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मोह और आसक्ति क्या है?

इसका जीवन मे क्या प्रभाव है और इससे कैसे बचा जाये?

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2633 days 20 hrs 18 mins ago By Waste Sam
 

राधे राधे यह भाव के यह मेरा है ही मोह है और आसक्ति है किसी और के वस्तु को अपना समझाना और अपना हक जमाना | जय श्री राधे

2634 days 16 hrs 25 mins ago By Gulshan Piplani
 

चित जन्य बंधन का नाम मोह है जब तक मनुष्य अपने विश्वाशों की परिधि में ही घूमता रहता है, तब तक उसका केंद्र उसके विश्वास ही बने रहते हैं| और वह मैं, मेरी के चक्कर में ही फंसा जीवन गुजार देता है| उसके प्रेम का दायरा भी इतना सीमित होता है की वोह उससे तब तक बाहर नहीं निकल पाता जब तक उसके मेरे अर्थात मोह उससे दूरी नहीं साधते|.......................न्यू पेराग्राफ..............................................ज्यों ज्यों उसके मेरे अपने उससे दूर होने लगते हैं उसका मोह भंग होना शुरू होता है| अगर वह पास रहते हैं तो बुरा भला सुन कर भी वोह अपने मोह से अलग अपनी अस्तित्वता नहीं पहचान पाता| और अपने अंतर में दर्द का बढ़ता हुआ दायरा झेलता रहता है| नहीं जानता की उसकी अपनी परिधि से बाहर भी लोग उससे प्रेम करते थे और करते हैं| ..................न्यू पेराग्राफ..................................उसके अंतर में प्रेम, दम तोड़ने लगता है| क्योंकि व्यक्ति की अस्मिता उसके पार्थिव शरीर और उससे जुड़े लोगों से जुडी रहती है जो सतत उसे मोह का बोध कराती रहती है| दरअसल जब तक अहम रहता है तब तक मैं और मेरे का बोध रहता है जो उसे अपनी चार दिवारी से बाहर नहीं निकलने देता| जबकि ऐसा भी नहीं है की जीवन में कभी भी उसे यह अहसास नहीं हुआ होता कि सीमता के त्याग के पश्चात ही असीमता प्राप्त हो सकती है| अगर वह मोह से हटकर प्रेम देना सीख ले..................न्यूपेराग्राफ................................वह नहीं जान पाता की उसका प्रेम घर की चार दिवारी से बाहर निकल कर सागर में भी हिलोरें मार सकता है परन्तु वह अज्ञान वश भटकता है और आसक्तियों का शिकार हो जाता है| शराब, सिगरेट, अफीम इत्यादि जैसी भोतिक वस्तुओं की आसक्ति का गुलाम बन जीवन व्यतीत कर देता है| और प्रेम कि असीमता को प्राप्त नहीं हो पाता| अगर वोह मोह और आसक्ति से बाहर झांक कर भी देखे तो पायेगा कि एक नहीं अनेक लोग उसके दायरे से बाहर भी उसका इंतज़ार कर रहे हैं| पर वहां भी शर्त प्रेम देने कि होगी मांगने की नहीं| - हरिओम तत्सत -

2634 days 16 hrs 25 mins ago By Gulshan Piplani
 

चित जन्य बंधन का नाम मोह है जब तक मनुष्य अपने विश्वाशों की परिधि में ही घूमता रहता है, तब तक उसका केंद्र उसके विश्वास ही बने रहते हैं| और वह मैं, मेरी के चक्कर में ही फंसा जीवन गुजार देता है| उसके प्रेम का दायरा भी इतना सीमित होता है की वोह उससे तब तक बाहर नहीं निकल पाता जब तक उसके मेरे अर्थात मोह उससे दूरी नहीं साधते|.......................न्यू पेराग्राफ..............................................ज्यों ज्यों उसके मेरे अपने उससे दूर होने लगते हैं उसका मोह भंग होना शुरू होता है| अगर वह पास रहते हैं तो बुरा भला सुन कर भी वोह अपने मोह से अलग अपनी अस्तित्वता नहीं पहचान पाता| और अपने अंतर में दर्द का बढ़ता हुआ दायरा झेलता रहता है| नहीं जानता की उसकी अपनी परिधि से बाहर भी लोग उससे प्रेम करते थे और करते हैं| ..................न्यू पेराग्राफ..................................उसके अंतर में प्रेम, दम तोड़ने लगता है| क्योंकि व्यक्ति की अस्मिता उसके पार्थिव शरीर और उससे जुड़े लोगों से जुडी रहती है जो सतत उसे मोह का बोध कराती रहती है| दरअसल जब तक अहम रहता है तब तक मैं और मेरे का बोध रहता है जो उसे अपनी चार दिवारी से बाहर नहीं निकलने देता| जबकि ऐसा भी नहीं है की जीवन में कभी भी उसे यह अहसास नहीं हुआ होता कि सीमता के त्याग के पश्चात ही असीमता प्राप्त हो सकती है| अगर वह मोह से हटकर प्रेम देना सीख ले..................न्यूपेराग्राफ................................वह नहीं जान पाता की उसका प्रेम घर की चार दिवारी से बाहर निकल कर सागर में भी हिलोरें मार सकता है परन्तु वह अज्ञान वश भटकता है और आसक्तियों का शिकार हो जाता है| शराब, सिगरेट, अफीम इत्यादि जैसी भोतिक वस्तुओं की आसक्ति का गुलाम बन जीवन व्यतीत कर देता है| और प्रेम कि असीमता को प्राप्त नहीं हो पाता| अगर वोह मोह और आसक्ति से बाहर झांक कर भी देखे तो पायेगा कि एक नहीं अनेक लोग उसके दायरे से बाहर भी उसका इंतज़ार कर रहे हैं| पर वहां भी शर्त प्रेम देने कि होगी मांगने की नहीं| - हरिओम तत्सत -

2637 days 2 hrs 19 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... किसी भी भौतिक वस्तु से प्रेम होना ही आसक्ति कहलाती है।.... इस आसक्ति के कारण मोह की उत्पत्ति होती है।.... मोह का मूल कारण जीवात्मा द्वारा स्वयं के भौतिक स्थूल शरीर को स्वयं समझना होता है।.... इस मोह के कारण ही जीवन में बंधन उत्पन्न होता है।.... इससे बचने के अनेकों विधियाँ वेद-शास्त्रों में बताई गयी हैं।.... वेद-शास्त्रों में बताई गयी अनेकों विधियों में से किसी भी एक विधि को अपनी अवस्था के अनुरूप अपनाकर ही बचा जा सकता है।

 
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