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मृत्यु और पुनर्जन्म के मध्य के समय मे क्या होता है?


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2618 days 12 hrs 52 mins ago By Gulshan Piplani
 

जब जीवात्मा अपने स्थूल शरीर का त्याग करती है तो वह उसी शरीर के आसपास भटकती है| उसका बंधन उस शरीर से जुड़ा रहता है| परन्तु समय पूरा हो जाने के कारणवश मात्र वह ही उस शरीर में पुनर्स्थापित नहीं हो सकती परन्तु कोई अन्य आत्मा उस शरीर में घुस सकती है|............................. इसलिए ही वहां दीपक जला कर रक्खा जाता है की कोई और आत्मा मृतक के शरीर में परवेश न ले सके| जब शरीर का दाह संस्कार कर दिया जाता है उसके पश्चात भी उस शरीर की आत्मा शमशान में विचार रही होती है इसलिए ही सब सगे सम्बन्धियों को बेठा कर घांस के दो टुकड़े कर पीछे फैंकने के लिए पुजारी कहता है इसका तात्पर्य है कि मृतक की आत्मा से हमारा सम्बन्ध विच्छेद हो गया| .................................परन्तु १३ दिनों तक आत्मा उस जगह के आसपास भटकती है जहां उसने शरीर का त्याग किया होता है यह उसका मोह होता है| इसलिए १३ दिनों तक ब्रह्मचर्य का विधान शास्त्रों में दिया गया है| यह क्रिया बेठ कर इस लिए करायी जाती है क्योंकि आत्मा बेठ नहीं सकती पर वोह उड़ सकती है|........................................ इसके पश्चात आत्मा निष्क्रिय हो जाती है और नए शरीर को अपने गुणानुसार तलाशने लगती है| परन्तु जिस प्रकार हम स्वपन में सब घटनायें होती हुई देखते हैं और हमें बाद में भी लगता है की मैं यह सब कर रहा हूँ वोही स्थिति निष्क्रिय अवस्था में आत्मा की होती है परन्तु स्थूल शरीर के तत्व न होने की वजह से वह जीव के कर्म न कर पाने को बाध्य होती है| ऐसा मेरा मत है| - हरिओम तत्सत -

2618 days 12 hrs 52 mins ago By Gulshan Piplani
 

जब जीवात्मा अपने स्थूल शरीर का त्याग करती है तो वह उसी शरीर के आसपास भटकती है| उसका बंधन उस शरीर से जुड़ा रहता है| परन्तु समय पूरा हो जाने के कारणवश मात्र वह ही उस शरीर में पुनर्स्थापित नहीं हो सकती परन्तु कोई अन्य आत्मा उस शरीर में घुस सकती है|............................. इसलिए ही वहां दीपक जला कर रक्खा जाता है की कोई और आत्मा मृतक के शरीर में परवेश न ले सके| जब शरीर का दाह संस्कार कर दिया जाता है उसके पश्चात भी उस शरीर की आत्मा शमशान में विचार रही होती है इसलिए ही सब सगे सम्बन्धियों को बेठा कर घांस के दो टुकड़े कर पीछे फैंकने के लिए पुजारी कहता है इसका तात्पर्य है कि मृतक की आत्मा से हमारा सम्बन्ध विच्छेद हो गया| .................................परन्तु १३ दिनों तक आत्मा उस जगह के आसपास भटकती है जहां उसने शरीर का त्याग किया होता है यह उसका मोह होता है| इसलिए १३ दिनों तक ब्रह्मचर्य का विधान शास्त्रों में दिया गया है| यह क्रिया बेठ कर इस लिए करायी जाती है क्योंकि आत्मा बेठ नहीं सकती पर वोह उड़ सकती है|........................................ इसके पश्चात आत्मा निष्क्रिय हो जाती है और नए शरीर को अपने गुणानुसार तलाशने लगती है| परन्तु जिस प्रकार हम स्वपन में सब घटनायें होती हुई देखते हैं और हमें बाद में भी लगता है की मैं यह सब कर रहा हूँ वोही स्थिति निष्क्रिय अवस्था में आत्मा की होती है परन्तु स्थूल शरीर के तत्व न होने की वजह से वह जीव के कर्म न कर पाने को बाध्य होती है| ऐसा मेरा मत है| - हरिओम तत्सत -

