Theme :
Home
Granth
eBook
Saint
Leelaye
Temple
Yatra
Jap
Video
Shanka
Health
Pandit Ji

स्वागत

  Views : 331   Rating : 5.0   Voted : 4
submit to reddit  

आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करें


“देखो आए है बिहारी जी सब मिल स्वागत करो और संग में आई है राधा रानी सब मिल स्वागत करो…”


श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है। “स्वागत” क्या है. अगर हम सामान्य तरीके से देंखें तो हम सब को पता है कि स्वागत क्या है लेकिन स्वागत एक कला है और क्या हम एक अच्छे स्वागतकर्ता है । ये जानना बहुत जरूरी है संसार में भी और आध्यात्म में भी. 


प्रसंग १- जैसे घर में कोई व्यक्ति आता है समारोह में तो एक या दो लोग दरवाजे पार खडे हो जाते है स्वागत करने के लिए क्यों ? क्योकि स्वागत का सबंध होता है आत्मीयता से. स्वागत के कुछ सिद्धात  होते है । घर में कोई व्यक्ति आता है तो एक नियम है कि जो मेहमान आए उसे हम लेने जाए दरवाजे तक. और घर में उसे बैठने की जगह दें । ये दूसरा नियम है, उसकी कुषलता पूछिए, कि उसके घर में सब  कुषल मंगल है फिर वो पूछे तो अपनी भी बताओ । फिर अगला उससे खाने पीने के लिए पूछो कहते है कि “अतिथी देवो भव” कहते है मेहमान भगवान है और जब वो जाने लगे तो उसे दरवाजे तक छोडने भी आए ये स्वागत का शिष्टाचार है ।

 

लेकिन  इन सबको करते हुए एक चीज जरूरी है वो है “आत्मीयता” जैसे केाई घर में केाई आए हम भले ही खाने को ना दें, पर भावना अच्छी रखें तो उसे अच्छा लगेगा. और अगर आत्मीयता नहीं होगी तो वो नहीं रूकेगा उपर से ही हम कह दें कि चाय पी ले, तो वो नहीं पियेगा ? नहीं और ये पता कैसे चलेगा ?तो वो है हमारी आँखें, ये मन का आइना होती है सबकुछ बता देती है । व्यक्ति आॅखों से समझ जाता है कि इसके कैसे भाव है.


तुलसी दास जी ने कहा है -कि “आव नहीं आदर नहीं, नहीं नयन बीच स्नेह तुलसी तहाँ ना जाइए कंचन बरसे मेघ” चाहे भले ही वहाँ पर सोने की वर्षा क्यों ना हो रही हो पर व्यक्ति के अंदर स्नेह आत्मीयता ना दिखे वहाँ नहीं जाना चाहिए । सबकुछ पूछ ले आप किसी के घर में जाओ वो सबकुछ पूछ ले पर आत्मीयता ना हो तो ये सब बेमाना है. बेमतलब का है । अगर हमारे पास आत्मीयता है नहीं है घर में कुछ खाने पीने को तो व्यक्ति प्रेम देखेगा तो उसके अच्छा लगेगा उसको स्नेह दिखेगा तो क्या हम एक अच्छे स्वागतकर्ता है ।

 

जैसे समारोह में बाहर क्यों खडे होते है अंदर तो कितनी अच्छी व्यवस्थाएँ है । क्योंकि वो एक शिष्टाचार है अगर व्यक्ति का बाहर ही स्वागत नहीं हुआ तो पहले से ही उसका मन खराब हो जाएगा.  इसलिए स्वागत करना जरूरी है । बाहर की व्यवस्था ठीक है पर अंदर की नही तो भी बात बन जाएगी बस इसी तरह आध्यात्म में भी है ।

 

आध्यात्म में ये जो हमारा मन है अंत:करण है इसमे आत्मीयता है. कि नहीं , जब हम भगवान को बुलाते है उनका स्वागत करते है । घर में कोई मेहमान आता है तो घर मे सफाई कर देते है । इसी तरह  हमारा  अंत:करण है । पहले तो हमे स्वागत करना आना चाहिए फिर हमारे मन में गंदगी तो नहीं है ।   कचरा तो नहीं है ।  उसे साफ करना हे तभी भगवान आएगे पर पहला हमें स्वागत करना है. 

