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हमे अपनी इक्छा शक्ति कैसी रखनी चाहिये ?

इस बारे में आपका क्या द्रष्टिकोण है?

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2245 days 46 mins ago By Waste Sam
 

राधे राधे, हमे अपनी इच्छा शक्ति सत्त्व गुण प्रधान रखनी चाहिए | अर्थात हमे सदा अपने और दूसरो के उठान के विषय में ही सोचना और कार्यान्वित रहना चाहिए | अपनी अंदर की बुराइयों को भी सकारात्मक कार्यो के लिए प्रयोग करना चाहिए | भगवान को पाने की इच्छा और उनसे सदा प्रेम बढाने की इच्छा ह्रदय में होनी चाहिए और अपने आसपास के लोगो को भी इसके लिए प्ररित करते रहना चाहिए | जय श्री राधे

2246 days 19 hrs 8 mins ago By Meenakshi Goyal
 

इच्छाशक्ति मनुष्य की वह आतंरिक इच्छा होती है जिसकी प्रबलता उसे अपने लक्ष्य को पाने की शक्ति प्रदान करती है । सफलता के लिए मनुष्य में प्रबल इच्छाशक्ति का होना जरूरी है। वह उत्साह को वेग के साथ आगे बढ़ाती है। थोड़ी भी बाधा अनुभव नहीं होने देती। लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रयत्न प्रारंभ करते ही बाधाएं आने लगती है। जिस प्रकार आग के पास गीली लकड़ी सूखने लगती है और जलकर ताप देने लगती है, उसी प्रकार मंद इच्छा होने पर भी उत्साह पूरे जोर से उसे फल प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है। व्यक्ति शुरू में तीव्र इच्छा लेकर चलता है, परंतु बाधाओं के कारण शिथिलता आ जाती है। उसे लगता है कि प्रयत्न बेकार हो रहा है। यह अस्थिरता फल प्राप्ति में बाधक है। अगर अस्थिरता को स्थिरता में परिवर्तन कर लें तो लक्ष्य तक पहुंचना आसान होता है। अगर साधक प्रकाश चाहता है तो अपने अंदर प्रकाश की अनुभूति करनी होगी, दृढ़ता चाहता है तो दृढ़ शक्ति का अनुभव करना होगा, प्रभु की शक्ति प्राप्त करने के लिए अपने व्यक्तित्व में प्रभु की अनुभूति करनी होगी। प्रभु की अनेक अभिव्यक्तियां है ज्ञान की, शक्ति की, ऐश्वर्य की, संपत्ति की, रचना की, विनाश की और उत्पत्ति की। साधक को अपनी कामना के अनुसार किसी की भी प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना है। उसकी अनुभूति जितनी तीव्र होगी उतनी ही उस अस्तित्व का अनुभव होगा। शक्ति संचार का यही रहस्य है। प्रभु के प्रति जिसकी भावना जैसी होती है उसी रूप में प्रभु की अनुभूति होती है। कोई प्रभु को स्वामी मानता है कोई प्रेमी, कोई पति तो कोई सखा। मीराबाई ने श्रीकृष्ण को अपना स्वामी मानकर पूरा जीवन समर्पित कर दिया। साधक भिन्न-भिन्न इच्छा और भावों को लेकर उपासना करता है वह अपने को भूल जाता है, उसकी इच्छाएं समाप्त हो जाती है। भक्तियोग में भाव का अधिक महत्व है। वहां इसका अर्थ प्रभु के साथ संबंध और इसकी अनुभूति प्राप्त करना मात्र रह जाता है। ऐसा लक्ष्य होना चाहिए जो सारे दोषों से अलग हो। धन, ऐश्वर्य और यश संकुचित भावना लिए हैं इन भावनाओं से परे रहकर दृढ़ता से प्रभु से जुड़ने का प्रयत्न आदर्श भावनाओं को विकसित करता है। मन का अर्थ इच्छाशक्ति और बुद्धि का अर्थ है विवेकशक्ति। जब इच्छा और विवेक में समन्वय नहीं रहता है तो व्यक्तित्व अशांत हो जाता है। बुद्धि हानि का संकेत देती है, परंतु मन नहीं मानता। यह दृढ़संकल्प से ही दूर होगी।....... प्रार्थना से हमारी इच्छाशक्ति सही दिशा में विकसित होने लगती है।

2247 days 11 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... इच्छा-शक्ति का उपयोग सदैव कर्तव्य-कर्म के द्वारा लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये होता है, प्रत्येक व्यक्ति का लक्ष्य अपनी-अपनी अवस्था के अनुसार बदलता रहता है।....... प्रत्येक जीवात्मा का परम-लक्ष्य परमात्मा है।......... इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को परम-लक्ष्य को ध्यान में रखकर ही कर्तव्य-कर्म करने की अपनी इच्छा-शक्ति रखनी चाहिये।

 
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