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संतोष और असंतोष अध्यात्म की नज़र में क्या हैं ?

संसार ये मानता है की संतोष से तरक्की की राह बंद हों जाती है और असंतोष तरक्की के लिए प्रोत्साहित करता है | क्या ये सही है ?

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2654 days 2 hrs 1 mins ago By Waste Sam
 

Radhey radhey ... As per my understanding satisfaction in spiritual terms is to accept everything in our life with happiness and thank for all these things to god everything. Dissatisfaction is to have greed always in any aspect of life. jai shri radhey..

2654 days 11 hrs 19 mins ago By Vipin Sharma
 

aisa nahi h santosh se tarakki ki raaah band nahi hoti

2654 days 11 hrs 19 mins ago By Vipin Sharma
 

jisme adhyatm aa jata hai vo santoshi ho hi jata h ?

2663 days 7 hrs 29 mins ago By Aditya Bansal
 

JAB HUM SANTOSH MEIN RAHNGE TO PRABHU KI AUR DHAYN LAGA PAYNGE LEKIN JAB SANTOSH NAHI HOGA TO MOH NAYA MEIN PHASE REH KAR JIVAN BARBAAD KARNEGE

2668 days 15 hrs 6 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... संतोष और असंतोष मन की भावदशा होती हैं।.... असंतोष जीवात्मा को संसार की धकेलता है और संतोष जीवात्मा को परमात्मा की ओर उन्मुख करता है।

2672 days 2 hrs 46 mins ago By Gulshan Piplani
 

संसार का तात्पर्य लोकिकता और अध्यात्म का तात्पर्य अलोकिकता है| अगर संसार के ढंग से समझेंगे तो प्रशन का उत्तर भी प्रशन ही है परन्तु अलोकिकता के विचार से उत्तर बिलकुल अलग है| दरअसल मनुष्य को असंतोष तब होता है जब जो कार्य संपन्न हुआ वह उसके परिणामों से संतुष्ट नहीं होता| तो जब आप अपने सारे कार्य प्रभु को समर्पित कर के करते हैं तो मतलब निकला की प्रभु संतुष्ट नहीं हुए अर्थात जिस कार्य को प्रभु आपको माध्यम बना कर करवा रहे हैं उस कार्य से प्रभु संतुष्ट नहीं हुए तभी आपके मन में विचार भेजा कि इससे भी बेहतर ढंग से ये कार्य संपन्न हो सकता है| उस स्थिति में आप असंतुष्ट नहीं होगे बल्कि ऐसा विचार करेंगे कि मुझे अपनी क़ाबलियत अर्थात ज्ञान जो प्रभु ने मुझ पर महेरबानी कर के प्रदान किया है उसका सही उपयोग मैं नहीं कर पाया और आप पुन: प्रभु को समर्पित हो कर उस कार्य को सही रूप प्रदान करने कि चेष्टा करेंगे और फल फिर प्रभु को समर्पित कर देंगे| कार्य वोही संपन्न होगा परन्तु किसी कारण से फल आपके मन के अनुसार नहीं भी आया तो असंतोष नहीं होगा दुःख नहीं आयेगा| गुलशन हरभगवान पिपलानी

