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गुलाम

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आज का सत्संग शुरू करने से पहले आईये हम कुछ पलों के लिए भगवान नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये.

“राधे-राधे गोविंदा, श्री राधे-राधे गोविंदा, गोविंदा-गोविंदा-गोविंदा,श्री राधे-राधे गोविंदा”....

श्री राधारानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि कोटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है “गुलाम” तो कौन है गुलाम ? जब व्यक्ति पूरे तरीके से किसी के अधीन हो जाए, सारी चीजें उसी के तरीके से करे. उसी अधीनता का नाम गुलामी है । हम किसी के अधीन है वो जैसा चाहेगा हम वैसा ही करेगें. तो हम उसके गुलाम बन गए है । वो खिदमत करना ही गुलामी ।

गुंलाम में और नौकर में अंतर होता है । गुलाम को खरीदा जाता है । मालिक की जो मर्जी होगी वो उसे करना होगा. औेर नौकर जो होता है्. उसे पैसे मिलते है काम करने के् लिए. गुलाम और नौकर एक नहीं है । गुलाम अधीन है मालिक जो कहेगा वो उसे करना होगा ।

कहने का मतलब कि आज की दुनिया में गुलामी बहुत कम है । हम कहते है कि पहले हम गुलाम थे अग्रेजो के, वो जो चाहते थे हमसे करवाते थे । अब हम स्वतंत्र हो गए दासता खत्म हो गई पर उससे भी बडे हम आज भी दास  है । पर हम किसके गुलाम है हम गुलाम है अपने मन के, अपनी आदतों के, इन्द्रियों के, वास्तव में हम यहीं कर रहे है । जब हमारे मन में गलत विचार आते है तो हम उसे देखतें नही, हम सबका निरीक्षण करते है बस खुद का ही नहीं कर पाते. हमारे मन में क्या है जब कभी विषयों विचारों की आँधी चलती है तो हम विचार नहीं करते कि ये आधी अपने पीछे बहुत कचरा छोड के गई । और वो कचरा है हमारे बुरे विचार उनको हम साफ नहीं करते है । ये वैसे ही है जब हमारे घर में कचरा जमा हो जाता है और हम उसको साफ ना करे तो पूरे घर में गंदगी हो जाएगी और हम बीमार हो जाएगें ऐसे ही हमारा मन है । इस मन में जब कचरा जमा हो जाता है पर हम उसको देखते ही नहीं कि बुरे विचार जो है उन्हें मन से नहीं हटाते और वो धीरे धीरे आदत बन जाते है क्योकि वो मन में स्टोर है ।

मन उनका संग्रह है बार बार वो आते जाते है तो वो विचार से आदत बनेंगे फिर वो आगे चलकर हमारा चरित्र बनेगी फिर हमारा संस्कार बन जाती है । और फिर व्यक्ति जब विचार आया था तभी साफ कर देता तो ठीक है पर आदत बनने के बाद उसे हठाना मुष्किल है वो तो आजाद हो गया तो हमें पहले ही उसको हठाना है पर संस्कार बनने के बाद उसे नहीं हठा सकते है ।

जैसे कोई बच्चा है वो गलत काम करता है पर उसके मा बाप ने उसे छोटे में नहीं रोका समझाया नहीं जब वो कच्ची मिटटी के घडे की तरह था तो वो जब बडा होगा तो वो ही परेषानी का कारण बन जाता है मा बाप की. फिर वो कभी नहीं सुधरेगा मन भी नहीं सुधेरगा वो इन्द्रयों के गुलाम हो जाएगा. जैसे कच्ची मिट्टी का घड़ा यदि पक गया फिर नहीं सुधरेगा . जब हम जीते चले जाते है ,जब हम जी रहे है बस तो हम मन और शरीर के गुलाम होते है और जब हम सोच कर जीते है । तो हम शरीर और मन के सारथी होते है । हम जहाँ चाहेंगे वहाँ मन और शरीर जाएगा और तीसरा कहा कि जब हम इनसे हट कर जीते  है तो  दृष्टा बनकर जीते है । ये ऐसे है.

