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संसार ये मानता है की संतोष से तरक्की की राह बंद हों जाती है और असंतोष तरक्की के लिए प्रोत्साहित करता है| क्या ये सही है?

इस बारे में आपका क्या द्रष्टिकोण है?

  Views :721  Rating :5.0  Voted :1  Clarifications :16
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2838 days 9 hrs 50 mins ago By Diwakar Kushwaha
 

"Santosham parmam Sukham" santosi vyakti he param sukhi hai aur asantoshi apni lalsa aur lalach ke karan sadaiv dukh ka he varan karta hai

2841 days 18 hrs 45 mins ago By Waste Sam
 

mere drishtikon se vicharniye yeh hai ke hum santosh aur asantosh jeevan ke kis pehlu mein kar rahe hai aur kiss bhav se. arth: bhagwad bhajan aur aaradhana mein yadi humne santosh kar liye toh humari tarraki ruk gayi aur yadi sansarik padarth mein yadi santosh kiya toh hum tarakki kar rahe hai. sansarik padarth mein santosh yadi hum isliye kar rahe hai kyonki hum har gaye hai toh hum tarakki nahi kar rahe. sansarik padartho mein santosh hume apni iccha karna chahiye naki majboori se tab yeh bhi tarakki hai.. jai shri radhey

2847 days 4 hrs 13 mins ago By Avichal Mishra
 

Baat sahi hai...; Lekin Asantosh ho kiska; Naswar ka; athwa jo hamesa saath rahe; Asantosh agar Naswar ka hoga; To uski prapti hone ke baad bhi Asantosh hi rah jayega; kyonki Naswar ki parniti Naswar main hi hogi. Aur agar Asantosh ho UnAswar(Iswar) ka; to uski parniti bhi UnAswar(Iswar) main hi hogi; Bhakti prapt hogi; At: jahan bhakti hogi Taraki bhi wahni hogi. Radhe... Radhe...

2850 days 2 hrs 46 mins ago By Vipin Sharma
 

SAHI H..!!

2850 days 5 hrs 19 mins ago By Gulshan Piplani
 

मनुष्य मन भावों का संसार है| संतुष्टि और असंतुष्टि दोनों भाव प्रभु प्रदान ही हैं| जो प्रभु ने मनुष्य को इस लोक अर्थात संसार का संतुलन बनाये रखने की लिए प्रदान किये| सोचें अगर सारा संसार असुन्तुष्ट हो जाये तो क्या होगा और अगर सारा संसार संतुष्ट हो जाये तो क्या होगा| अगर सम्पूर्ण संसार असुन्तुष्ट हो जाये तो क्या तरक्की होगी| कुछ लोग संतुष्ट होते हैं तो असुन्तुष्ट लोगों को आगे बढने का रास्ता मिलता है| वोही असुन्तुष्ट लोग एक जगह पर पहुँच कर संतुष्ट हो जाते हैं| सोचें जो व्यक्ति ताउम्र असुन्तुष्ट रहता है तो उसका क्या हाल होता है इस प्रकार माया कुछ संतुष्ट लोगों को असुन्तुष्ट कर और समय आने पर असुन्तुष्ट को संतुष्ट कर प्रभु के कार्य को संपन्न कराती है इस प्रकार सृष्टि का नियम और चक्र चलता रहता है, प्रभु प्रकृति को माध्यम बना सृष्टि का निर्माण करते रहते हैं, संहार करते रहते हैं| एक व्यक्ति की असुन्तुष्टि दुसरे व्यक्ति की संतुष्टि का कारण बनती है| आप ने एक प्लाट बेचना है| क्यों? क्योंकि कहीं न कहीं आप असुन्तुष्ट हैं उसे बेचने से आप को संतुष्टि मिलेगी वहीँ दूसरी जगह जो व्यक्ति उसे खरीदेगा उसे आप की असुन्तुष्टि संतुष्टि प्रदान करेगी| तो इसी प्रकार प्रकृति सरंक्षण का नियम चलता रहता है| गुलशन हरभगवान पिपलानी - ४.८.11