2672 days 3 hrs 51 mins ago By Balvinder Aggarwal
 

पितृ पक्ष की महत्ता प्रिय वर इस वर्ष यह पुण्य पर्व १३ सितम्बर से २७ सितम्बर तक है प्रत्येक मनुष्य को अपने दिवंगत पितरों की देहावसान की पुण्य तिथि पर उनकी परम तृप्ति एवं प्रसन्नता के लिए जल तर्पण एवं श्राद्ध अवश्य करना चाहिए इस दिन घर पर शुधि एवं श्रधा के साथ सामर्थ्य अनुसार सात्विक राजस् भोजन बना कर योग्य ब्राह्मण को बुला कर उनका विधिवत पूजन करें उनके सान्निध्य में अपने पितरों के निमित्त तर्पण करें ,२ आहुतियाँ अग्नि में [ओम सोमाये पित्री मते स्वधा नमः एवं ओम आग्नेय काव्य वाहनाये स्वधा नमः] खीर या घी से दिव्या पितरों को प्रदान करें तत्पश्चात ब्राह्मण देव में श्रधा से पितरों का भाव बना कर प्रेम से भोजन खिलाएं बीच में बिना पूछे खाद्य सामग्री प्रदान करें नमक के बारे न पूछें मना करने पर जबरदस्ती न करें झुट्ठे हाथों में ही दक्षिणा,फल,इत्यादि भेंट करें समस्त परिवार साष्टांग प्रणाम कर आशीर्वाद प्राप्त करें हमारी वैदिक संस्कृति के अनुसार हर जाती,वर्ण के मनुष्य को हर परिस्थिति में यह अवश्य करणीय कर्त्तव्य करम है नियत तिथि के इलावा भी पुरे श्राद्ध पक्ष में सूक्ष्म सामग्री के द्वारा तर्पण श्राद्ध करना चाहिए इसमें आप दूध चावल चीनी या फल ,मिठाई या सम्पूर्ण भोजन कुछ भी दे सकते हैं योग्य ब्राह्मण के आभाव में गाय को खाना या फल खिलाएं एक लोटा पानी पीपल में दान करें शहरों के व्यस्त जीवन में कुछ लोग खाना बना कर या होटल से मगवा कर ब्राह्मण के घर दे आते हैं जो शास्त्र एवं लोकाचार के अंतर्गत गलत है श्री देवी पुराण के ७३ वें अध्याय के २५,२६ वें श्लोकानुसार जिसके पित्र संतुष्ट रहतें हैं उसी का जीवन सार्थक है वर्ना निरर्थक है[२५]पितरों के रुष्ट रहने पर मनुष्यों को धरम की प्राप्ति नहीं होती ,अतः पितरों को भली भाँती तृप्त करके ही धार्मिक कृत्य करना चाहिए [२६] इसी लिए वेद मार्ग में श्राद्ध के ९६ अवसर बताएं हैं वर्ष की १२ अमवास्य,४ पुण्य तिथियाँ,१४ म्न्वादी तिथियाँ,१२ सक्रन्तियाँ,१२ वैधृति योग,१२ ब्यातिपात योग,१५ पित्री पक्ष,५ अष्टका श्राद्ध,५ अन्वष्टका श्राद्ध,५ पूर्वेद्यु श्राद्ध कुल ९६ हुए इसके इलावा श्री गीता जी ३ रे अध्याय में नित्य नेमित्तिक तर्पण श्राद्ध बलि विश्व देव सहित अवश्य करणीय कर्तव्य की आज्ञा देती है मेरी अल्प बुद्धि में जो आया लिख दिया कुछ गलत हो क्षमा करना ठीक लगे तो अवश्य करना हरी ओम तत्सत ......... अधिक जानकारी के लिए www.prashaktivedicastrology.org पर संपर्क करें बलविंदर अगरवाल[वैदिक ऋषि] पराशक्ति कृपा केंद्र चंडीगढ़

2672 days 3 hrs 51 mins ago By Balvinder Aggarwal
 

नहीं ये सत्य नहीं है क्यूंकि संतोष के बाद मनुष्य बुद्धि से ऊपर उठ कर विवेक से काम लेने लगता है और वास्तविक यानि खत्म न होने वाली तरक्की को प्राप्त करता है

2672 days 12 hrs 5 mins ago By Bhakti Rathore
 

santosh humre ley jeevan me jaururi he nahi to bina santosh ke hum path se bhatk sakte he. aurapneeastkebhajan me hume kabhi bhi santust nahi hona cheiye kyunki yadi wo raah per ruk gyeto jeevan wahi ruk jaygaisley is margper humsha heasntust rathna cheiye hume humsha aurchaal kerni cheiye ki humhe jaha se jo bhi parpt ho use hume lena cheiye humhra ayrki cahh honi cheiye.radhe radhe

2672 days 12 hrs 22 mins ago By Bhakti Rathore
 

jai shree radhe radhe go dhan gaj dhan baaj dhan aur ratan dhan saaj jub aave santosh dhan sub dhan he bakaar.jub tak humhe man me asntosh rahga tub tak humra man bhjan pujan aur dhyan me nahi lagega jis pal hume santosh aa gya us din humhra dhyan kahi nahi bhtkega.anstosh humeman se pery nahi kerne deta he. sansaarye manta hrki santosh se thrakki ki raah band ho jaati he aur asantosh thrakki ke ley prothsahit ha ye sahi he.hume bhjan aurpujanke mamle me kabhi bhi santust nahi hona cheiye nahi to hum apne dehey se bhatk jayge. jai shree radhe radhe