प्रसंग १- जैसे कि एक संत थे तो एक व्यक्ति उनके पास गया और बोला कि क्या कभी संत लोग बीमार नहीं होते मैने कभी नहीं देखा और अगर होते है तो कैसे इतना सह जाते है । उनकी सहनषक्तिी ज्यादा होती है । तो सतं कहते है - कि आम व्यक्ति और संत दोनों संसार में है पर हम में एक फर्क है वो है कि संत के अंदर संसार नही होता है पर व्यक्ति के अंदर बाहर दोंनो ओर संसार है जब संत बीमार होता है तो वो अपने शरीर को देखता है और कहता है कि ये शरीर बीमार है, मै नहीं हूँ.  वो तो उस शरीर को देखता रहता है । तो हम न शरीर है और न मन

 

प्रसंग २. - एक बार का प्रसंग है हजरत इब्राहिम के समय का, जब गुलाम खरीदे जाते थे तो बाजार लगते था. गरीबों का और उनको खरीदने के लिए अमीर लोग खडे थे । अब इबा्हिम बाजार से निकले तो उन्होंने देखा कि बहुत लडके खडे है बिकने के लिए, अब एक लडके को देखा और उसे खरीद कर घर ले आए. और बोले कि तेरा नाम क्या है तो वो बोला - कि हूजूर आप जिस नाम से बुला लो वहीं मेरा नाम है । फिर उससे पूछते है कि तुम क्या खाओगे? क्या पहनोगे ?

तो वो गुलाम कहता - कि आप जो खिलाओगे, पहनागोगे वो ही सब करूगाँ । फिर उसने कहा - कैसे काम कर सकते हो ? तो वो कहता - कि आप जो करवाआगे. तो आखिर में पूछते है कि तेरी क्या चाहत है? तो वो गुलाम कहता है - कि बंदे की कोई चाहत नहीं होती. जो मालिक की है वहीं मेरी.

जब उन्होंने ये बात सुनी गुलाम की तो वो सिंहासन से उठे और बोले - कि तुम मेरे गुलाम नहं हो ? तुम मेरे गुरू, उस्ताद हो और गले से लगा लिया.  आज तुमने मुझे सिखाया कि गुलाम परमात्मा का होना चाहिए बाद में वो कहते है कि तुम आजाद हो और वो चला गया. वो कहते है कि एक लडका मेरे जीवन को बदल गया कि हमें कैसा सेवक होना है परमात्मा का . तो परमात्मा हमें जो खाने को दे वो ही खा ले, जैसे वो रखें वैसे ही रह ले, जो काम दे वो ही कर ले, वास्तव में हमें ऐसा ही गुलाम बनना है परमात्मा का. जो परमात्मा का गुलाम बन गया उसे कोई और नहीं बना सकता. उसने जो हमें जिदंगी दी यहीं उसकी सबसे बडी नेमत है । तो जीवन का सार ये ही है और हमें उस परमात्मा का ही सेवक बनना है । प्रेम से कहिए श्री राधे

प्रसंग ३- भागवत में दसवें स्कधं मे गोपी गीत आया है उसके दूसरे ष्लोक में वो कहती है –

शरदुदाशये साधु जातसत सरसिजोदरश्रीमुषा द्द्शा , सुरतनाथ तेsशुल्दासिका वरद निघ्न्तो नेह किं वधः” 

