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भगवान ने ये दुनिया क्यों बनायीं?

इस बारे में आपका क्या द्रष्टिकोण है? आप इस बारे में क्या सोचते है? दुनिया में इतनी विविधता क्यों है ? और परमात्मा इन सभी विविधताओ से हमें क्या शिक्षा देना चाहता है?

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2762 days 3 hrs 6 mins ago By Ajay Verma
 

WHO AM I ko hum pahachan lage tab hame abodha gayan prapta hoga

2762 days 3 hrs 10 mins ago By Ajay Verma
 

bus vishwas karani ki jarurat hai

2762 days 3 hrs 12 mins ago By Ajay Verma
 

hum or good eak dusari ki jarurat hain

2767 days 21 hrs 57 mins ago By Gaurav Malhotra
 

kyo bnaye iseh chodo thakur ji ka name lo or enjoy karo

2854 days 17 hrs 41 mins ago By Waste Sam
 

radhey radhey... sada he ek nirakar avinashi satta rehte hai aur jab yeh satta roop le lete hai toh woh yeh sansar ban jata hai... yeh nirakaar satta kai tarah ke sakaar roop le lete hai... bhagwan yeh sansar ke rachna karte taki alag alag roopo mein swatantra roop se hum sab indriyon dwara is sansar ke ras ko le.... parantu iss swatantra mein bhi hume apne udgamya sthan (bhagwan) ke smriti sada rakhne chahiye... bhagwan ne itne vivdhita isliye banayi taki woh sakaar roop mein alag alag tarah se ras le aur tab bhi sab meinn ekatva ka darshan kare arthat bhagwan ka.... jai shri radhey

2866 days 39 mins ago By Vipin Sharma
 

DUNIYA AUTOMATIC HAI SAB KUCH AUTOMATIC CHALTA RAHTA H. ISME BHAGWAAN KA KOI ROLE NAHI H. AGAR HOTA TO BHAGWAN KISI KO DUKHI NAHI KARTE, VO TO PREEM OR DAYA KA SAAGAR HAIN, FIR VO APNI BANAYI HUI DUNIYA KO DUKHI KYUN KARTE APNI BANAYI HUI CHEEZ SE SABHI PREM KARTE HAI.

2867 days 2 mins ago By Vipin Sharma
 

YE DUNIYA TO PAHLE SE HI THI IS DINIYA SE HI BHAGWAN BANE,.

2873 days 19 hrs ago By Gulshan Piplani
 

जिस प्रकार आप घर बनाते हैं रहने के लिए इसी प्रकार दुनियां भगवान का घर समझो| जहां तक समस्त ब्रह्माण्ड के जीव सोच सकते हैं वोह सब सोच विविधता द्वारा हमें दिखती है| जिस विविधता को प्रभु स्वीकार कर सकते हैं वोह हमें भी स्वीकार्य होने चाहिए|

2881 days 18 hrs 29 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

प्रभु ने अपनी मौज में लीला वश ये दुनिया बनायी ! राधे राधे

2883 days 22 hrs 35 mins ago By Gulshan Piplani
 

आकाश वायु को जन्म देता है| वायु अग्नि को जन्म देती है| अग्नि जल को जन्म देती है| जल पृथ्वी को जन्म देता है| पृथ्वी प्रकृति को जन्म देती है और पृकृति मनुष्य को शरीर प्रदान करती है| इस प्रकार सृष्टि का नियम चलता है| गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने अध्याय - १५ के शलोक - ७ के एक दोहे को में उद्धृत कर रहा हूँ दोहा मेरी पुस्तक जोकि गीता जी का दोहे में अनुवाद है जिसका नाम गीता जी कविता जी है| मेरा सूक्ष्म कण बुद्धजीव, है अंश मेरा सनातन | घोर संघर्ष में जूझता, छ: इन्द्रियों संग मन || पांच ज्ञान इन्दिरियाँ हैं छटा मन को बताया है इसी प्रकृति में संभव जन्म और में पिता बीज प्रदाता| पूर्व कर्मानुसार जीव अपनी योनी बदल कर आता || १४.४ विविधता सृष्टि के सञ्चालन हेतु प्रदान कि गयी ताकि मनुष्य इस पैर विचार कर सके

