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प्रेम और मोह में क्या अंतर है?

इस बारे में आपका क्या द्रष्टिकोण है?

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2754 days 21 hrs 37 mins ago By Mahavirsinh N Gohil
 


prem me kuch pane ki aas nahi hoti ...moh me sab pane ki aas hoti he

2764 days 10 hrs 42 mins ago By Dasabhas DrGiriraj N
 

किसी वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा का नाम है - काम उस वस्तु के प्राप्त न होने पर क्रोध होता है उस वस्तु को और अधिक - अधिक चाहने का नाम लोभ है ये वस्तुएं कम न हों, नष्ट न हों, यह भाव मोह है उन वस्तुओं के कारन जो श्रेष्ठत्व का भाव है, वह है मद जितनी वस्तुएं या धन संपत्ति मेरे पास है, उतनी दुसरे के पास क्यों है-यह है मात्सर्य प्रेम इन सबसे अलग एक श्रेष्ठतम भाव है प्रेम और मोह का दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं मोह में नष्ट न होने का भाव है प्रेम में अपने बारे में तो कुछ सोचना ही नहीं है हमेशा और हमेशा प्रियतम के हित, सुख की बात करनी है अपनी बात आते ही प्रेम काम बन जाता है एक और बहुत पक्की बात है जो ९९.९% लोगों को समझ ही नहीं आती है यदि कृष्ण से हो तो वह है प्रेम, किसी भी और से हो तो वह है काम क्योंकि प्रेम के विषय एकमात्र श्रीकृष्ण ही हैं. जय श्री राधे -दासाभास गिरिराज

2766 days 13 hrs 14 mins ago By Waste Sam
 

radhey radhey... mere mat anussar sadaharan sabdo mein prem ka prayaywachi hai "niswarth" aur mooh ka praryawachi hai "swarth".. bus jitna antar inn shabdo mein hai unta hee antar hai prem aur mooh mein.. jai shri radhey

2767 days 17 hrs 13 mins ago By Avichal Mishra
 

prem yani; par(prmeshwar) ke wash!!!! Moh yani; man(Maya) ke wash!!!!

2767 days 22 hrs 44 mins ago By Aditya Bansal
 

मोह वही है जो तुम्हे पीड़ा देता है। प्रेम वही है जिसके बिना तुम रह नहीं सकते हो। अगर प्रेम मोह में परिवर्तित हो जाये, तो वही प्रेम जो तुम्हें आनंद दे रहा था, पीड़ा देने लगता है। मोह में कुछ बदले में पाने की भावना रहती है। अगर तुम प्रेम करो और बदले में कुछ न चाहो, तब वो प्रेम मोह में परिवर्तित नहीं होता। नारद भक्तिसूत्र के विवेचन में मैंने प्रेम के विषय में बताया है।

2768 days 17 hrs 24 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

प्रेम वो है जहाँ खोने का भय ना हो और मोह वो है जहाँ खोने भय हो | मोह हमेशा काम से होता है जैसे ही हमारी कोई कामना पूरी होती है हमें उससे मोह हो जाता है की अब ये हमारे हाथ से ना चली जाए | किसी ने धन कमाया तो हमेशा उस धन की रक्षा करेगा की कहीं हाथ से निकल ना जाए | किसी के सन्तान हुई तो उसकी रक्षा, कोई पदवी मिल गयी तो उसकी रक्षा कहीं सम्मान मिल गया तो उसकी रक्षा | कहने का तात्पर्य ये है की जो वस्तु या सम्मान हमें मिल जाता है और हम सोचते हैं की हमें अपनी क्रियाओं या मेहनत के द्वारा ये प्राप्ति हुई है उससे मोह हो जाता है हम उसे अपना मान बैठते हैं और अपना मानना ही मोह का कारण है | और प्रेम वो है जो प्रेमास्पद के मिलने पर तो बढता ही है पर उसके विरह में और बढ़ जाता है वहाँ खोने का डर ही नहीं है | और अगर बहुत सूक्षम में जाएँ तो संसार में किसी से भी प्रेम होता ही नहीं वहाँ मोह ही होता है क्योंकि कोई ना कोई काम जरूर रहता है प्रेम तो सिर्फ और सिर्फ कृष्ण या कहें प्रभु से ही हो सकता है | प्रभु से है तो प्रेम बाकी सब मोह के अंतर्गत ही आते हैं | राधे राधे

2768 days 20 hrs 29 mins ago By Dasabhas DrGiriraj N
 

unable to post

2768 days 20 hrs 29 mins ago By Dasabhas DrGiriraj N
 

PREM YA MOH?

