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श्राद्ध का भोजन पितरो तक कैसे पहुँचता है ?

इस बारे में आपका क्या द्रष्टिकोण है?

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2626 days 19 hrs 6 mins ago By Waste Sam
 

राधे राधे, जब भगवन ब्रह्मा इस संसार की रचना तब उन्होंने जब पिता का रूप धारण किया और उस शरीर को छोड़ा तब उसने पितरो का रूप ले लिया | इन्हें पितरो की पत्नी है स्वधा और ये ही आदि पितृ हमारे पितरो को श्राद्ध का भोजन प्राप्त करवाते है जो खुद आ कर भोजन ग्रहण नहीं कर सकते नीच योनियों में होने के कारण | हमारे जो पितृ खुद आ कर भजन ग्रहण कर सकते है वो तो ब्राह्मणों के द्वारा या किसी पशु पक्षी के रूप में खुद आ कर प्राप्त कर लेते है | और जो पितृ मोक्ष प्राप्त कर लेते है उनके निमित्त किया हुआ श्राद्ध, श्राद्ध करने वाले व्यक्ति के निमित्त पितरलोक में जमा हो जाता है और श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को उसके मरण के उपरांत प्राप्त हो जाता है | जय श्री राधे

2630 days 56 mins ago By Aditya Bansal
 

पितरों तक यह भोजन ब्राह्माणों व पक्षियों के माध्यम से पहुंचता है. .... पार्वण श्राद्ध में 9 ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है, किंतु शास्त्र किसी एक सात्विक एवं संध्यावंदन करने वाले ब्राह्मण को भोजन कराने की भी आज्ञा देते हैं। ..... इसके अलावा श्राद्ध में कैसे ब्राह्मणों को आमन्त्रित किस प्रकार किया जाये,कब आमन्त्रित किया जाये,निमत्रण के बाद ..... यदि वे दैत्य (असुर) हो गये हैं तो वह (श्राद्ध में दिया गया भोजन) उनके पास भाँति-भाँति के आनन्दों के रूप में पहुँचता

2631 days 22 hrs 45 mins ago By Dasabhas DrGiriraj N
 

जो सद्गृहस्थ शरीर छोड़ते हैं वे पितृलोक में सूक्ष्म शरीर से रहते हैं | पितृलोक का एक दिन प्रथ्वीलोक के एक वर्ष के बराबर होता है वर्ष में एक दिन होने वाला श्राद्द्य वहाँ प्रतिदिन प्राप्त होता है | अग्नि देव - देवताओं व भगबान की कोरियर - सेवा करते हैं | जिस देवता के मंत्र से हवन होगा वह वह उस देवता के पहुंचाना अग्निदेव की ड्यूटी है | गोपाल मंत्र से अग्नि में हवन करो तो श्री गोपाल के पास वह घृत समिधा पहुँचा देते है पितृ क्योंकि देवताओं से कनिष्ठ हैं और अग्नि देवता है, इसलियेपितृलोक में कोरियर का काम 'अग्निदेव 'की अंश रूपा - मानव के शरीर में स्थित 'जठराग्नि' करती है इसलिये हम श्राद्द्य का अन्न किसी श्रेष्ठ ब्राह्मन को खिलते हैं, उसकी पेट की 'जठराग्नि' वह अन्न - भोजन हमारे पितरों तक पहुंचा देती है | ब्राह्मन या शुद्र या क्षत्रिय या वैश्य एक तो जन्म से होते है - एक कर्म से जन्म से ब्राह्मन हो और उसके कर्म शुद्र जैसे हों तो उससे बेहतर है एक शुद्र - जिसके कर्म कार्य ब्राह्मन जैसे हों | श्रेष्ठ कर्म वाले, सदाचारी, सात्विक भगवतभक्त - जिसका कहीं न कहीं सत्य, अद्द्यात्म, ईश्वर से कोई सम्वन्ध हो उसे श्राद्द्य अन्न खिलाया जाता है | महाप्रभु श्री चैतन्य ने अपने पिता का श्राद्द्य यवन जाति के नामनिष्ठ नामाचार्य श्री हरिदास को खिलाया था | लेकिन, न तो ब्राह्मन, न धर्म, न सदाचार भजन, भगवान से जिसका वास्ता है - जैसे कोढ़ी, गरीब, फूटपाथ वाले को भोजन देने से वह - गरीब भोजन है श्राद्द्य नहीं | उसकी जठराग्नि की ब्पहुंच नहीं की वह इस अन्न भोजन को हमारे पितरों तक पहुंचा सके | वो ब्राह्मन नहीं है न,जन्म से, न कर्म से | एक ब्राह्मन यदि कर्म से ब्राह्मन नहीं हैं तो जन्म से तो है ही - वह इनसे श्रेष्ठ पात्र है - शायद सर्वश्रेष्ठ नहीं | सर्वश्रेष्ठ वही है - जो जन्म एवं कर्म दोनों से ब्रह्मण हो, मध्यम वह है जो किसी एक से श्रेष्ठ हो | जो न जन्म से, न कर्म से वह अधम है वह श्राद्द्य का पात्र ही नहीं है | यह सब अति सूक्ष्म सिस्टम है - समझ आए न आये काम करता है जैसे मोबाइल में एक नंबर दबाने से यु. एस. में भाई से दूसरा नंबर दबाने से दिल्ली कोई और नंबर दबाने से अपने ही घर में दूसरे कमरे में अपनी पत्नी शालिनी से बात हो जाती है बात होती है, सिस्टम काम करता है, हमें समझ आये न आये | अवश्य कुछ लोग हैं जिन्हें सिस्टम भी समझ आता है | तुम सिस्टम फोलो करो सिस्टम समझ में आ जाये तो ठीक न आये तो ठीक | बात तो हो ही जायेंगी | और उलटे सीधे मनमाने ढंग से बटन दबाओगे - तो बात नहीं होगी श्राद्द्य नहीं होगा - श्राद्द्य नहीं होगा | jai SHRI RADHE DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia Lives, Born, Works = L B W at Vrindaban www.harinampress.com www.shriharinam.blogspot.com

2632 days 3 hrs 28 mins ago By Dasi Radhika
 

पुनर्जन्म के सिद्धान्त के अनुसार आत्मा एक शरीर को छोड़कर दूसरे नवीन शरीर में प्रविष्ट होती है। किन्तु तीन पूर्व पुरुषों के पिण्डदान का सिद्धान्त यह बतलाता है कि तीनों पूर्वजों की आत्माएँ 50 या 100 वर्षों के उपरान्त भी वायु में सन्तरण करते हुए चावल के पिण्डों की सुगन्धि या सारतत्व वायव्य शरीर द्वारा ग्रहण करने में समर्थ होती हैं। पितामह लोग (पितर) श्राद्ध में दिये गये पिण्डों से स्वयं संतुष्ट होकर अपने वंशजों को जीवन, संतति, सम्पत्ति, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सभी सुख एवं राज्य देते हैं। See More:http://www.radhakripa.com/book/page.php?book=pitra_paksh&article=shradh_ka_bhag&lang=hindi

 
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