2672 days 13 hrs 25 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

अध्यात्म में संतो के कथन में संतोष का बड़ा महत्व है कहा जाता है जिसमे संतोष है उससे बड़ा धनवान इस संसार में नहीं है | परन्तु संसार में लोग कहते हैं संतोष तो तरक्की की सीढ़ी में बाधक है जब तक असंतोष नहीं होगा इंसान आगे बढ़ने की सोच ही नहीं सकता | देखने में कथन सत्य भी लगता है | पर क्या संतो का कथन गलत हो सकता है | संतो के कहने का अर्थ कुछ और हो सकता है पर उनका कथन गलत नहीं हो सकता | संत अगर संतोष करते तो बस जितना भजन कर लिया उसी पर संतोष कर बैठते फिर वो उन लक्ष्यों को कैसे पाते जो उन्होंने पाए और संसार का कल्याण किया | संतों के कहने का तात्पर्य ये हो सकता है कि असंतोष करो कर्म में और संतोष करो फल में | जबकि हम इसका उल्टा करते हैं कहते है कर्म तो बहुत किया पर फल कुछ नहीं मिला यानी कर्म में तो संतोष कर लेते हैं और उसके फल में असंतोष जताते हैं | संतो ने इसी असंतोष को संतोष में बदलने का उपदेश किया है | फल में सहर्ष स्वीकृति से मन शांत रहता है और कर्म अगर शांत मन से किया जाए तो उसके सफल रहने की उमीदें ज्यादा होती है | गीता में भी भगवान् ने कर्म के महत्व को बताया है कि कर्म पर ही जीव का अधिकार है उसके फल पर नहीं | इसलिए जिस पर उसका अधिकार ही नहीं है उसमे संतोष करना ही श्रेष्टता है और जिसमे अपना अधिकार है उसे करने में संतोष ना हो बल्कि अभी कुछ भी नहीं किया ऐसा भाव रहना चाहिए | तभी तरक्की का मार्ग प्रशस्त रहेगा और जीव अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगा | अगर फल कि जगह कर्म में संतोष कर लिया तो तरक्की के सारे मार्ग बंद हो जायेंगे | राधे राधे

2672 days 13 hrs 47 mins ago By Gulshan Piplani
 

संसार का तात्पर्य लोकिकता और अध्यात्म का तात्पर्य अलोकिकता है| अगर संसार के ढंग से समझेंगे तो प्रशन का उत्तर भी प्रशन ही है परन्तु अलोकिकता के विचार से उत्तर बिलकुल अलग है| दरअसल मनुष्य को असंतोष तब होता है जब जो कार्य संपन्न हुआ वह उसके परिणामों से संतुष्ट नहीं होता| तो जब आप अपने सारे कार्य प्रभु को समर्पित कर के करते हैं तो मतलब निकला की प्रभु संतुष्ट नहीं हुए अर्थात जिस कार्य को प्रभु आपको माध्यम बना कर करवा रहे हैं उस कार्य से प्रभु संतुष्ट नहीं हुए तभी आपके मन में विचार भेजा कि इससे भी बेहतर ढंग से ये कार्य संपन्न हो सकता है| उस स्थिति में आप असंतुष्ट नहीं होगे बल्कि ऐसा विचार करेंगे कि मुझे अपनी क़ाबलियत अर्थात ज्ञान जो प्रभु ने मुझ पर महेरबानी कर के प्रदान किया है उसका सही उपयोग मैं नहीं कर पाया और आप पुन: प्रभु को समर्पित हो कर उस कार्य को सही रूप प्रदान करने कि चेष्टा करेंगे और फल फिर प्रभु को समर्पित कर देंगे| कार्य वोही संपन्न होगा परन्तु किसी कारण से फल आपके मन के अनुसार नहीं भी आया तो असंतोष नहीं होगा दुःख नहीं आयेगा| गुलशन हरभगवान पिपलानी

 
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