 

हनुमान जी की एक चैपाई  है – “राम दुआरे तुम रखवारे होत न आज्ञा बिन पैसारे “, हनुमान जी कितने विनम्र है । राम जी के प्रति उतने ही वो गुणों का भंडार है । जो राम जी है उनके दरवाजे के रक्षक है आप तो द्वार पर जो खडा होता है वो स्वागत करने के लिए तो हनुमान जी हर किसी को नहीं जाने देते दरवाजे पर अगर कोई खडा है तो वो अपने हिसाब से ही सबको जाने देगा. आमंत्रण की कला में एक द्वारपाल को निपुण होना चाहिए ।

 

प्रसंग 2. - अगर हमारे घर में किसी की शादी है और हम जाए सिर्फ निमंत्रण देकर आ जाएँ तो क्या वो आएगा, शायद नही? तो हमनें उससे कुछ बोला ही नहीं. कि आप परिवार सहित आइएगा तो ये शिष्टाचार की चीजें बहुत जरूरी है । तो ये निमंत्रण देने की कुषल कला है. तो हनुमान जी की आज्ञा के बिना कोई भी अंदर नहीं जा सकता तो हम भी अपने अंत:करण के द्वारपाल है ।

 

आँख कान ये सब द्वार है तो हमें किसी चीज को अंदर जाने देना है और किस को नहीं तो अच्छाईयों कों अंदर जाने देना और बुराईयों को बाहर से जाने देना, ये भी एक कला है । इसमें सबसे बडी बात है आत्मीयता. कुछ ऐसे ही स्वाभिमनी व्यक्ति होते है. निमंत्रण किया पर आग्रह नहीं किया तो वे नहीं आयगे. इसी तरह से गुण स्वाभिमानी होते है इनको हमें आग्रह करके बुलाना है. कि इनका प्रवेष हो हमारे अंदर इनको हमें बार बार बुलाना है । फिर ये अंदर आएगें और जब हमारे अंत:करण में ये गुण आ जाएगें तो भगवान अपने आप आ जाएगें. पर आत्मीयता बहुत जरूरी है ।


प्रसंग 3 - एक बार का प्रसंग है कि एक दार्षनिक थे वो विचारों बहुत अच्छे थे सब लोग उनको मानते थे एक बार उनको बाहर जाना पडा बहुत तेज बारिष हो रही थी तो जब वो अपने घर से निकले तो देखा कि एक कुत्ता आया तो वो उनसे लिपट गया. तो वो भी उसको दुलार करने लगा. तो एक व्यक्ति आया और बोलने लगा कि ये आप क्या कर रहे है? ये कुत्ता आपके कपडे खराब कर रहा है तो वो बोले - कि ये कुत्ता मुझे पहली बार मिला और इसकी आत्मीयता देखो ये मुझे प्यार कर रहा है । अगर मै अपने कीमती कपडो के लिए इसको भगा दूँ तो इसकि आत्मीयता को ठेस लगेगी. तो इसकी आत्मीयता के आगें मेरे कीमती कपडे कहाँ लगते है । इसका जो संबध बनेगा आत्मीयता से बडी कोई चीज नहीं है. तो मेरे कपडे आत्मीयता के आगे कुछ नहीं. वो तो अनमोल है सामने वाले के प्रति हमारा व्यवहार कैसा है

 

अगर हम भगवान के सामनें बैठे है । और भोग प्रसाद रखा है पर अदंर आत्मीयता का भाव नही तो सब व्यर्थ है अगर शबरी को देखें तो उन्हेांने क्या किया राम जी को झूठे बैर खिलाए आध्यात्म में और संसार में दोनों तरफ से शबरी ने स्वागत किया. बाहरी भी चीजे भी थी और भीतरी भी.दोनों तरह से स्वागत किया

 

भगवान का रोज हर रास्तें में फूल बिछाती थी और अन्दर से , जब उनका सामना भगवान राम से हुआ जो उन्होंने अपना परिचय दिया तो तो अपनी आखों के जल से भगवान के चरणों को धोया.और आँखों से बता दी अपनी आत्मीयता,जब झूटे बेर खिलाये  तो प्रेम दिखाया भगवान के प्रति और भगवान को जो आनंद राजभोग में नहीं आया वो शबरी के बैरों में आया ।


