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क्या भक्ति के संस्कार से मन के बाकी संस्कार और विकल्प हटते हैं?

इस बारे में आपका क्या द्रष्टिकोण है?

  Views :496  Rating :5.0  Voted :2  Clarifications :13
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2646 days 6 hrs 30 mins ago By Bhakti Rathore
 

ha bhakti ke sanskaar se man ke baaki sanskaar aur vilkaip hut jaate he

2650 days 17 hrs 17 mins ago By Diwakar Kushwaha
 

Haan Bhakti Me Wo Shakti hai Jisse Insaan he Nahi Bhaswan ko Bhi Prabhavit hona Padta hai.

2652 days 7 hrs 5 mins ago By Waste Sam
 

radhey radhey, mein yeh mante hoon ke bhakti se mann ke sanskar aur vikalp mitte hai... jab hum bhagwan ke aur badte hai toh bhagwan hume dheere shudh karta hai aur apne jaisa banta jata hai... arth- jab hum bhakti karte hai toh apne aap kridh, lobd aadi tamsik pravatiyaa badlane lagti hai aur sattavik hone lagti hai jaise lobd bahgwan bhajan ka hota hai, krodh khud par hota hai ke hum bhagwan ko abhi tak nahi paa sake aadi... jai shri radhey

2658 days 11 hrs 20 mins ago By Raghu Raj Soni
 

Bhakti ke sanskar se maan ke baki sanskar & vikalp sabhi usi perkar hut jate hein jase surya ke prakash se andhkar mit jata hai. Positive energy is generated within when we meditate which over powers all other negative energies within.

2659 days 11 hrs 44 mins ago By Avichal Mishra
 

Bhakti ka sanskar aata hi tab hai; jab Man se sabhi sanskar aur vikalp hatne lagte hain... Man se sabhi sanskar aur vikalp hatane ka ek matra sadhan hai stithiprgya ho jana; yani budi ko man se hata ke aatma ke haat sompana hi stithiprgya ho jana hai... Jai.. Jai... Shri Radhe...

2659 days 14 hrs 14 mins ago By Vipin Sharma
 

NAHI

2659 days 18 hrs 54 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... संस्कार का वास्तविक अर्थ संसारिक बंधन होता है। संस्कारो का मिट जाने पर ही जीवात्मा को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त होती है ..... गीता के अनुसार निष्काम भावना से जो कुछ भी किया जाता है वह भगवान की सच्ची भक्ति होती है।.... इसके अतिरिक्त किसी भी अन्य भावना से जो कुछ भी किया जाता है उन सभी से संस्कारों (सांसारिक बंधन) की ही उत्पत्ति होती है।...... जिसे संसार में भक्ति के नाम से जाना जाता है वह वास्तव में भक्ति रूपी कर्म होता है।.....वास्तविक भक्ति तो भगवान की कृपा से प्राप्त होती है।.... जब तक भक्ति रूपी कर्म निष्काम भावना से नहीं होता है तब तक भक्ति रूपी कर्म से संस्कारो का मिटना असंभव ही होता है।

2660 days 4 hrs 15 mins ago By Mohit Kumar
 

भक्ति और प्रेम का सुख सबसे ऊँचा मन गया है ...और सबसे सुगम और सरल मार्ग संसारी व्यक्ति के लिए तो भक्ति हि है कलयुग में इश्वर का सुख शीग्र पाने में ....अगर एक बार इश्वर का सीख ह्रदय में आ गया और अंदर चस्का लग गया ..फिर तो महाराज चाहे कहीं भी रहो , कैसे भी संस्कार हों ...देर सबेर इश्वर प्राप्ति के संस्कार जोर मर के आपको सही रास्ते पर /...भगवन के प्रेम के रस्ते पर ले जायेगा ...

2660 days 11 hrs 13 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

जब जीव के अन्दर भक्ति का उदय होता है तो साधक के अन्दर जो विषयों के संस्कार होते हैं वो दूर होते जाते हैं क्योंकि ये बात तो सर्वथा सिद्ध है की जब सुबह का उजाला होगा तो अँधेरे को जाना ही पड़ेगा | अँधेरा और उजाला एक साथ नहीं रह सकते | भक्ति उजाला है और विषय अँधेरा है | ज्यों ज्यों भक्ति का सूरज ह्रदय और बुद्धि को रोशन करता जाएगा विषयों का अँधेरा दूर होता जाएगा | राधे राधे