2920 days 5 hrs ago By Aditya Bansal
 

RADHEY RADHEY COZ APNAE ANDAR CHUPE ANSH KO PEHCHANNE KE LIYE

2933 days 3 hrs 22 mins ago By Aditya Bansal
 

radhey radhey

2952 days 4 hrs 18 mins ago By Jaswinder Jassi
 

ये दुनिया भगवान ने अपनी प्रकिती से बनवाई और प्रकीर्ति ही इससे चला रही है ] और प्रकीर्ति ने जीवों की रचना अपनी प्रकीर्ति को चलाने के लिए की है न के किस्सी धर्मकर्म के कारेओ के लिए जीव(मानुष) पैदा किये हैं ] प्रकिरती के नौ मूल स्रोत हैं (सूरज, चाँद ,तारे, मिटी ,अग्नि ,पानी, वायु{हवा }, जी{मनं }, और आकाश{आवाज़ } मिटी-अग्नि - पानी वायु और आकाश के मुख स्रोत से कण निकल कर आपस में जुर्ते हैं और एक बॉडी (सरीर) की रचना होती है ] जे रचना जब से प्रकीर्ति होन्द में आई तब्ब से लगातार हो रही है ] जिस के कारण मुख स्रोतों में कम्मी आना लाजमी है अगर प्रकीर्ति उस कमी को पूरा नही करेगी तो एक सम्मे ऐसा आयेगा जब प्रकीर्ति में बॉडी ही बॉडी होंगी ] इस लिए प्रकीर्ति ने बॉडी( तन्न ) के साथ मनं लग्गा कर जीवों की रचना कर दी , जीव क्या करते हैं ,सबबी प्रकार के जीव वस्तू (बॉडी/तन्न ) खुराक के रूप अपने सरीर के अंदर ले जाते हैं जीवों के सरीर के अंदर रर्सैनिक किर्या होती है जिस से वस्तु अपने मूल तत्व में टूट जाती है ,मल के रूप में जीव उस को सृष्टी बखेर देता है जो अपने मूल तत्व (पानी पानी में हवा हवा में मिटी मिटी में अग्नि अग्नि में और आकाश आकाश में मिल कर उन स्रोतों आई कम्मी को पूरा कर देते हैं ] मानुष का तिआगा मल पशु खा जाते हैं , पशुओं का तिआगा मल पक्षी खा जाते हैं और पक्षिओं की बीठ बनस्पति खाती है ]ये किर्या चारोँ प्रकार के जीव मिल कर लगातार करते रहते हैं ] प्रकीर्ति ने जीवों की रचना केवल इस्सी लिए की हुई है , ये धर्म कर्म पाप पुन स्वर्ग नरक मानुष की अपनी रचना है और कुश नही ] अब्ब विचारण की बात ये है के जीव निर्जीव की रचना में परमात्मा का रोल है ] किओके परमात्मा कोई वस्तु नही केवल ख़ाली स्थान जो के हर समय हर जगह मजूद रहता है , इस को कोई वस्तु नही कहा जा सकता मगर सभी वस्तुए इस के कारण इस के भीतर से ही दिखाई देती एक कण से ले कर ग्रेह तक इस के घेरे में हैं ] सबी इस में ही चल रहे हैं ] ये वस्तु से पहले बी होता है , वस्तू नज़र आते सम्मे ये वस्तु के चोगिर्द रहता है और जब वस्तु नही होती ये फिर बी व्ही पर होता है ] ये कही से नही आता और न ही कही जाता ] जीव निर्जीव वस्तुओं के कण इस में चल कर ही आपस में jur कर पंज तत्व वस्तुओं की रचना करते हैं ] सारी प्रकीर्ति सभी वस्तुए इस में टिकी हुई हैं और चल रही हैं >>>>>>>>> जस्सी

2960 days 2 hrs 7 mins ago By Aditya Bansal
 

hum bhagwan ke ansh hai wahi mil jayenge...hume check karne ke liye mera yeh hissa paap karm karta hai ya punya

