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जब भगवान श्री कृष्ण थे, तो गोपियों की पूजा पद्धति क्या थी?


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2731 days 19 hrs 22 mins ago By Bhakti Rathore
 

radhe radhe her samy wo unke he dhyan me magan rahti thi jo bhi kaam kerti thi wo sub unko samprit kerti jaati thi her samay unke he dhyan me magan radhe radhe

2733 days 14 hrs 7 mins ago By Neeru Arora
 

प्रेम निश्चलता का स्वरूप है उसे किसी पद्धति में नहीं बांधा जा सकता| क्योंकि प्रेम बंधता नहीं है प्रेम मात्र देने का नाम है लेने का नहीं और यह कोई वस्तु भी नहीं कि जिसे लेने वाला इनकार करे तो देने वाले पर रोक लगाई जा सके| तो गोपियाँ बस प्रेम करती थीं भगवन श्री कृष्ण में लीन रहती थीं| बाकि तो कवियों ने अपनी कविताओं को अलंकृत करने हेतु ही श्रृंगारों के अतिश्योक्त वर्णन किये - जय श्री कृष्णा

2737 days 20 hrs 30 mins ago By Raghu Raj Soni
 

गोपियों की न कोई पूजा थी, न पद्धति थी 'गोपी प्रेम की ध्वजा' यानी गोपियाँ प्रेम का ही मूर्तिमान रूप थीं. पहले अनेक बार कहा जा चुका है की जो कृष्ण से हो वाही प्रेम - बाकी सब काम बस वो तो कृष्ण से केवल और केवल प्रेम करती थीं वह यदि श्रृंगार करती थी तो इसलिए की कृष्ण हमें देख कर प्रसन्न होंगे कृष्ण को जो जो अच्छा लगे वाही करती थीं, इससे उनका चाहे कुल नष्ट हो या धर्म या कुछ भी. विशुद्ध 'कृष्ण सुखैक तत्पर्यमयी' भक्ति करती थीं. उनका सम्पूर्ण रूप, रस, आचरण, ध्यान, पूजा कुल, धर्म, अधर्म, सब कुछ श्रीकृष्ण सुख, श्री कृष्ण सेवा ही थी

2737 days 21 hrs 5 mins ago By Aditya Bansal
 

राधा कृष्ण". हालांकि भगवान के ऐसे रूप की पूजा करने के काफी आरंभिक संदर्भ मौजूद हैं, पर जब सन बारहवीं शताब्दी में जयदेव गोस्वामी ने प्रसिद्ध गीत गोविन्द लिखा, तो दिव्य कृष्ण और उनकी भक्त राधा के बीच के ... यह भी माना जाता है कि राधा मात्र एक चरवाहे की कन्या नहीं हैं, बल्कि सभी गोपियों या उन दिव्य व्यक्तित्वों का मूल हैं जो रास नृत्य में भाग लेती हैं. .... है जिस काल में शंकराचार्य हुए थे, और वे प्रथम आचार्य थे जो कृष्ण के साथ राधा की आराधना सखी भाव उपासना पद्धति में करते थे

2738 days 2 mins ago By Dasabhas DrGiriraj N
 

गोपियों की न कोई पूजा थी, न पद्धति थी 'गोपी प्रेम की ध्वजा' यानी गोपियाँ प्रेम का ही मूर्तिमान रूप थीं. पहले अनेक बार कहा जा चुका है की जो कृष्ण से हो वाही प्रेम - बाकी सब काम बस वो तो कृष्ण से केवल और केवल प्रेम करती थीं वह यदि श्रृंगार करती थी तो इसलिए की कृष्ण हमें देख कर प्रसन्न होंगे कृष्ण को जो जो अच्छा लगे वाही करती थीं, इससे उनका चाहे कुल नष्ट हो या धर्म या कुछ भी. विशुद्ध 'कृष्ण सुखैक तत्पर्यमयी' भक्ति करती थीं. उनका सम्पूर्ण रूप, रस, आचरण, ध्यान, पूजा कुल, धर्म, अधर्म, सब कुछ श्रीकृष्ण सुख, श्री कृष्ण सेवा ही थी जय श्री राधे DASABHAS Dr GIRIRAJ nangia Tele : 9219 46 46 46 : 12noon - ६ made to serve ; GOD thru Family n Humanity

2738 days 2 hrs 17 mins ago By Vipul Nema
 

gopi bagwan se bahut prem karti hai. prem jagat me saar are koi saar nahi hai gopi ki pujaa hai sampud samarpn apna sab kuchh shri krishan ko arpit kar diya hai. ek sansrik jiwan jite hiye bagwan ke prem me ni sawath bhakti ki hai jo ki asli pujaa hai.

2738 days 3 hrs 28 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... भगवान श्री कृष्ण के ध्यान में मग्न रहकर अपने सभी सांसारिक कर्तव्य-कर्मों का निर्वाह करना ही गोपीयों की पूजा पद्धति थी।.... किसी भी गृहस्थ के लिये यही सर्वश्रेष्ठ पूजा पद्धति होती है।

2738 days 3 hrs 57 mins ago By Chandrani Purkayasth
 

गोपियाँ मूलतः कृष्ण को मधुर भाव से प्रेम करती थी. कृष्ण उनके जीबन में रक्षक , सखा , संगी,प्रेमी, सर्बोपरी पति की भूमिका में आसीन थे . कृष्ण नाम की धुन में ही उनका जीबन अर्पित हो चूका था. अपने कृष्ण को वह हर जगह प्रत्यक्ष करती, कृष्ण के लिए हसती, रोती, जीति , मरती. कृष्ण की बिना उनके लिए संसार विषवत था. कृष्ण को माखन खिलाना, कभी तंग करना, रूठना, मानना , सताना, प्यार से गले लगाना. बस वही तो पूजा थी उनकी. श्रेस्ठ पूजा. शास्त्रों में भी मधुर भाव को सबसे गहरा भाव कहाँ गया हैं .क्यों की मधुर भाव ,बात्सल्य, सख्य, दास्य आदि सभी भावों के मिश्रण के बना हुआ वह भाव हैं जिसमे भक्त भगवान के सबसे अधिक निकट पँहुच सकता हें.इसीलिए तो उद्धव जी ने ज्ञान की प्राप्ति के बाद कहा था , की ब्रज के धूलिकना से लेकर, तृण , पेड़ , पौधे, लता, पशु , पक्षी ,नरनारी सब धन्य हैं क्यों की स्वयं परमेश्स्वर ब्रज में पधारे. धन्य हैं वह गोपियाँ जिनके प्रेम में बंधन में बंधने वाले परम पुरुष स्वयं ही ख़ुशी ख़ुशी प्रेम पाश में बंध गयें. कान्हा , तू मेरो जीबन धन. तुही प्राण , तू ही मन. तुझ पर अर्पण तन , मन धन, हे कृष्ण मुरारी, स्वीकारो यह सहज समर्पण

 
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