2769 days 12 hrs 22 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... जो वास्तव में अपना है उसे अपना समझना प्रेम होता है और जो अपना नहीं है उसे अपना समझना मोह होता है।.... भगवान को ही अपना समझना प्रेम होता है और संसार के किसी भी शरीर या किसी भी वस्तु को अपना समाझना मोह होता है।.... केवल एक को ही अपना समझना प्रेम होता है और अनेकों को अपना समझना मोह होता है।.... प्रेम से आनन्द की प्राप्ति होती है और मोह से सुख-दुख की प्राप्ति होती है।.... किसी का हो जाना प्रेम होता है और किसी को अपना बनाना मोह होता है।.... प्रेम से मुक्ति की प्राप्ति होती है और मोह से सांसारिक बंधन की प्राप्ति होती है।

2769 days 12 hrs 30 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... जो वास्तव में अपना है उसे अपना समझना प्रेम होता है और जो अपना नहीं है उसे अपना समझना मोह होता है।.... भगवान को ही अपना समझना प्रेम होता है और संसार की किसी भी शरीर या किसी भी वस्तु को अपना समाझना मोह होता है।.... केवल एक को ही अपना समझना प्रेम होता है और अनेकों को अपना समझना मोह होता है।.... प्रेम से आनन्द की प्राप्ति होती है और मोह से सुख-दुख की प्राप्ति होती है।.... प्रेम में समर्पण होता है, मोह में प्रेम से मुक्ति की प्राप्ति होती है और मोह से सांसारिक बंधन की प्राप्ति होती है।

2769 days 16 hrs 12 mins ago By Diwakar Kushwaha
 

Prem Raah Dikhata hai Aur Moha Raah Se Bhatka Deta Hai,Dono Milte Julte Se hai Lakin Inke Karya Bilkul Alag hai. Mohe Ke Vashibhoot hokar Jeev Sansarik bandhano me bandh Jata hai,use Achai Aur burai ki Samagh nahi reh jati,use keval Abhist Ke Gun he Dikhai Dete hai. Prem Wah Divya Anubhuti hai jisme Vaasna ka Kinchit maatra bhi Ansh Nahi hota,Prem ke Dwara he bhakta bhagwan ko prapt kar leta hai. prem ka Example le to-HEER-Rangha,LAILA-MAJNU Inme Moh Nahi balki Prem Tha Isi liye Aaj bhi Inka Naam Jeevit hai,Prem Tyag Se Paripoorna hota hai jabki mohe Me Swarth ki bhavna nihit Hoti hai.

2769 days 17 hrs 1 mins ago By Dasi Radhika
 

मोह वही है जो तुम्हे पीड़ा देता है। प्रेम वही है जिसके बिना तुम रह नहीं सकते हो। अगर प्रेम मोह में परिवर्तित हो जाये, तो वही प्रेम जो तुम्हें आनंद दे रहा था, पीड़ा देने लगता है। मोह में कुछ बदले में पाने की भावना रहती है। अगर तुम प्रेम करो और बदले में कुछ न चाहो, तब वो प्रेम मोह में परिवर्तित नहीं होता।

2769 days 19 hrs 22 mins ago By Gulshan Piplani
 

जो आ सकता है वोह आ सकती है (आसक्ति, मोह)) और जो जा सकता है वोह प्रेम है(दिया, दे दिया बस वापस मिले न मिले) प्रेम को शब्दों में बांधना अतिश्योक्ति होगी वह संभव नहीं है यह वोह भाव है जिसे हम महसूस कर सकते हैं जिसे जब हम मांगते हैं तो यह भीख मांगने जैसा है और देतें हैं तो आनंद का सागर| प्रेम जिसका निवास स्थान ह्रदय है हृदय वोह स्थान है जहां प्रभु निवास करते हैं इस लिए कहते हैं किसी का दिल नहीं दुखाना चाहिए| दिल दुखाने का मतलब है की शरीर में विद्यमान प्रभु को कष्ट देना| मोह माया की बहन है| यह बंधन का एक रूप है|मोह मात्र बच्चों से ही नहीं होता मनुष्य को किसी भी वस्तु, क्रिया या कार्य, टोपिक, विषय, स्थान से मोह हो सकता है| प्रेम - प्रभु का दूसरा रूप| - राधे राधे

2769 days 20 hrs 25 mins ago By Vipin Sharma
 

PREM KARNE ME HAME DOOSRE KI JARURAT NAHI HOTI. OR JIS SE HUM MOH KARTE HAIN USKO DEKHNE KI ICHHA HAME HAR WAQT RAHTI H.