2660 days 12 hrs 38 mins ago By Gulshan Piplani
 

प्रशन का विकल्प जानने के लिए प्रशन को समझना अति आवश्यक है| दरअसल मनुष्य का हर कर्म संस्कार होता है| जैसे एक पिता ने अपने पुत्र के सामने फोन पर कहा कि मैं घर में नहीं हूँ, पर वोह घर में था तो उसने अपने पुत्र को जाने-अनजाने परिस्थिवश या आदतन यह संस्कार प्रदान कर दिया कि कभी-कभी झूठ बोलना पड़ता है| अर्थात झूठ बोलने का अधिकार प्रदान कर दिया| मनुष्य का हर कर्म जो लोग उसके आस पास होते हैं उनके लिए संस्कार होता है परन्तु यह उनके गुणों की प्रधानता पर निर्भर करता है कि वह उसको ग्रहण करें या नहीं| सामान्यत: हम कहते - सुनते हैं कि उसके बच्चे बहुत संस्कारी हैं| संस्कार हम एक ही तत्व से ग्रहण करते हैं और वोह तत्व है गुरु| गुरु इश्वर हो, मात-पिता हों, भाई-बहन हों,दोस्त हो, टी.वी हो या बीवी हो, इन्टरनेट हो या मोबाइल फ़ोन| दूसरी तरफ फूल हों, पहाड़ हों, पक्षी हों, पशु हों या जलचर कोई भी हो सकता है| अंत में जब मनुष्य स्वम अपना अध्यात्मिक गुरु साध कर भक्ति कि ओर अग्रसर होने लगता है तब भक्ति के संस्कारों द्वारा मन में पड़े संस्कार उचित विकल्प तलाशना शुरू कर देते हैं| यहाँ प्रशन यह है कि क्या भक्ति के संस्कार से मन के बाकी संस्कार और विकल्प हटते हैं? तो ध्यान देने वाली बात यह है कि संस्कार हम ग्रहण करते हैं, जो कि उस काल, देश और संग पर और हमारे गुणों कि प्रधानता पर निर्भर करता है और वोह संस्कार मन को माध्यम बना जब विचारों के रूप में प्रस्तुत होता है और उसे जब चित, अहंकार और बुद्धि की स्वीकृति प्राप्त हो जाती है तब वोह संकल्प बन जाता है और संकल्प को पूर्ण करने के लिए जब हम प्रयत्न रत होते हैं तब ही विकल्प तलाश पाते हैं| अर्थात जब हमने विकल्प तलाश लिए तो वोह ज्ञान का रूप धारण कर लेता है जिसे हम experience कहते हैं| संस्कार दो प्रकार के होते हैं १) भोतिक २)अध्यात्मिक तो हाँ ज्ञान के प्रकाश अर्थात भक्ति कि शक्ति से अध्यात्मिक संस्कारों में ग्यानुसार परिवर्तन आता रहता है और नित्य नूतन संकल्प और विकल्प बदलते हैं| गुलशन हरभगवान पिपलानी

2660 days 12 hrs 46 mins ago By Gulshan Piplani
 

प्रशन का विकल्प जानने के लिए प्रशन को समझना अति आवश्यक है| दरअसल मनुष्य का हर कर्म संस्कार होता है| जैसे एक पिता ने अपने पुत्र के सामने फोन पर कहा कि मैं घर में नहीं हूँ, पर वोह घर में था तो उसने अपने पुत्र को जाने-अनजाने परिस्थिवश या आदतन यह संस्कार प्रदान कर दिया कि कभी-कभी झूठ बोलना पड़ता है| अर्थात झूठ बोलने का अधिकार प्रदान कर दिया| मनुष्य का हर कर्म जो लोग उसके आस पास होते हैं उनके लिए संस्कार होता है परन्तु यह उनके गुणों की प्रधानता पर निर्भर करता है कि वह उसको ग्रहण करें या नहीं| सामान्यत: हम कहते - सुनते हैं कि उसके बच्चे बहुत संस्कारी हैं| संस्कार हम एक ही तत्व से ग्रहण करते हैं और वोह तत्व है गुरु| गुरु इश्वर हो, मात-पिता हों, भाई-बहन हों,दोस्त हो, टी.वी हो या बीवी हो, इन्टरनेट हो या मोबाइल फ़ोन| दूसरी तरफ फूल हों, पहाड़ हों, पक्षी हों, पशु हों या जलचर कोई भी हो सकता है| अंत में जब मनुष्य स्वम अपना अध्यात्मिक गुरु साध कर भक्ति कि ओर अग्रसर होने लगता है तब भक्ति के संस्कारों द्वारा मन में पड़े संस्कार उचित विकल्प तलाशना शुरू कर देते हैं| यहाँ प्रशन यह है कि क्या भक्ति के संस्कार से मन के बाकी संस्कार और विकल्प हटते हैं? तो ध्यान देने वाली बात यह है कि संस्कार हम ग्रहण करते हैं, जो कि उस काल, देश और संग पर और हमारे गुणों कि प्रधानता पर निर्भर करता है और वोह संस्कार मन को माध्यम बना जब विचारों के रूप में प्रस्तुत होता है और उसे जब चित, अहंकार और बुद्धि की स्वीकृति प्राप्त हो जाती है तब वोह संकल्प बन जाता है और संकल्प को पूर्ण करने के लिए जब हम प्रयत्न रत होते हैं तब ही विकल्प तलाश पाते हैं| अर्थात जब हमने विकल्प तलाश लिए तो वोह ज्ञान का रूप धारण कर लेता है जिसे हम experience कहते हैं| संस्कार दो प्रकार के होते हैं १) भोतिक २)अध्यात्मिक तो हाँ ज्ञान के प्रकाश अर्थात भक्ति कि शक्ति से अध्यात्मिक संस्कारों में ग्यानुसार परिवर्तन आता रहता है और नित्य नूतन संकल्प और विकल्प बदलते हैं| गुलशन हरभगवान पिपलानी

2660 days 12 hrs 48 mins ago By Gulshan Piplani
 

2660 days 13 hrs 41 mins ago By Aditya Bansal
 

भक्ति के संस्कार से बाकी संस्कार हटते हैं, विकल्प हटते हैं। भक्ति का संस्कार भी अपने आप विलीन हो जाएगा। जैसे आप पानी को शुद्ध करने के लिए फिटकारी डालते हैं तो वो पानी को शुद्ध करता है और खुद भी गल जाता है। उसी तरह से भक्ति का संस्कार भी है।

 
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