2850 days 5 hrs 21 mins ago By Gulshan Piplani
 

मनुष्य मन भावों का संसार है| संतुष्टि और असंतुष्टि दोनों भाव प्रभु प्रदान ही हैं| जो प्रभु ने मनुष्य को इस लोक अर्थात संसार का संतुलन बनाये रखने की लिए प्रदान किये| सोचें अगर सारा संसार असुन्तुष्ट हो जाये तो क्या होगा और अगर सारा संसार संतुष्ट हो जाये तो क्या होगा| अगर सम्पूर्ण संसार असुन्तुष्ट हो जाये तो क्या तरक्की होगी| कुछ लोग संतुष्ट होते हैं तो असुन्तुष्ट लोगों को आगे बढने का रास्ता मिलता है| वोही असुन्तुष्ट लोग एक जगह पर पहुँच कर संतुष्ट हो जाते हैं| सोचें जो व्यक्ति ताउम्र असुन्तुष्ट रहता है तो उसका क्या हाल होता है इस प्रकार माया कुछ संतुष्ट लोगों को असुन्तुष्ट कर और समय आने पर असुन्तुष्ट को संतुष्ट कर प्रभु के कार्य को संपन्न कराती है इस प्रकार सृष्टि का नियम और चक्र चलता रहता है, प्रभु प्रकृति को माध्यम बना सृष्टि का निर्माण करते रहते हैं, संहार करते रहते हैं| एक व्यक्ति की असुन्तुष्टि दुसरे व्यक्ति की संतुष्टि का कारण बनती है| आप ने एक प्लाट बेचना है| क्यों? क्योंकि कहीं न कहीं आप असुन्तुष्ट हैं उसे बेचने से आप को संतुष्टि मिलेगी वहीँ दूसरी जगह जो व्यक्ति उसे खरीदेगा उसे आप की असुन्तुष्टि संतुष्टि प्रदान करेगी| तो इसी प्रकार प्रकृति सरंक्षण का नियम चलता रहता है| गुलशन हरभगवान पिपलानी - ४.८.11

2850 days 5 hrs 26 mins ago By Gulshan Piplani
 

मनुष्य मन भावों का संसार है| संतुष्टि और असंतुष्टि दोनों भाव प्रभु प्रदान ही हैं| जो प्रभु ने मनुष्य को इस लोक अर्थात संसार का संतुलन बनाये रखने की लिए प्रदान किये| सोचें अगर सारा संसार असुन्तुष्ट हो जाये तो क्या होगा और अगर सारा संसार संतुष्ट हो जाये तो क्या होगा| अगर सम्पूर्ण संसार असुन्तुष्ट हो जाये तो क्या तरक्की होगी| कुछ लोग संतुष्ट होते हैं तो असुन्तुष्ट लोगों को आगे बढने का रास्ता मिलता है| वोही असुन्तुष्ट लोग एक जगह पर पहुँच कर संतुष्ट हो जाते हैं| सोचें जो व्यक्ति ताउम्र असुन्तुष्ट रहता है तो उसका क्या हाल होता है इस प्रकार माया कुछ संतुष्ट लोगों को असुन्तुष्ट कर और समय आने पर असुन्तुष्ट को संतुष्ट कर प्रभु के कार्य को संपन्न कराती है इस प्रकार सृष्टि का नियम और चक्र चलता रहता है, प्रभु प्रकृति को माध्यम बना सृष्टि का निर्माण करते रहते हैं, संहार करते रहते हैं| एक व्यक्ति की असुन्तुष्टि दुसरे व्यक्ति की संतुष्टि का कारण बनती है| आप ने एक प्लाट बेचना है| क्यों? क्योंकि कहीं न कहीं आप असुन्तुष्ट हैं उसे बेचने से आप को संतुष्टि मिलेगी वहीँ दूसरी जगह जो व्यक्ति उसे खरीदेगा उसे आप की असुन्तुष्टि संतुष्टि प्रदान करेगी| तो इसी प्रकार प्रकृति सरंक्षण का नियम चलता रहता है| गुलशन हरभगवान पिपलानी - ४.८.11

