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राधा कृष्ण के प्रेम को ही क्यों दिव्य माना जाता है ?

इस बारे में आपका क्या द्रष्टिकोण है ?

  Views :501  Rating :5.0  Voted :2  Clarifications :8
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2652 days 10 hrs 56 mins ago By Waste Sam
 

radhey radhey...radha krishna nee hee prem ke sahi paribhasha hume samjhai hai (isse pehle ram-bharat prem bhi tha, pehle bhi bhagwan ne kai baar isse samjhaya)... radha-krishna ek hee hai, yeh alag nahi hai parantu manav ko samjane ke liye ke saccha, niswarth, niskaam prem kya hai bhagwan ne yeh do roop banaye... inke prem divya hai kyonki yeh dekhata hai kaise radha krishna ke sukh ke liye lalaiyet rehte hai aur ktishna radha ke sukh ke liye... inhone kabhi apni iccha yaa apna sukh ek doosara ke marg ka kantak nahi banane diye... radha krishna ka prem kitna divya hai iss katha se anumaan lagana- jab maa rukmani ke haath se diya garam dhoodh maa radha nee pee liya toh bhagwan krishna ke pair mein chhale ho gaye kyonki radha rani ke mann mein krishna ka niwaas hai... aankhen band karke iss prasang koo dekhne se unke prem ke divyata ke anubhooti sahaj hee ho jati hai.. jai shri radhey

2661 days 18 hrs 18 mins ago By Aditya Bansal
 

कहते हैं राधा ब्याहता थीं ... फिर कृष्ण प्रेम , कृष्ण से पूर्व उनका नाम कसौटी पर खरा है ?मीरा ने भी माँ के द्वारा कृष्ण को पति माना पर विवाह किसी और से हुआ ... पर वे कृष्ण दीवानी रहीं ...

2662 days 13 hrs 50 mins ago By Vipin Sharma
 

KYONKI ITIHAAS ME US SE PAHLE KOI LOVE STORY NAHI THI. ISLIYE SABKA DHYAAN US OR H. OR BADE LOG JO BHI KARTE H VO HAMESHA SE SABSE ACHHA MANA JATA H. NAHI TO LOVE STORY TO US SE BHI ACHHI BAHUT HUI H, BUT VO SAB LOG BADE NAHI THE, AISE HI NORMAL LOG THE . (BADE KARE SO LEELA, CHHOTE KARE SO PAAP)

2673 days 12 hrs 36 mins ago By Gulshan Piplani
 

राधे राधे - जब कोई प्रेम मैं कुछ पाने की इच्छा का परित्याग कर देता है उसका प्रेम दिव्य प्रेम हो जाता है राधा और कृष्ण का प्रेम इसका ज्वलंत उपहार है - गुलशन हरभगवान पिपलानी

2675 days 21 hrs 52 mins ago By Prahlad Sharma
 

जय श्री राध्ये ..... राधा एक नाम नहीं प्रमाण है ? प्रेम की विभूति है ? राधा क्रिशन का प्रेम -प्रेम नहीं था बल्कि एक दिव्या अलोकिक दर्शन है जो कोई भी एस दर्शन को छु नहीं सकता ?जिसकी जितनी भी तारीफ करे वो कम है ?राधाकिशन.राध्येश्यम.राध्ये.जिनके हजारों नाम है ?

2676 days 10 hrs 4 mins ago By Bhakti Rathore
 

jai shree radhe radhe kyunki wo do shaeer ek amtma he.Jun dono ek hoge to prem to diva hoga he na dono ka prem ek he he. Radha yani ko humhre jeevan ko nei raah de deaur ikirshna yaahi ki jo humhre avguno ko her lehumhare man se isly in dono ka jo ka prem he wo ek he he aur divya he kyuki wo dono ek he he.Jai shree radhe radhe.

