Theme :
Home
Granth
eBook
Saint
Leelaye
Temple
Yatra
Jap
Video
Shanka
Health
Pandit Ji

मोक्ष

  Views : 399   Rating : 5.0   Voted : 1
submit to reddit  

राधे राधे आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले सब दो मिनिट के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ भगवन नाम का कीर्तन करें


 "गोविंद के गुण गाइए, गोपाल के गुण गाइए,द्वार मन के खोल कहिये आईये आईये हरि आईये ....."


श्री राधारानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि कोटि वंदन है ।


आज का हमारा सतसंग का का विषय है – “मोक्ष” तो ये क्या है मोह के क्षय का नाम ही मोक्ष है । क्योकि ये जो मोह है यहीं बंधन और मुक्तिी का कारण है. क्योंकि मुक्तिी शरीर की नहीं, मन की होती है । जो मन है हमारा यहीं बंधन और मुक्तिी का कारण है । और जब ये मन किसी चीज में लग जाता है । तो वहीं से मोह होता है और जब मोह का नाश होता है । हम कहते है कि मोह का क्षय तो वो ही मोक्ष है. 



व्यक्ति का जीवन यू ही निकल जाता है । लगाव बुरा  नहीं है पर उसमें निक्षेप भाव रखना जरूरी है कर्म करना तो जरूरी है कोई भी व्यक्ति बिना कर्म के नहीं रह सकता वो तो उसे करना ही है । उसे वो नहीं छोड सकता है । तो कर्म क्या है ? जो हम पिछले  जन्म में करे आए है उसका परिणाम हम आज है और जो आज करेंगे, वो हमारा आने वाला कल होगा.तीनो ही हमारे सामने है और आज तो चल ही रहा है.  तो कहने का मतलब कर्म में जितना व्यक्ति निरपेक्ष भाव रखेगा उसकी उतनी ही आसक्तिी कम रहेगी क्योंकि कर्म में किसी तरह का पक्ष ना हो अच्छा बुरा कुछ ना हो क्योंकि जब हमने उसमें मन मोह को लगाया वहीं से उसमें आसक्तिी आ गई,वही आसक्ति व्यक्ति को उम्र भर नहीं छोडती इस मोह ने संतो को मोक्ष से वापिस लेकर आ जाता है ।


प्रसंग १-
एक संत थे वो बडे ज्ञानी थें उनके आश्रम में बहुत शिष्य थे तो एक बार उन्होने एक शिष्य को बुलाया और कहा - कि तुम मेरे प्रिय शिष्य हो, मै तो मरने वाला हॅू तुम्हें एक शक्तिी देकर जा रहा हूँ तुम जब आँख बंद करों और तुम्हें नाद सुनाई दे घंटा ध्वनि सुनाई तो समझना मेरी मुक्तिी हो गई और नही तो समझना मै यहीं संसार में अटक गया हूँ ।



तो शिष्य ने कहा -
कि ठीक है । तो एक दिन वो बिस्तर पर पडे थे पर वो शिष्य नहीं था ।



तो वो कहने लगे-  कि मुझे केला खाना है । तो वो मरने वाले है जीवन भर भगवान का नाम लिया पर मरने के समय उनका ध्यान नहीं आया हम तो यत्न भी करते है । तो वो शिष्य कहते है कि गुरूदेव हम अभी आगन से ला के दे रहे है । तो वो जब लेने गया तो तभी गुरूदेव चले गए उपर. तो वो शिष्य आया जिसको उन्हेंने ये ज्ञान दिया था तो उसने देख कि गुरूदेव तो मर गए है । अब उसको वो बात याद आई तो उसने आँख बंद की तो उसे कुछ भी नहीं सुनाई दिया. तो वो समझ गया कि गुरूदेव की मुक्तिी नहीं हुई । तो कहता कि गुरूदेव कहाँ गए ? फिर  तो वो सबसे पूछता है कि अंतिम समय में गुरूदेव के पास कौन था तो सभी शिष्य बोले कि हम थे और उनकी अंतिम इच्छा केला खाने की थी तो मै लेने गया था पर जब तक वो मर ही गए.



