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ब्रज की क्या महिमा है?

क्यों भगवान भी ब्रज रज को अपने मस्तक पर धारण करते है ?

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2622 days 15 hrs 4 mins ago By Aditya Bansal
 

व्रज समुद्र मथुरा कमल, वृन्दावन मकरंद। व्रजबनिता सब पुष्प हैं, मधुकर गोकुलचंद॥

2622 days 15 hrs 4 mins ago By Aditya Bansal
 

(2)ब्रज का हर वृक्ष देव हैं, हर लता देवांगना है, यहाँ की बोली में माधुर्य है, बातों में लालित्य है, पुराणों का सा उपदेश है, यहाँ की गति ही नृत्य है, रति को भी यह स्थान त्याग करने में क्षति है, कण-कण में राधा-कृष्ण की छवि है, दिशाओं में भगवद नाम की झलक, प्रतिपल कानों में राधे-राधे की झलक, देवलोक-गोलोक भी इसके समक्ष नतमस्तक हैं। सम्पूर्ण ब्रज-मण्डल का प्रत्येक रज-कण, वृक्ष, पर्वत, पावन कुण्ड-सरोवर और श्री यमुनाजी श्रीप्रिया-प्रियतम की नित्य निकुंज लीलाओं के साक्षी हैं। श्री कृष्ण जी ने अपने ब्रह्मत्व का त्याग कर सभी ग्वाल बालों और ब्रज गोपियों के साथ अनेक लीलाएँ की हैं। यहाँ उन्होने अपना बचपन बिताया। जिसमें उन्होने ग्वाल बालों के साथ क्रीड़ा, गौ चारण, माखन चोरी, कालिया दमन आदि अनेक लीलाएँ की हैं। भगवान कृष्ण की इन लीलाओं पर ही ब्रज के नगर, गाँव, कुण्ड, घाट आदि स्थलों का नामकरण हुआ है।

2622 days 15 hrs 4 mins ago By Aditya Bansal
 

समस्त ब्रज मण्डल को रसिक संतजनों ने बैकुण्ठ से भी सर्वोपरि माना है। इससे ऊपर और कोई भी धाम नहीं है जहाँ प्रभु ने अवतार लेकर अपनी दिव्य लीलायें की हों। इस ब्रज भूमि में नित्य लीला शेखर श्रीकृष्णजी की बांसुरी के ही स्वर सुनाई देते हैं अन्य कोलाहल नहीं। यहाँ तो नेत्र और श्रवणेन्द्रियाँ प्रभु की दिव्य लीलाओं का दर्शन और श्रवण करते हैं। यहाँ के रमणीय वातावरण में पक्षियों का चहकना, वायु से लताओं का हिलना, मोर बंदरों का वृक्षों पर कूदना, यमुना के प्रवाहित होने का कलरव, समस्त ब्रज गोपिकाओं का यमुना से अपनी- अपनी मटकी में जल भर कर लाना और उनकी पैंजनियों की रुनझुन, गोपिकाओं का आपस में हास-परिहास, ग्वालवालों का अपने श्याम सुन्दर के साथ नित्य नयी खेल-लीलाओं को करना, सभी बाल सखाओं से घिरे श्री कृष्ण का बड़ी चपलता से गोपियों का मार्ग रोकना और उनसे दधि का दान माँगना। यमुना किनारे कदम्ब वृक्ष के ऊपर बैठकर बंशी बजाना और बंशी की ध्वनि सुनकर सभी गोपिकाओं का यमुना तट पर दौड़कर आना और लीला करना यही सब नन्द नन्दन की नित्य लीलाएं इस ब्रज में हुई हैं। यहाँ की सभी कुँज-निकुँज बहुत ही भाग्यशाली हैं क्योंकि कहीं प्यारे श्याम सुन्दर का किसी लता में पीताम्बर उलझा तो कहीं किसी निकुँज में श्यामाजू का आँचल उलझा। प्रभु श्री श्याम सुन्दर की सभी निकुँज लीलायें सभी भक्तों, रसिकजनों सन्तों को आनन्द प्रदान करती हैं।

2626 days 15 hrs 44 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

प्रभु को अनन्य भाव से प्रेम करने वाली गोपिओं के ब्रज में अवतरित होने के कारण उन गोपिओं के चरणों को छूकर ये रज इतनी पवित्र हो गयी की प्रभु भी इस रज को अपने माथे से लगाते हैं | ब्रज की महिमा गोपिओं के कारण से ही है | राधे राधे