2769 days 23 hrs 32 mins ago By Vipin Sharma
 

KISI BHI NIRJEEV VASTU KE BAARE ME AAP YE NAHI KAHOGE KI MAIN IS SE PREM KARTA HOON. KYUNKI NIRJEEV VASTU SE MOH HOTA H, PREM NAHI PREM TO JEEVO SE HOTA H.

2769 days 23 hrs 34 mins ago By Vipin Sharma
 

PREM JEEVO SE KIYA JATA HAI OR MOH NIRJEEV VASTU SE.

2770 days 6 mins ago By Bhakti Rathore
 

मोह वही है जो तुम्हे पीड़ा देता है। प्रेम वही है जिसके बिना तुम रह नहीं सकते हो। अगर प्रेम मोह में परिवर्तित हो जाये, तो वही प्रेम जो तुम्हें आनंद दे रहा था, पीड़ा देने लगता है। मोह में कुछ बदले में पाने की भावना रहती है। अगर तुम प्रेम करो और बदले में कुछ न चाहो, तब वो प्रेम मोह में परिवर्तित नहीं होता।

2770 days 7 mins ago By Bhakti Rathore
 

अर्जुन ने युद्ध के मैदान में अपने विरोध में खड़े सभी सगे-संबंधियों को देखकर हथियार डाल दिए थे। उसके पीछे केवल मोह था, जो उसे युद्ध नहीं करने दे रहा था। असलियत में हमें संसार में बांधे रखने का कार्य मोह करता है, क्योंकि यह मन का एक विकार है। जब प्रेम गिने-चुने लोगों से होता है, हद में होता है , सीमित होता है, तब वह मोह कहलाता है। इसके संस्कार चित्त में इकट्ठा होते रहते हैं, जिससे इसकी जड़ें पक्की हो जाती हैं और कई बार चाह कर भी मोह को नहीं छोड़ पाते। हम मोह को ही प्रेम मान लेते हैं, जैसे युवक-युवती आपस में आसक्त होकर प्रेम करते हैं और उसको वे प्रेम कहते हैं, जबकि वह प्रेम नहीं, मोह है। मां-बाप जब केवल अपने बच्चे को प्रेम करते हैं, तो वह भी मोह ही कहलाता है। मोह का मतलब होता है आसक्ति, जो गिने चुने उन लोगों या चीजों से होती है, जिनको हम अपना बनाना चाहते हैं, जिनके पास हम अधिक से अधिक समय गुजारना चाहते हैं और जहां हमें सुख मिलने की उम्मीद हो या सुख मिलता हो। यहां मैं और मेरे की भावना बड़ी प्रबल रहती है। एक होता है लौकिक प्रेम, अर्थात सांसारिक प्रेम और दूसरा होता है अलौकिक प्रेम अर्थात इश्वरीय प्रेम। सांसारिक प्रेम मोह कहलाता है और इश्वरीय प्रेम, प्रेम कहलाता है। इसी मोह के कारण व्यक्ति कभी सुखी और कभी दुखी होता रहता हैं। मोह के कारण ही द्वेष पैदा होता है। यह मोह भी जन्म मरण का कारण है, क्योंकि इसके संस्कार बनते हैं, लेकिन इश्वरीय प्रेम के संस्कार नहीं बनते, बल्कि प्रेम तो चित्त में पड़े संस्कारों के नाश के लिए होता है। प्रेम का अर्थ है सबके लिए मन में एक जैसा भाव, जो सामने आए उसके लिए भी प्रेम, जिसका ख्याल भीतर आए उसके लिए भी प्रेम। परमात्मा की बनाई प्रत्येक वस्तु से एक जैसा प्रेम। जैसे सूर्य सबके लिए एक जैसा प्रकाश देता है, वह भेद नहीं करता, जैसे हवा भेद नहीं करती, नदी भेद नहीं करती, ऐसे ही हम भी भेद न करें। मेरा-तेरा छोड़कर सबके साथ सम भाव में आ जाएं। अतः अपने मोह को बढ़ाते जाओ, इतना बढ़ाओ कि सबके लिए एक जैसा भाव भीतर प्रकट होने लगे, फिर वह कब प्रेम में बदल जाएगा, पता ही नहीं चलेगा।

2770 days 2 hrs 23 mins ago By Vivek Kumar Nag
 

jahan aasakti hai wahan moh hai , prem mein aasakti ki koi jagah nahi hai prem mein to samarpan aur tyag ki bhavna hoti jo jiske karan samne wale ki khusi hume muskan deti hai.

 
Tags :
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