तो वो ज्ञानी शिष्य बोला
- कि मुझे पता कि गुरूदेव कहाँ गए तो सबको लेकर आँगन में गया और उसने एक केला तोडा उसको छीला और उसको तोडकर देखा कि एक कीडा है उसमें तो उसने कहा - कि ये गुरूदेव तो सब ने कहा-  कि कैसे ?



तो वो बोला -
कि मुक्तिी हमारी आत्मा की नही बल्कि हमारे शरीर की होती है । मन की होती है । ये जहाँ होगा वो ही उसकी गति होगी तो गुरूदेव का मन केले में अटका था तो मरते समय हमें देखना कि हम किसे याद कर रह है । “अंत मति सा गति हम तो मरते वक्त भी अपनों को याद करते है ।गति मन की होनी है.निरपेक्ष भगवान की भक्ति में लगा गए तो मुक्त हो जायेग.कहा तो वे संत विरक्त थे कहाँ एक केले में मन अटक गया.


भागवत जी में जड भरत जी कथा आती है । वो कौन थे ? राजा थे. एक समय उनके मन में वैरागय आया और राज्य पत्निी सब कुछ छोडकर, गंडकी नदी के किनारे भगवान का नाम जपने लगे और सन्यासी की तरह रहने लगे ।



२४ घंटे भगवान का भजन करते पर मन कितना चंचल है सबकुछ छोडने के बाद जब राजा भरत एक दिन स्नान करने नदी गए तो एक हिरणी वहा आई और शेर की दहाड सुनकर उसने छलाग लगाई तो वो गर्भवती थी तो उसका बच्चा पानी में गिर गया और वो दूर जाकर मर गई. तो वो उस बच्चे को आश्रम में लेकर आ गए और विचार करने लगे कि हाय ! ये इतना छोटा-सा बच्चा अब इसका लालन-पालन कैसे होगा?



इसकी मा मर गई तो वो उसकी देखरेख करने लगे तो उनको उससे मोह हो गया भगवान को भजने आए थे उसके छोडकर हिरण की देखभाल में लग गए,उसे खिलते पिलाते,देखरेख करते,जिस संसार कीआसक्ति छोडकर आये और एक मोह में सब कुछ बिगाड दिया. एक दिन वो बडा होकर हिरणों के झुडं में चला गया तो वो उसका चिंतन करते करते उनकी मृत्यु  हई तो अगले जन्म में हिरण के गर्भ से पैदा हुए और उसके बाद ये ब्राहमण के घर में पैदा हुए ऐसा करते  इनके तीन जन्म लग गए मोह ने तीन जन्म खराब कर दिए तो ये मन जहाँ अटक गया बस वहीं लग गया और अगर हम भक्त और भक्तिी देखें तो आध्यात्म में मोह का कोई स्थान ही नहीं है ।



भक्त जो है वो निष्काम है वो तो भगवान से मोक्ष की भी कामना नहीं करता इतनी उच्च कोटि की ही भक्तिी. मोक्ष का मतलब जब मन मोह से हट जाएगा और भगवान में विलीन हो जाएगा तो फिर व्यक्ति का  अस्तित्व ही मिट जाएगा, ना तो उसका जन्म होगा, ना ही कर्म होगा, तो भक्त के पीछे पीछे मोह भागता है तो भक्त कहता है आप कौन हो ? तो मोक्ष कहता है कि “मै मुक्तिी हूँ” और मुझे स्वीकार करो तो भक्त कहता है कि मेरे पास मत आओ मुझे कामना नहीं है तुम्हारी.