तो जब भगवान रास से अंर्तध्यान हो जाते है तो गोपियाँ कहती है कि भगवान हम तो आपकी बिना मोल की खरीदी हुई दासियाँ है । कोई किसी को मोल लेकर खरीदता है तो वो उसका सेवक हो जाता है पर हम आपकी बिना मोल की दासी है तो आप प्रकट हो जाइए. तो वो बता रही है । हमें अपने परमात्मा का बिना मोल का दास बनना है । तो गोपी गीत सुनने के बाद भगवान प्रकट हो गए और कहते है - कि मै दुनियाँ केा बताना चाहता था कि तुम प्रेम की पताका हो, तुम जितना प्रम करती हो मेरे से, कोई नहीं कर सकता और भगवान से वो पूछती है - कि तुम कौन हो? जो प्रेम करने वालो से प्रेम करते हो, तो भगवान उनसे बोलते है कि मै तुम्हारे जन्म-जन्म का ऋणी हूँ । अगर मै देवता का रूप लेकर,आयु लेकर भी संसार में आ जाउॅ तो तुम्हारा ऋण नहीं चुका सकता हूँ । तो भगवान इस लीला से क्या बता रहे है कि जब गोपियों के जैसाभाव मन में लाता है दास भाव लाता है कोई भक्तिी करके तो देखे उस भावमें सब भाव अपने आप आ जाते है. कांत भाव.

तो भगवान का गुलाम बनके तो देखो पर हमारी विंडबना तो देखो हम अपने मन शरीर आदतों के गुलाम है । व्यक्ति केाई पाप करने लगता है तो वो पापों का गुलाम हो जाता है । अगर पाप के बाद उसको प्रायष्चित करे और फिर करने लगे तो हम उसके आदी हो चुके है. गुलाम शरीर से ही नहीं मन से भी होते है मन ही तो बंधन और मुक्ति का कारण है. मन जहाँ बंध गया हम उसके दास हो गए तो वो ही मोह है । मन जब बंधन से छूट गया तो वो ही मोक्ष है । क्योंकि मुक्तिी मन की होती है शरीर, आत्मा की नहीं होती.

इसलिए हमें ये देखना है कि मन कहाँ है, हम बैठे रहते है पर ये मन उडता है. जैसे नदी की नाव को हवा साथ बहाकर ले जाती है ऐसे ही ये मन है । मन में जब विचारों की आँधी चलती है तो मन पता नहीं कहा चला जाता है । और व्यक्ति भटक जाता है । और समय रहते हमनें अपने को मन की दासता से आजाद नहीं किया तो मरते वक्त जैसे मति होती है वैसी ही गति होती है । मन में विचार रहते है तो मरते वक्त जिसको याद करके मरेगा वैसा ही उसको जन्म मिलेगा हमारे सामने उदाहरण है ।

भागवत में जडभरत जी के तीन जन्म एक मृग ने खराब कर दिए ये क्या है मोह का कारण मोह कहाँ से आता है ? आसक्तिी से,  लगाव से,  और जब हम मन के गुलाम हो जाते है । उस परमात्मा की दी हुई हर चीज में संतोष नहीं कर पाते.तब हम यदि दर्शाते है कि हम मन के गुलाम है.

प्रसंग ४- हकीम लुकमान जी का जीवन बडे संघर्ष से बीता वो एक सेठ के यहाँ काम करते थे एक दिन उसने उनको खीरा लाने भेजा तो जब वो बाजारे से खीरा लेकर आए तो सेठ ने उसे काटा और खाया तो बुहत कडवा लगा तो उसे गुस्सा नहीं किया और खीरा उठाया और लुकमान जी केा दिया और कहा खाओ तो वो खाने लगे पूरा खा गए. कुछ भी नहीं कहा.

तो मालिक ने कहा - कि तुम कैसे खा गए इतना कडवा था. वो कहते है कि आप रोज मुझे अच्छा खाना देते हो और अगर एक दिन खराब खाना दिया तो मै उसमें नुस्क क्यों निकालूँ तो सेठ बहुत खुष हुआ तो जो परमात्मा हमें हर दिन खुषी सुख देता है अगर कभी दुख दे ता उसे भी हमें खुष होकर सहना है । जबकि दुख हमारे कर्मों का फल है । तो कहने का मतलब हम जो भी है वो इस मन से जब हम मन को छोडकर उस परमात्मा के गुलाम हो गए  तो सही अर्थों में  हम आजाद हो जाएगें.

 

“राधे-राधे”  

 

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