2977 days 3 hrs 34 mins ago By Jaswinder Jassi
 

प्रकीर्ति ने जीवों की रचना अपनी प्रकीर्ति को चलाने के लिए की है न के किस्सी धर्मकर्म के कारेओ के लिए जीव(मानुष) पैदा किये हैं ] प्रकिरती के नौ मूल स्रोत हैं (सूरज, चाँद ,तारे, मिटी ,अग्नि ,पानी, वायु{हवा }, जी{मनं }, और आकाश{आवाज़ } मिटी-अग्नि - पानी वायु और आकाश के मुख स्रोत से कण निकल कर आपस में जुर्ते हैं और एक बॉडी (सरीर) की रचना होती है ] जे रचना जब से प्रकीर्ति होन्द में आई तब्ब से लगातार हो रही है ] जिस के कारण मुख स्रोतों में कम्मी आना लाजमी है अगर प्रकीर्ति उस कमी को पूरा नही करेगी तो एक सम्मे ऐसा आयेगा जब प्रकीर्ति में बॉडी ही बॉडी होंगी ] इस लिए प्रकीर्ति ने बॉडी( तन्न ) के साथ मनं लग्गा कर जीवों की रचना कर दी , जीव क्या करते हैं ,सबबी प्रकार के जीव वस्तू (बॉडी/तन्न ) खुराक के रूप अपने सरीर के अंदर ले जाते हैं जीवों के सरीर के अंदर रर्सैनिक किर्या होती है जिस से वस्तु अपने मूल तत्व में टूट जाती है ,मल के रूप में जीव उस को सृष्टी बखेर देता है जो अपने मूल तत्व (पानी पानी में हवा हवा में मिटी मिटी में अग्नि अग्नि में और आकाश आकाश में मिल कर उन स्रोतों आई कम्मी को पूरा कर देते हैं ] मानुष का तिआगा मल पशु खा जाते हैं , पशुओं का तिआगा मल पक्षी खा जाते हैं और पक्षिओं की बीठ बनस्पति खाती है ]ये किर्या चारोँ प्रकार के जीव मिल कर लगातार करते रहते हैं ] प्रकीर्ति ने जीवों की रचना केवल इस्सी लिए की हुई है , ये धर्म कर्म पाप पुन स्वर्ग नरक मानुष की अपनी रचना है और कुश नही ] अब्ब विचारण की बात ये है के जीव निर्जीव की रचना में परमात्मा का रोल है ] किओके परमात्मा कोई वस्तु नही केवल ख़ाली स्थान जो के हर समय हर जगह मजूद रहता है , इस को कोई वस्तु नही कहा जा सकता मगर सभी वस्तुए इस के कारण इस के भीतर से ही दिखाई देती एक कण से ले कर ग्रेह तक इस के घेरे में हैं ] सबी इस में ही चल रहे हैं ] ये वस्तु से पहले बी होता है , वस्तू नज़र आते सम्मे ये वस्तु के चोगिर्द रहता है और जब वस्तु नही होती ये फिर बी व्ही पर होता है ] ये कही से नही आता और न ही कही जाता ] जीव निर्जीव वस्तुओं के कण इस में चल कर ही आपस में jur कर पंज तत्व वस्तुओं की रचना करते हैं ] सारी प्रकीर्ति सभी वस्तुए इस में टिकी हुई हैं और चल रही हैं >>>>>>>>>