प्रसंग 2- 
रामायण में जब भगवान राम अपने सारे काम करके सरयू नदी में जाकर अपना शरीर त्याग कर अपने धाम साकेत जाने लगे तो सारी अयोध्या नगरी को अपने साथ ले जाने लगे सब सरयू में जाकर दिव्य रूप धारण कर जाने लगे पर हनुमान जी खडे थे.



तो भगवान राम कहते है
- कि आपको नहीं जाना ? तो हनुमान जी कहते है वहाँ क्या है ? तो राम जी कहते है - कि जो मेरे धाम को चला गया उसकी मुक्तिी हो गई फिर उसे इस पृथ्वी पर नहीं आना है । उसको तो मोक्ष मिल गया.



तो हनुमान जी बोले
- कि वहाँ पर आपकी कथा नहीं है?



तो भगवान कहते है कि वहाँ सभी मुझ में विलीन हो जाते किसी का कोई अस्तित्व नहीं रहता है तो हनुमान जी कहते वहाँ आपका नाम कथा नहीं है तो मै वहा जाकर क्या करूँगा ? कीर्तन भी वहाँ नहीं होता.



तो वो कहते -
 कि मै नहीं जाउगाँ ऐसा मोक्ष किस काम का जहाँ आपका नाम कीर्तन नहीं है । तुलसीदास जी ने कहा है - कि “प्रभु चरित्र सुनिवे को रसिया,राम लखन सीता मन बसिया” मतलब प्रभु यहाँ राम का नाम नहीं है प्रभु मतलब वो परमात्मा, वो शक्तिी, चाहे राम कृष्ण हो कोई बंधन नहीं है, तो जहाँ कथा है भगवान की वहाँ हनुमान जी आते है तो राम जी ने ये वरदान दिया उनकेा कि जब तक पृथ्वी पर ये युग रहेंगे तब तक तुम रहोगे । तो वो आज भी है हर कथा में वो जाते है और ये सत्य है



यहाँ भाव देखिए उन्होंनं मुक्तिी नहीं माँगी उनको नाम ही प्यारा है । वो यहीं रहे तो जो भक्त होता है वो मुक्तिी नहीं चाहता और भगवान मागनें पर भक्ति नहीं देते मुक्तिी दे देते है । भक्तिी और मुक्तिी में भक्तिी बडी है । क्योंकि भगवान सबको भक्ति नहीं देते और मुक्त होकर व्यक्ति भगवान में विलीन हो जाएगा तो फिर इसके पीछे नहीं रहना पडेगा. मुझे और भक्त के पीछे भगवान हमेशा चलते है तो भक्त तो निष्काम है वो सदा कथा में रहता भगवान की तो भगवान कहते है कि ऐसे संतो के चरणों की रज के लिए भगवान उनके पीछे जाते है कि उनकी रज से मै पवित्र हो जाउॅ भक्तिी पाने के बाद भगवान भक्त के अधीन हो जाते है ।



तो भगवान कहते है कि मागॅने से मै मुक्तिी तो दे सकता हूँ पर भक्तिी नही तो ये मन की मुक्तिी ही हमें करानी है । और ये मरने के बाद नहीं होती है । व्यक्ति का जीवन इन भौतिक चीजों में लग जाए और फिर व्यक्ति कहे कि मुझे मोक्ष मिल जाए तो तो ये कैसे संभव है जब बचपन में नहीं भजा जवानी में नहीं भजा, तो बुढापे में कैसे नाम आएगा, लोग कहते कि अभी तो मै जवान हूँ ये क्या उम्र है । भजने की तो भगवान भी कहते है कि अब बुढापे में भी मत भज मुझे अब तू अपने परिवार में लगा रह व्यक्ति कहता है कि जब सारी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाएगं तब भजन करेंगे. उसकी जवानी तो पैसा कमाने में बच्चों की शादी में निकल जाती है । तो बुढापे में उसे हरि का नाम उसे अच्छा नहीं लगता नाती पोतो की बोली अच्छी लगती है तो मोह नहीं गया और अंत मति सा गति जैसी मति होगी अंत में वैसी ही उसकी गति होगी. 