2633 days 8 hrs 43 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

mrityu aur punarjanm ke beech wahi hota hai roj hota hai ham raat ko shayan karte hain aur subah fir chetan ho jaate hain farak sirf itna hai mrityu ke baad punarjanm me shareer badal jaata hai chetna naye shareer ko dhaaran kar leti hai aur shayan ki kriya me roj hamaari chetna vaapas usi shareer me laut aati hai. jaise gahan nidra me ham kahan hote hai uska bhaan nahi hota aise hi mrityu aur punarjanm ke beech ka bhaan nahi rahta vo nishkriya avastha hai....
radhe radhe

2635 days 16 hrs 21 mins ago By Aditya Bansal
 

निद्रा से जाग्रित अवस्था मे जब आप आते हैं तो उसके मध्य के समय मे क्या होता है? वैसा ही होता है-आप निष्क्रिय होते हैं| जब समय आ जाता है तो चेतना वापिस आ जाती है|

2635 days 16 hrs 22 mins ago By Aditya Bansal
 

आध्यात्मिक सम्पत्ति।

2636 days 6 hrs 48 mins ago By Neeru Arora
 

जब जीव+आत्मा अपने स्थूल शरीर का त्याग करती है उस वक्त अगर वह ज्योतिमान हो जाये को कारन शरीर जल कर अंदर ही अंदर भस्म हो जाता है परन्तु अगर कारन शरीर भस्म नहीं होता तो उसका कारन भी सूक्षम शरीर में हस्तांतरित हो जाता है| और सूक्षम शरीर प्रकृति में ही विद्यमान रहता है| और जीवात्मा पुन: अपने नए शरीर को तलाशने में लग जाती है| पूर्व ज्ञान अर्थात यादाश्त सूक्ष्म शरीर में हस्तांतरित हो जाती है और जितने विकार उस जीवात्मा में रह जाते हैं वह सूक्ष्म शरीर में रह जाते हैं| और वाही नूतन शरीर के प्राप्त होते ही पुन प्राप्त होते हैं| - जय श्री कृष्णा

2636 days 7 hrs 25 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... जीवात्मा के वर्तमान स्थूल शरीर के कार्यकाल पूर्ण होने को मृत्यु और नवीन स्थूल शरीर की प्राप्ति होने को पुनर्जन्म कहा जाता है।.... जीवात्मा के वर्तमान स्थूल शरीर के छूट जाने के बाद और नवीन स्थूल शरीर प्राप्त होने से पहले कुछ समय के लिये केवल सूक्ष्म शरीर में (स्थूल शरीर के बिना) रहती है, सूक्ष्म शरीर में जीवात्मा का सत्य से साक्षात्कार होता है, जीवात्मा को सत्य जानकर अपनी भूल का अहसास होता है तब जीवात्मा भगवान से क्षमा मांगती है और बार-बार प्रार्थना करती है कि मुझे भूल सुधारने का एक अवसर प्रदान करें।.... तब परम कृपालु भगवान जीवात्मा को नवीन शरीर प्रदान करते हैं।.... नवीन स्थूल शरीर प्राप्त होते ही जीवात्मा का यह ज्ञान सांसारिक मोह के कारण अज्ञान से आवृत हो जाता है।.... यह अज्ञान का आवरण केवल सत्संग से ही हट सकता है।

2636 days 7 hrs 57 mins ago By Waste Sam
 

radhey radhey... mrityu aur punarjanam ke beech mein hum pret ho jate hai aur yeh samay hum yamraj ke pass jate apne karmo ke hissab ke liye... jai shri radhey

2636 days 11 hrs 27 mins ago By Raghu Raj Soni
 

निद्रा से जाग्रित अवस्था मे जब आप आते हैं तो उसके मध्य के समय मे क्या होता है? वैसा ही होता है-आप निष्क्रिय होते हैं| जब समय आ जाता है तो चेतना वापिस आ जाती है|

2636 days 17 hrs 51 mins ago By Dasi Radhika
 

निद्रा से जाग्रित अवस्था मे जब आप आते हैं तो उसके मध्य के समय मे क्या होता है? वैसा ही होता है-आप निष्क्रिय होते हैं| जब समय आ जाता है तो चेतना वापिस आ जाती है|

 
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