2850 days 5 hrs 30 mins ago By Gulshan Piplani
 

मनुष्य मन भावों का संसार है| संतुष्टि और असंतुष्टि दोनों भाव प्रभु प्रदान ही हैं| जो प्रभु ने मनुष्य को इस लोक अर्थात संसार का संतुलन बनाये रखने की लिए प्रदान किये| सोचें अगर सारा संसार असुन्तुष्ट हो जाये तो क्या होगा और अगर सारा संसार संतुष्ट हो जाये तो क्या होगा| अगर सम्पूर्ण संसार असुन्तुष्ट हो जाये तो क्या तरक्की होगी| कुछ लोग संतुष्ट होते हैं तो असुन्तुष्ट लोगों को आगे बढने का रास्ता मिलता है| वोही असुन्तुष्ट लोग एक जगह पर पहुँच कर संतुष्ट हो जाते हैं| सोचें जो व्यक्ति ताउम्र असुन्तुष्ट रहता है तो उसका क्या हाल होता है इस प्रकार माया कुछ संतुष्ट लोगों को असुन्तुष्ट कर और समय आने पर असुन्तुष्ट को संतुष्ट कर प्रभु के कार्य को संपन्न कराती है इस प्रकार सृष्टि का नियम और चक्र चलता रहता है, प्रभु प्रकृति को माध्यम बना सृष्टि का निर्माण करते रहते हैं, संहार करते रहते हैं| एक व्यक्ति की असुन्तुष्टि दुसरे व्यक्ति की संतुष्टि का कारण बनती है| आप ने एक प्लाट बेचना है| क्यों? क्योंकि कहीं न कहीं आप असुन्तुष्ट हैं उसे बेचने से आप को संतुष्टि मिलेगी वहीँ दूसरी जगह जो व्यक्ति उसे खरीदेगा उसे आप की असुन्तुष्टि संतुष्टि प्रदान करेगी| तो इसी प्रकार प्रकृति सरंक्षण का नियम चलता रहता है| गुलशन हरभगवान पिपलानी - ४.८.11

2850 days 5 hrs 32 mins ago By Gulshan Piplani
 

मनुष्य मन भावों का संसार है| संतुष्टि और असंतुष्टि दोनों भाव प्रभु प्रदान ही हैं| जो प्रभु ने मनुष्य को इस लोक अर्थात संसार का संतुलन बनाये रखने की लिए प्रदान किये| सोचें अगर सारा संसार असुन्तुष्ट हो जाये तो क्या होगा और अगर सारा संसार संतुष्ट हो जाये तो क्या होगा| अगर सम्पूर्ण संसार असुन्तुष्ट हो जाये तो क्या तरक्की होगी| कुछ लोग संतुष्ट होते हैं तो असुन्तुष्ट लोगों को आगे बढने का रास्ता मिलता है| वोही असुन्तुष्ट लोग एक जगह पर पहुँच कर संतुष्ट हो जाते हैं| सोचें जो व्यक्ति ताउम्र असुन्तुष्ट रहता है तो उसका क्या हाल होता है इस प्रकार माया कुछ संतुष्ट लोगों को असुन्तुष्ट कर और समय आने पर असुन्तुष्ट को संतुष्ट कर प्रभु के कार्य को संपन्न कराती है इस प्रकार सृष्टि का नियम और चक्र चलता रहता है, प्रभु प्रकृति को माध्यम बना सृष्टि का निर्माण करते रहते हैं, संहार करते रहते हैं| एक व्यक्ति की असुन्तुष्टि दुसरे व्यक्ति की संतुष्टि का कारण बनती है| आप ने एक प्लाट बेचना है| क्यों? क्योंकि कहीं न कहीं आप असुन्तुष्ट हैं उसे बेचने से आप को संतुष्टि मिलेगी वहीँ दूसरी जगह जो व्यक्ति उसे खरीदेगा उसे आप की असुन्तुष्टि संतुष्टि प्रदान करेगी| तो इसी प्रकार प्रकृति सरंक्षण का नियम चलता रहता है| गुलशन हरभगवान पिपलानी - ४.८.11

2850 days 5 hrs 32 mins ago By Gulshan Piplani
 

2850 days 5 hrs 38 mins ago By Gulshan Piplani
 

2850 days 23 hrs 38 mins ago By Monika Gupta
 

tarraqi ke liye jiggyasa chahiye asantosh nahi

2851 days 16 mins ago By Aditya Bansal
 

AGAR AAP NISPAAP HOKAR TARKI KAR RAHE HAI TO KARNI CHAIYE....AGAR USSME PAAP KE BHAAGI DAAR BAN RAHE TO AISI TARAKI KA KIA PHAYADA.....SANTOSH KARKE TARAKI KE RAASTE BAND HE KAR LENE CHAHIYE

2854 days 2 hrs 12 mins ago By Bhakti Rathore
 

jai shree radhe radhe ha asntosh juri he thrakki ke ley

2854 days 19 hrs 47 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

फल में संतोष करो कर्म में असंतोष बना रहे ये रहे कि और करना है चाहे लौकिक हो या पारलौकिक दोनों में लक्ष्य को पाने के लिए कर्म में असंतोष जरूरी है | राधे राधे

2854 days 20 hrs 52 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... जी हाँ, भौतिक तरक्की चाहने वाले को कभी संतोषी नहीं होना चाहिये और आध्यात्मिक तरक्की चाहने वाले को कभी असंतोषी नहीं होना चाहिये।

 
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