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हम आध्यात्म की लगन को कैसे जागृत करें?

इस बारे में आपका क्या द्रष्टिकोण है?

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2611 days 11 hrs 16 mins ago By Waste Sam
 

राधे राधे अध्यात्म की लगन को जगाने के लिए हमे सबसे पहले कुछ प्रश्नों के उत्तर की ललक होनी चाहिए जैसे मृत्यु के बाद क्या होता है, मृत्यु क्या है, हमने जन्म क्यों लिया इत्यादी; जब हम इन् प्रश्नों के उत्तर जानने के कोशिश करते है तब हम अध्यात्म का रास्ता दिखता है और हममे अध्यातम की लगन जागृत हो जाती है | जय श्री राधे

2616 days 14 hrs 29 mins ago By Aditya Bansal
 

इसका उतर तो हमे अपने अन्दर से लेना पड़ेगा...हमे यह देखना है हम इस जीवन से किया चाहते है...हम इस जीवन में क्यूँ आये है...हमरा लक्ष्य क्या है...इसके लिए हम गीता सार भगवत गीता या कोई भी और बुक पास सकते है

2619 days 1 hrs 15 mins ago By Ramesh Chandra Saras
 

हम अध्यात्म की लगन को अपने सच्चे मन से ईश्वर को पुकारकर ही जाग्रत कर लेते है मेरे लिए ऐसा करना बहुत ही आसान है क्योंकि मुझे ज्यादा की कोई तमन्ना नहीं है जितना है में उसी में खुश हूँ और में मौत को एक उत्सव के रूप में लेता हूँ ना की शोक और संताप के रूप में हम इस दुनिया में आये जरूर रोते हुए लेकिन जायेंगे नहीं रोते हुए ये मेरा अटल इरादा है और सौ बात की एक बात मुझे जितना भरोसा आधुनिक विज्ञान जगत पर करीब उतना ही बल्कि उससे ज्यादा ऊपर वाले की शक्ति पर भी है और में दोनों को ही पसंद करता हूँ

2619 days 10 hrs 58 mins ago By Gulshan Piplani
 

पहले तो यह समझना आवश्यक है कि अध्यातम क्या है| १. क्या अध्यातम धर्म है? नहीं अध्यातम धरम नहीं है धर्म मात्र एक दिशा है| धर्म अलग अलग हो सकते हैं| २. अध्यातम क्या एक विचार है? नहीं विचार भी भिन्न भिन्न होते हैं ३.अध्यात्म क्या सत्य का ज्ञान है? तो हर व्यक्ति की अपनी प्रकृति और ज्ञान के अनुसार सत्य की परिभाषा अलग अलग हो सकती है| लोगों का देवताओं को लेकर ही मत-भेद देखने को मिलता है| वेद व्यास जी की वेदांत दर्शन ब्रह्म सूत्र में पृष्ठ - ७४ में शाकल्य ने ३३ बताया है अन्य ३३ करोड़, कितना बड़ा मतभेद है ३३ से ३३,००,००,००० तक का मतभेद| हर कोई ज्ञान प्राप्त करने के लिए जिस सत्संग से जुड़ा होता है उसकी आसक्ति अपने गुरु और सत्संग से हो जाती है और अपने गुरु द्वारा प्रेषित विचार ही उसके लिए सत्य होते हैं| हम विचारें तो यहाँ भी मतभेद हो सकते हैं| और होना कोई बुरी बात भी नहीं| तो फिर अध्यात्म क्या है?.........................................................................................न्यू पाराग्राफ............................................................................................................सम्पूर्ण विश्व की नज़रे आजकल अध्यात्म में रचे बसे भारत की ओर हैं| तो क्या अध्यात्म अपने से भिन्न अर्थात किसी अन्य की कृति से प्रेम का नाम है| पर + कृति = प्रकृति से प्रेम का नाम है अध्यात्म| इसको यूं भी समझ सकते हैं कि मात्र स्वयं से प्रेम न करने का नाम अध्यात्म है| या दूसरे शब्दों में कहें तो सम्पूर्ण जीवों से प्रेम करना ही अध्यात्म की परिभाषा है| जब हम हर मनुष्य से ही नहीं हर जीव से प्रेम करने लगते हैं| उस अदृश्य सत्ता कि बनायीं हुई हर वस्तु (कृति) से प्रेम करने लगते हैं तो हम अध्यात्मिक कहलाने के हकदार हो जाते हैं| तो इसका तात्पर्य तो यही हुआ कि उस अदृश्य सत्ता को स्वीकारना ही अध्यातम है|.....................................................................................न्यू पाराग्राफ....................................................................... उस अदृश्य सत्ता ने हमें जल, पृथ्वी , वायु, आकाश, अग्नि बिना किसी शर्त के प्रदान की भिन्न भिन्न विचारों के लोगों को भी उस अदृश्य सत्ता ने बिना किसी शर्त के अपनी कृति प्रदान कर दी अपना प्रेम बिना किसी शर्त के प्रदान कर दिया| तो जब हम उस अदृश्य सत्ता से प्रेम करने लगते हैं तो हम अध्यात्मिक कहलाते हैं| और ऐसा होते ही अध्यातम में स्वत: संतुलन आने लगता है - हरि ॐ तत्सत् -

2619 days 12 hrs 2 mins ago By Bhakti Rathore
 

राधे राधे जब तक उनकिहम पर नहीं होगी !तब तक हम कुछ नहीं कर, पायेगे उनकी मर्जी क बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिलता हे . जब उनकी कीपर हो जाएगी तो उनका हाथ सर पैर रख देंगी बस मन अपने आप उस और मुड़ जायगा और लगन लग जाएगीउनसे हेर पल राधे राधे रथ जा और आगे बढ़ता जा

2619 days 12 hrs 55 mins ago By Gulshan Piplani
 

परमात्मा की बनायीं हर कृति और हर प्रकृति को स्वीकारना प्रारंभ कर दें अर्थात दूसरों की कृति और प्रकृति को आत्मसात करना प्रारंभ कर दें और बाकि परमात्मा पर छोड़ दें - हरि ॐ तत-सत् -

2619 days 17 hrs 48 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... (आध्यात्म की लगन = सत्य को जानने की जिज्ञासा).... जब व्यक्ति असत्य को ही सत्य समझता रहता है तब तक उस व्यक्ति में आध्यात्म की लगन जागृत नहीं होती है।.... जब व्यक्ति सत्संग के द्वारा सत्य और असत्य का भेद (ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या) को जान जाता है तभी उस व्यक्ति में आध्यात्मिकता की लगन जागृत होती है।.... इससे पहले तो सभी में भौतिकता की ही लगन जागृत रहती है।

 
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