2676 days 13 hrs 26 mins ago By Rajender Kumar Mehra
 

अध्यात्म में या विश्व में जब भी प्रेम की चर्चा होगी तब हमेशा उसमे राधा कृष्ण या गोपिओं और कृष्ण का प्रेम ही सर्वप्रथम नज़र आएगा और केवल ये ही प्रेम का उदाहरण ऐसा है जिसे पूर्ण दिव्यता से देखा और महसूस किया जाता है | जबकि प्रेम की परिभाषा में तो और भी हैं जैसे शंकर जी और पार्वती जी, सीता जी और राम जी, लक्ष्मण और उर्मिला जी और सांसारिक रूप से भी देखें तो हीर राँझा आदि कई ऐसे उदहारण हैं जिनका प्रेम भी एक पवित्र प्रेम का उदाहरण है और उन्होंने अपने प्रेम को पाने के लिए कितने तप जप नियम किये हैं बहुत कष्ट भी सहे हैं और वो एक दूसरे के प्रति पूरी तरह समर्पित भी रहे हैं लेकिन जब भी विशुद्ध प्रेम की बात होगी तब प्रथम ध्यान गोपी या राधा जी और कृष्ण जी के प्रेम का ही ध्यान आएगा | ऐसी कोई तो विशेषता इनके प्रेम में होगी जो और सबके प्रेम से इसको अलग करती होगी | मेरे मन में जब ऐसा ख्याल आया तो मैंने मनन करने की कोशिश की और ये पाया कि सबने प्रेम में पाने की कोशिश की उसके लिए जप भी किये तप भी किये प्रार्थना भी की पर एक भी उदाहरण ऐसा नहीं है जहाँ प्रेम विरह में पला हो और उस विरह का कोई अंत नहीं हो लेकिन कभी मन में उस विरह के लिए विषाद नहीं आया हो | विरह प्रेम को परवान चढाने की सीडी बन गया हो | ठाकुरजी स्वयं कहते हैं मैं गोपिओं का ऋणी हूँ मेरी झोली में विरह से अच्छा तोहफा इन गोपिओं के लिए और कोई नहीं है | यही एक उदहारण है राधा कृष्ण या गोपी कृष्ण का कि जहाँ मिलन में कोई बाधा नहीं थी फिर भी दोनों ने विरह को ही अपनाया | अगर हम ध्यान से जानने की कोशिश करेंगे तो पायेंगे विरह में ही नित्य मिलन है | जब मिलन होता है तो सिर्फ प्रेमास्पद आँखों के सामने होते हैं पर विरह में तो हर तरफ सिर्फ प्रेमास्पद के सिवा कुछ होता ही नहीं इसलिए प्रेमी उस विरह में अपने प्रेमास्पद से नित्य मिलन करता है और ये नित्य मिलन ही इस प्रेम को दिव्यता प्रदान करता है जो सिर्फ विरह में ही संभव है | आज भी ब्रिज के कण कण में इस नित्य मिलन की दिव्यता छुपी है जिसे वहाँ रहने वाले संत वैष्णव अपने ह्रदय के दिव्य चक्षुओं से नित्य निहारते हैं और अपने को जन्म को सफल करते हैं | राधे राधे

2676 days 20 hrs 30 mins ago By Ravi Kant Sharma
 

जय श्री कृष्णा.... जो चर्म चक्षुओं से दिखलाई नहीं देता है और जिसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता है केवल अनुभव ही किया जा सकता है उसे दिव्य कहते हैं।..... इसलिये प्रेम सदैव दिव्य ही होता है जब जीवात्मा प्रेम की पराकाष्ठा राधा भाव में स्थित हो जाता है तब जीवात्मा और परमात्मा एक रूप एक प्राण दो देही दिव्य स्वरूप हो जाते है, जीवात्मा और परमात्मा दोनो का ही स्वरूप दिव्य होता है, इसलिये इनका प्रेम भी दिव्य होता है।

 
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