प्रसंग 3-
एक व्यक्ति एक संत के पास गया और बोला कि मेरे पिता की सदगति करो वो मर गए है तो संत बोले किे मरने के बाद सदगति नहीं होती तो वो संत समझ गए कि इसको ऐसे समझ में नहीं आएगा इसको पता ही नहीं कि गति और सदगति क्या है ।



तो वो कहते है-  
कि तुम घर जाओ, दो घडे लेकर आओ एक में पत्थर लाना और दूसरे में धी भरकर लाना तो वो कहता - कि ठीक है.



तो वो घर जाकर दो घडे लाया एक में धी और दूसरे में पत्थर तो संत ने कहा - चलो मेरे साथ तो वो एक नदी के किनारे गए, और बोले कि ये दोंनो घडे उलटे कर दो तो वो गया और नदी में जाकर दो घडों को उलटा कर दिया तो जैसे ही उसने पत्थर वाला घडा उलटा किया तो संत बोले कि इन पत्थरों को बचाओ ये तो डूब रहे है । और धी तो तैरने लगा पानी में



तों वो व्यक्ति बोला
- कि आप कैसी बात करते हो ?



पत्थर भारी होते हो तो वो डूब जाते है और धी हल्का होता है तो तेरता है । तो संत कहते है कि अब तुम समझे कि सदगति क्या है ।

तो वो बोला - कि मै नहीं समझा?



तो संत बोले - कि ये तो व्यक्ति के कर्म पर निर्भर करता है अगर उसने भारी कर्म किए है मन को वासनाओं के बोझा से लाद रखा है । तो वो पत्थर की तरह डूब जाएगा पर उसके कर्म हल्के है उसने वासना हटा दी है तो वो तैरेगा तो गति और सदगति किसी के करवाने से नहीं होती ये तो अपने कर्मां से होती है । हम सदगति की बात करते है । तो अगर जीते जी हमने अपने कर्म को अच्छा ना बनाया तो कैसी सदगति? जीते जी मोह का क्षय नहीं किया तो मोह को हटाया नही तो मोक्ष नहीं और जहाँ भक्तिी है वहाँ तो मोक्ष की भी जरूरत नहीं है । वो है भगवान का नाम उनकी याद तो भक्त की गति सदगति सबकुछ भक्त के लिए भक्तिी है । ना तो भगवान से कुछ माँगता और ना ही उसकी कामना है कुछ  मुक्तिी उसकी पीछे जाती है ।



भक्त तो भगवान से यहीं माँगता है कि प्रभु मुझे बस इस संसार मे हर बार जन्म देना तो हर बार आपका नाम आपके चरण सदा याद रहें मै आपको भूलू ना बार बार इस लोक में जन्म देना भक्तिी देना भक्त के लिए यहीं सबकुछ है । चारों युग में कलियुग में तो भगवान को पाना सरल है और युगों की अपेक्षा सतयंग में तो संत करोडो वर्ष की तपस्या करते करते थे द्वापरयुग में तो यज्ञ करते थे पर आज तो ध्यान चाहे ना लगा पाए सेवा भी ना कर पाए बस केवल नाम ही लेले भगवान का तो वो इस संसार को पार कर जाएगा “कलियुग केवल नाम अधारा सुमिर संमिर नर उतरहीं पारा “ लोग दिनभर में संसार की ही बात करते है और कहते कि अभी भगवान का नाम क्या लेना अभी तो खाओ पियो मस्त रहो तो हममें और जानवरों में क्या अंतरहै हमारे पास बुद्वि है जिससे हम अपेन कर्मों को हल्का कर सकते है और हरि में अपना मन लगा सकते है ।
         
                                                                        “राधे-राधे”  

Comments
Enter comments


 
 
Tags :
Copyright © radhakripa.com, 2010. All Rights Reserved
You are free to use any content from here but you need to include radhakripa logo and provide back link to http://radhakripa.com