भील जाति की थी शबरी उसने अपने मन की सफाई भी की, भगवान मैंने अपनीआँखों के रास्ते को साफ कर लिया.अब आप अन्दर विराजिए आप कुटिया में तो आगये फिर भगवान राम शबरी जी के हद्रय में वास कर गए,

 

प्रसंग 4. - तो अगर हम विदुरानी जी को देखें तो जब भगवान हस्तिानापुर गए तो दुर्योधन ने छप्पन भोग रखे थे,महल था, उनके लिए पर एक चीज की कमी थी वो थी आत्मीयता अपनापन तो दुर्योधन ने दिखाया ही नहीं, अपने अंदर से उसने स्वागत नहीं किया सिर्फ उपरी स्वागत किया । तो भगवान भी कह देते है कि मुझे तो अंदर से मतलब है दुर्योधन के यहा से उठकर आए गए उनको प्रेम नहीं दिखा वहाँ पर और विदुरानी के घर पर आ गए और उसके घर में कुछ भी नहीं था तो दरवाजा खोला उस वक्त वो नहा रहीं थी तो उनको अपना होष ही नहीं रहा कि वो क्या कर रही थी और रोने लगी तो भगवान ने अपना पीतामंबर उनको उडाया. और अंदर लेकर आए पर दरवाजे पर कितनी आत्मीयता प्रकट की. अंदर वाला स्वागत किया अंदर जाकर भी होष नहीं रहा और भगवान को बैठने के लिए उलटी चौकी दे दी. और भगवान उस पर ही बैठ गए क्यों भगवान विदुरानी के आखो को देखकर समझ गए कि इसमें कितना प्रेम है. विदुरानी जी के घर में कुछ नहीं था उनको समझ में नहीं आ रहा था कि किस चीज का भगवान को भोग लगा दूँ । क्या दे दूँ । तो केले तोडकर लाई और केले के छिलके भगवान को दे रही है और केले को नीचे डाल रही है. इतनी आत्मीयता थी उनके अंदर उन्हें होष ही नही.

 

तो भगवान भी कहते है कोई एक बार ऐसा स्वागत करके देखो तो हमे भगवान का स्वागत आँखों से करना है क्योंकि वो ही भगवान को चाहिए. हम भर भर लोटे जल भागवान पर चढ़ते है दो बूंद आँसू नहीं चढाते हम मखमल के आसन पर बैठते है हम दीनता प्रकट ही नहीं करते. भगवान जो कि त्रिलोक पति है उनका स्वागत करते है तो अपना ऐष्वर्य बखान करने लगते है पर हम भूल जाते है कि उनके आगें हमारा ऐष्वर्य कुछ भी नहीं है.

 

स्वागत एक कला है और आध्यात्म में इसका महतव है कि हम भगवान का स्वागत  किस तरह कर रहे है फूल हो ना हो पर मन रूपी सुमन भगवान को दे अपने कर्म अर्पण कर दे तो वो ही सही मायनों में भगवान का स्वागत है । अगर हमनें दो बूँद आँखों से आसू भगवान केा दे दिए तो सबकुछ स्वागत हो गया. ये हमे सब सिखा रहे है हनुमान जी को देखिए जब पहली बार वो राम जी से मिले और पता चला कि ये श्री राम है तो उनकी आँखों से आँसू गिरे और चरणों में गिर पडे. तो इन जैसे और भी भक्त सबको स्वागत की कला आती है कि आध्यात्म में हम कैसे भगवान का स्वागत करें, ये एक कला है तो जब तक हमारी बाहर की व्यवस्था उस समारोह की तरह अच्छी नहीं होगीं । तो फिर अंदर तो कोई बाद में जाएगा पहले बाहर का अच्छा हो तो अंदर का अपने आप ही हो जाएगा तो भगवान तभी अंदर जाएगें जब बाहर का स्वागत अच्छा होगा.


"राधे-राधे " 

 

Comments
Enter comments


 
 
Tags :
Copyright © radhakripa.com, 2010. All Rights Reserved
You are free to use any content from here but you need to include radhakripa logo and provide back link to http://radhakripa.com