2978 days 1 hrs 56 mins ago By Jaswinder Jassi
 

प्रकीर्ति ने जीवों की रचना अपनी प्रकीर्ति को चलाने के लिए की है न के किस्सी धर्मकर्म के कारेओ के लिए जीव(मानुष) पैदा किये हैं ] प्रकिरती के नौ मूल स्रोत हैं (सूरज, चाँद ,तारे, मिटी ,अग्नि ,पानी, वायु{हवा }, जी{मनं }, और आकाश{आवाज़ } मिटी-अग्नि - पानी वायु और आकाश के मुख स्रोत से कण निकल कर आपस में जुर्ते हैं और एक बॉडी (सरीर) की रचना होती है ] जे रचना जब से प्रकीर्ति होन्द में आई तब्ब से लगातार हो रही है ] जिस के कारण मुख स्रोतों में कम्मी आना लाजमी है अगर प्रकीर्ति उस कमी को पूरा नही करेगी तो एक सम्मे ऐसा आयेगा जब प्रकीर्ति में बॉडी ही बॉडी होंगी ] इस लिए प्रकीर्ति ने बॉडी( तन्न ) के साथ मनं लग्गा कर जीवों की रचना कर दी , जीव क्या करते हैं ,सबबी प्रकार के जीव वस्तू (बॉडी/तन्न ) खुराक के रूप अपने सरीर के अंदर ले जाते हैं जीवों के सरीर के अंदर रर्सैनिक किर्या होती है जिस से वस्तु अपने मूल तत्व में टूट जाती है ,मल के रूप में जीव उस को सृष्टी बखेर देता है जो अपने मूल तत्व (पानी पानी में हवा हवा में मिटी मिटी में अग्नि अग्नि में और आकाश आकाश में मिल कर उन स्रोतों आई कम्मी को पूरा कर देते हैं ] मानुष का तिआगा मल पशु खा जाते हैं , पशुओं का तिआगा मल पक्षी खा जाते हैं और पक्षिओं की बीठ बनस्पति खाती है ]ये किर्या चारोँ प्रकार के जीव मिल कर लगातार करते रहते हैं ] प्रकीर्ति ने जीवों की रचना केवल इस्सी लिए की हुई है , ये धर्म कर्म पाप पुन स्वर्ग नरक मानुष की अपनी रचना है और कुश नही ] अब्ब विचारण की बात ये है के जीव निर्जीव की रचना में परमात्मा का रोल है ] किओके परमात्मा कोई वस्तु नही केवल ख़ाली स्थान जो के हर समय हर जगह मजूद रहता है , इस को कोई वस्तु नही कहा जा सकता मगर सभी वस्तुए इस के कारण इस के भीतर से ही दिखाई देती एक कण से ले कर ग्रेह तक इस के घेरे में हैं ] सबी इस में ही चल रहे हैं ] ये वस्तु से पहले बी होता है , वस्तू नज़र आते सम्मे ये वस्तु के चोगिर्द रहता है और जब वस्तु नही होती ये फिर बी व्ही पर होता है ] ये कही से नही आता और न ही कही जाता ] जीव निर्जीव वस्तुओं के कण इस में चल कर ही आपस में jur कर पंज तत्व वस्तुओं की रचना करते हैं ] सारी प्रकीर्ति सभी वस्तुए इस में टिकी हुई हैं और चल रही हैं >>>>>>>>>

2992 days 2 hrs 10 mins ago By Rk Radhakripa
 

testing facebook post

2992 days 11 hrs 35 mins ago By Ajay Nema
 

Agreed Ravi ji ...

2995 days 5 hrs 51 mins ago By Mamta Gupta
 

prayer to lord krishna........... he krishna karuna-sindho dina-bandho jagat-pate gopesha gopika-kanta radha-kanta namo 'stu te "O my dear Krishna, You are the friend of the distressed, the ocean of mercy, and the Lord of creation. You are the master of the cowherdsmen and the lover of the gopis, especially Radharani. I offer my respectful obeisances unto You."

2995 days 15 hrs 48 mins ago By Sarveshwar Dayal Nem
 

jai shri krishna....... bhagwan ne ye duniya kyo banai aur vo bhi gol...kahi se bhi ao ant me wahi pahuch jaoge ....jaise Ritu Chakra .... Khadya Srankhla.... Pryawaran Shrankhla.. aur bhi bhut kuch sath hi sath bhagwan ne INSAN ki utpatti ka vihar aaya.... parantu insan apne chanchal swbhav ke karan bhagwad bhakti se bhatak gya .... tb bhagwan ne sadhu aur mahatmao ki rachna ki taki unka jeewan punaa bhagwad bhakti se sarabor ho jaye ... fir bhi jb insan raste par nahi aaya to parabramh parmatma ko dusto ka sarvnash kkrne swayam, aana pada arthat bhagwan ko apni leleye dikhane ke liye uunhone sansar baya.... JAi Jai Shri Radhe.....

2995 days 21 hrs 42 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... भगवान तो स्वयं में परिपूर्ण हैं...... पूर्ण मदः, पूर्ण मिदं, पूर्णात, पूर्ण मुदचत्ये। पूर्णस्य, पूर्ण मादाये, पूर्ण मेवावशिश्यते॥ जो परिपूर्ण परमेश्वर है, वही पूर्ण ईश्वर है, वही पूर्ण जगत है, ईश्वर की पूर्णता से पूर्ण जगत सम्पूर्ण है। ईश्वर की पूर्णता से पूर्ण ही निकलता है और पूर्ण ही शेष बचता है। यही परिपूर्ण परमेश्वर की यह पूर्णता ही पूर्ण विशेषता है। इच्छा ही दुनियाँ की उत्पत्ति का मूल कारण है। भगवान के मन में भी इच्छा उत्पन्न हुई कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ, इसी कारण सृष्टि की उत्त्पत्ति। वही इच्छा प्रत्येक मनुष्य के मन में भी उत्पन्न होती है, तब व्यक्ति एक से अनेक हो जाता है। इसी पर संत कबीर दास जी ने कहा है..... इच्छा काया, इच्छा माया, इच्छा जग उपजाया। कहत कबीर इच्छा विवर्जित, ता का पार ना पाया॥ भगवान इन सभी विविधताओं के माध्यम से सभी जीवात्माओं को "अनेक में एक" को देखने की शिक्षा देते हैं।