2626 days 17 hrs 45 mins ago By Gulshan Piplani
 

इस भूमि को भी भगवान्‌ श्रीकृष्ण गो लोक से यहाँ लाए थे।

भगवान् श्रीकृष्ण को अवतरित हुए पाँच सहस्र से अधिक
वर्ष  व्यतीत हो चुके  हैं , आज भी सम्पूर्ण जगत में उनका कीर्तिगान एवं  परम पावन भूमि की भी महिमा व्याप्त है, जहाँ की रज को माथे पर धारण करने के लिए लोग तरसते हैं|भगावन्‌ श्रीकृष्ण ने जहां  शरीर धारण किया था और नाना प्रकार की अलौकिक लीलाएँ की, यही नहीं, अनेक भक्त  तो वहाँ के टुकड़ों को मांग कर जीवन निर्वाह करना बेहतर समझते हैं और वह इसके लिए भगवान्‌ से  प्रार्थना भी करते हैं। कबीर जी कहते हैं की मेरा ऐसा मन करता है कि

कर करवा हरवा गुंजनकौ कुंजन माहिं बसेरो|

भूख लगै तब मांगि खाउंगो, गिनौं न सांझ सबेरो।
ब्रज-बासिन के टूक जूंठ अरु घर-घर छाछ महेरो॥


2627 days 7 hrs 21 mins ago By Pt Chandra Sagar
 

"वृन्दावनं  संप्रविश्य सर्वकाल सुखावहम "अर्थात जहाँ सभी काल सुख ही सुख है ,

जहाँ ब्रह्मा भी कीट-पतंग बनना चाहते हैं , जहाँ उद्धव भी लता-पता बन्ने को तरसते हैं ,
और तो और जहाँ श्री कृष्ण स्वयं एक कटोरी छाछ के लिए गोपियों के पीछे -पीछे 
भागते हैं |
एक व्रज रेणुका पे चिंता मणि वारि डारौ ,लोकंको बारि डारौ सेवाकुंज के विहारपे|
लतन के पातन पे कल्पवृक्ष वारि डारौ ,रमाहुको वारि डारौ गोपिनकेद्वार पे ||
बृज पनिहारिन्पे वारि डारौ शची-रति वारि डारौ ,वैकुण्ठ को वारि डारौ कालिंदी की धार पे |
कहै अभैराम एक राधाजी को जानत हो ,देवन को वारि डारौ नन्द के कुमार पे ||

2627 days 14 hrs 6 mins ago By Bhakti Rathore
 

राधे राधे जहा भगवान ने स्वयं जबन लिया हो वहा की क्या महिमा बटी जाए उसका तो कोई वहा का क्या बखान करेगा , जिसका बखान स्वयं ब्रह्मा जी नहीं केर पाए ! तो इंसान तो क्या करेगा और हमे तो वहा की राज धुल हे मिलती रहे बस यही हमारा सोभीग्य हे ! राधे राधे

2628 days 9 hrs 10 mins ago By Nidhi Nema
 

सत्य, रज, तम इन तीनों गुणों से अतीत जो पराब्रह्म है, वही व्यापक है. इसीलिए उसे ही ब्रज कहते हैं. यह सच्चिदानन्द स्वरूप परम ज्योतिर्मय और अविनाशी है. वेदों में भी ब्रज शब्द का प्रयोग हुआ है, "व्रजन्ति गावो यस्मिन्नति ब्रज:" अर्थात् गौचारण की स्थली ही ब्रज कहलाती है,


2628 days 9 hrs 13 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... 

ब्रज की महिमा का शब्दों वर्णन करना असंभव है, ब्रजरज में तो नित्य नई अनुभूति होती है, यहाँ की अनुभूति को शब्दों में ढाल पाना संभव नहीं है। 

ब्रज में भगवान अपने भक्तों के साथ नित्य लीलायें करतें हैं, यहाँ "मुक्ति देवी" स्वयं भक्तों के द्वार पर हाथ जोड़कर अपने को वरण करने की प्रार्थना करती है लेकिन भक्त मुक्ति का वरण नहीं करते हैं।

....प्रसंग....

एक दिन अत्यन्त दुखी होकर "मुक्ति देवी" भगवान से प्रार्थना करती है, प्रभु आपके भक्त तो मेरा वरण ही नहीं करते हैं, तो आप बतायें कि मेरी मुक्ति कैसे होगी।

तब भगवान "मुक्ति देवी" से कहते है कि तू निरन्तर ब्रज में वास कर वहाँ मेरे भक्तों की चरण रज जब तेरे मस्तक का स्पर्श करेगी तो तू भी मुक्त हो जायेगी।

'मुक्ति कहे गोपाल सों मेरी मुक्ति बताय,
ब्रजरज उड़ मस्तक लगे तो मुक्ति मुक्त हो जाये।'

 
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