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अगर ईश्वर ही हमारा उद्गम स्थान, हम ईश्वर का ही अंश है, ईश्वर में मिल जाना हमारा गंतव्य है, तो फिर हम ईश्वर से दूर क्यों हो जाते हैं?

इस बारे में आपका क्या द्रष्टिकोण है?

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2627 days 7 hrs 15 mins ago By Pt Chandra Sagar
 

रजो गुण से उत्पन्न कामनायों के कारन तथा माया के अधीन होने पर ही जीव ईश्वर से दूर हो जाता है |

2634 days 4 hrs 43 mins ago By Ajay Nema
 

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1. option 1
2. option 2
3. option 3

2634 days 4 hrs 44 mins ago By Ajay Nema
 

Testing 

2644 days 18 hrs 50 mins ago By Aditya Bansal
 

कभी कभी तुम घर में बैठे-बैठे बोर हो जाते हो, और कहीं घूमने चले जाते हो। पर तुम वापस घर आ जाते हो। अगर तुम वापस न आओ तो मेरे जैसा कोई व्यक्ति तुम्हें वापस घर ले चलने के लिये आ जाता है।

2646 days 19 hrs 30 mins ago By Vipin Sharma
 

ISHWAR SE KOI DOOR NAHI HO SAKTA. HUM SAB USI PARMATMA KA ANSH HAIN TO BHALA FIR DOOR KAISE HO SAKTE HAIN HAM SABKE ANDAR VO HI H

2648 days 8 hrs 38 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... जिस प्रकार प्रतिबिम्ब का उदगम अपने बिम्ब से होता है, प्रतिबिम्ब अपने बिम्ब से कभी अलग नहीं होता है, उसी प्रकार परमात्मा बिम्ब है और जीवात्मा प्रतिबिम्ब है।.... कामनाओं के कारण जीवात्मा का ज्ञान, अज्ञान से आवृत होने के कारण मोहग्रस्त जीवात्मा स्वयं को परमात्मा भिन्न समझने लगती है।

2648 days 12 hrs 52 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

यह बिल्कुल सच है कि हमारा उद्गम ईश्वर से है, हम ईश्वर के अंश हैं, और हमारा अंतिम लक्ष्य भी उस ईश्वर में मिल जाना ही है | हम उससे दूर एक प्रक्रिया के तहत हैं उसकी लीला के तहत हैं | इसे हम एक उदहारण से समझ सकते हैं : जैसे समुद्र से भाप उड़कर बादल बनती है, फिर बादल बरसते हैं, इस धरती पर फिर वही जल नदी के रूप में प्रवाहित होता है और वही नदी फिर समुद्र में ही मिल जाती है | ये एक प्रक्रिया है जो निरंतर चलती रहती है रूकती नहीं है | ऐसे ही हमारा उद्गम भी ईश्वर है और हमें अंत में समाहित भी उसमे ही होना है | और भी सूक्षम रूप से देखें तो हम उससे दूर हैं भी नहीं क्योंकि ये पूरा ब्रह्माण्ड उसका विराट स्वरुप ही तो है और हम सब उस विराट स्वरुप का हिस्सा ही हैं जैसे समुद्र में उठती लहरे और बुलबले उसका हिस्सा ही होते हैं समुद्र में ही होते हैं उससे दूर नहीं होते | उसी तरह हम सब उस समष्टि में ही समाहित है देखने में ही हम अज्ञान वश अपने को दूर समझते हैं | जिनको दिव्य नज़र संतो द्वारा प्राप्त हो जाती है वो इस विराट स्वरुप को पहचान पाते हैं | राधे राधे

2648 days 16 hrs 54 mins ago By Gulshan Piplani
 

राधे राधे - भगवान् श्री कृष्ण ने गीता के अध्याय -७ के शलोक १४ में कहा है कि : ................................................मेरी त्रिगुणी माया में जन जीते और मर जाते हैं|चंद प्राणी सतत भजन कर माया से तर जाते हैं| -( गीता के शलोक का दोहानुवाद मेरी पुस्तक गीताजी-कविताजी से उद्धृत ) इससे एक बात तो प्रमाणित होती है कि परमेश्वर ही हमारा उद्गम स्थान तो है और गंतव्य भी है पर परमेश्वर ने मनुष्य को माया रुपी परीक्षा को पास करने के पश्चात् ही अपने में समाहित करने का प्रावधान किया है | यह बात जब तक जीव स्वम नहीं समझेगा या उसके पूर्वजन्मों के अभूतपूर्व कर्म एक साथ प्रकट नहीं होंगे तो वह माया में ही सुख-दुःख ढूँढेगा| और फिर इश्वर को भी तो सृष्टि चलानी है अगर दक्ष पुत्रों की तरह सब के सब ही इश्वर को प्राप्त हो जायेंगे तो सृष्टि सञ्चालन में बाधा प्रस्तुत हो जाएगी| भारत में हर बच्चा अध्यात्मिक ही है परन्तु वह अपने मन से अध्यात्मिक है अर्थात वह अपने गुणानुसार ही अध्यातम को स्वीकारता है| जब हम सिद्धांतों का त्याग कर अपने मन-घडत सिद्धांत बना कर अध्यात्म पर चलते हैं तो मात्र प्रयोग ही करते रह जाते हैं और जीवन व्यतीत हो जाता है| इसी कारण हम इश्वर से दूर हो जाते हैं| -राधे राधे

2648 days 18 hrs 3 mins ago By Dasi Radhika
 

हम ईश्वर से अज्ञानता के कारण दूर हो जाते हैं. कभी कभी हम घर में बैठे बैठे बोर हो जाते है, और कहीं घूमने चले जाते है । पर हमे वापस घर आना होता है. क्योकि हमे घर पर ही सुकून मिलता है, इसी तरह ईश्वर ही हमारा घर है, ईश्वर ही हमारा उद्गम स्थान है , हम ईश्वर का ही अंश है, ईश्वर में मिल जाना हमारा गंतव्य है, हम उसके बिना नहीं रह सकते, कुछ लोगो को ये जल्दी समझ आ जाता है और कुछ को समय लगता है, पर सभी को अपने घर में बापस आ कर ही सुकून मिलता है और वो उससे दूर नहीं रह सकता. ”राधे राधे”

 
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