2996 days 2 hrs 10 mins ago By Sanjay Agarwal
 

भगवान ने सृष्टि की रचना इसलिए की कि भगवान का अकेले मन नहीं लगा ! पहले भगवान ने वनस्पतियों, जीव जंतुओं की रचना की ! फिर भगवान ने सोचा कि भगवान के जैसा ही कोई हो जो उनके जैसे रंग रूप आकार बल बुद्धि वाला हो जिसके साथ वे क्रीडा कर सकें, कभी भगवान स्वयं जीतें और कभी अपने भगत के जितायें ! भगवान की बनाई हुई दुनिया में विविधता का कारण भी यही है कि जीव उकताए नहीं ! इसीलिए भगवान ने गर्मी के बाद सर्दी, सर्दी के बाद गर्मी, पतझड़ के बाद वसंत, वसंत के बाद शीतकाल बनाया ! निष्कर्ष यह कि भगवान की बनाई प्रकृति में सबकुछ बदल रहा है और अस्थायी है ! केवल आत्मस्वरूप अस्थायी है ! अतः विवेक से जानकार ऊपर उठ कर परम तत्व को जानने में मानव जीवन की सार्थकता है !

2996 days 2 hrs 17 mins ago By Parul Srivastava
 

I don't know and my question is fate or luck which one is neccessory in life?.

2996 days 2 hrs 40 mins ago By Ajay Nema
 

This is discussion forum yougesh you can raise your question... We are hoping that somebosy will try to answer here ...

2996 days 2 hrs 42 mins ago By Yogesh Goyal
 

Today i'll be there in discussion . i m very much confused about this.,

2996 days 3 hrs 28 mins ago By Manish Nema
 

भगवान ने ये दुनिया इस लिए बनाई की हम सभी लोग इसमें रह सके और उस परमात्मा को याद कर सके और इतनी विविधता से वो हमे यह बताना चाहता हे की हम सभी को एक साथ रहना हे क्योकि हम सभी उस परमात्मा के ही अंश हे हम उनसे अलग नहीं हे.और इस दुनिया की विविधता उस परमात्मा की विराटता को प्रदशित करती हे. //जय जय श्री राधे //

2996 days 3 hrs 34 mins ago By Suraj Misra
 

maine jo bhi santo ke mukh se suna hai wo apni mati anusar main batane ki koshos karunga sharsti ya duniya bhagwan ne sirf apne bhakto ke liye banai hai. kyuki unki iksha matra se hi sarsti ka nirman aur sanghar hota hai, kyuki ishwar ho bhi karta hai apne bhkto ke liye hi karta hai. Is duniya me itani vividhta kyu hai wo isliye shyad ki hum apne karmo ke anusar hi kuchh pate ya khote hain, kyuki karmo ka bandhan bahut dukha deta hai, Iswadr in vividhtaun se hame ye shikhsa deta hai ki jiv ko hamesha hi satkarma karte rehna chaheye, kyuki jaisa karoge waisa hi bharoge, Kuchh galtiyan ho to sorryyyyyyyyyyyyyy, Jai shree Radhe Radhe

2996 days 3 hrs 39 mins ago By Nidhi Nema
 

मेरी नजर में भगवान प्रेम से बने है,प्रेम ही खाते है, प्रेम ही पीते है, प्रेम ही लेते है, प्रेम ही देते है,सिर से पैर तक प्रेम ही प्रेम से भरे है.पर फिर भी उन्हें प्रेम करने वाला चाहिये था इसलिए उन्होंने सोचा कि दुनिया रूपी घर बनाया जाये जिसमे इंसान बनाया जाये जो मुझसे प्रेम करे.इसलिए दुनिया बनायीं.विविधता इसलिए बनायीं कि भगवान ने सोचा कि जब में प्रेम ही देता हूँ तो दुनिया में भी सभी विविध होने पर भी आपस में प्रेम करेगे.

 
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