्म करता है, उस व्यक्ति के ज्ञान पर से कामनाओं का आवरण स्वतः ही हटने लगता है, और एक दिन भगवान की कृपा से अंतर्ज्ञान सूर्य के सामान स्वतः प्रकट हो जाता है।

2456 days 4 hrs 32 mins ago By Waste Sam
 

राधे राधे, अंतर्ज्ञान गुरु की कृपा और भगवान की कृपा से ही प्राप्त हो सकता है | उन्हें की कृपा से अंतर ज्ञान हमारे भक्ति और मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करता है | गुरु के निष्काम सेवा और भगवान से निष्काम प्रेम ही हमारे अंतर्ज्ञान को बढा सकता है | जय श्री राधे

2456 days 5 hrs 39 mins ago By Chandrani Purkayasth
 

श्री कृष्ण स्मरण , सहज समर्पण . राधे रानी के चरण शरण, मोह के बंधन मिट जाएँ, अंतरज्ञान का जागरण . shee krishna smaran, sahaj samarpan , radhe rani ke charan sharan, moh ke bandhan mit jayein, antargyan ka ho jagran

2456 days 5 hrs 45 mins ago By Vijay Mishra
 

जय श्रीकृष्ण , जब मनुष्य दैनन्दिन,आहार -विचार ,यम -नियम ,उपवास ,जप -तप,व्यायाम ,प्राणयाम ,आदि स्तर से ऊपर साधना -ध्यान पर जा पहुँचता है तब क्रमशः उसका आत्म -ज्ञान उत्तरोत्तर बढता जाता है . इसकी कोई वैकल्पिक व्यबस्था नहीं है .

 
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