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स्वर्ग-नर्क

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आईये आज का सत्संग शुरू करने से पहले आइये हम कुचा पलों के लिए भगवान नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये ..

 

"जय राधा रसिक बिहारी, बोलो श्री राधा रसिक बिहारी"............

 

श्री बाँके बिहारी जी और राधारानी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है । “स्वर्ग और नरक” तो इसको अगर हम सामान्य तौर पर देखें तो हम जानते है कि अच्छे कर्मों का फल जो अच्छा कर्म करेगा वो स्वर्ग जाएगा । और जो बुरे कर्म करेगा वो नरक जाएगा ये एक सामान्य परिभाषा है । हम अगर भौगोलिक दृष्टिी से देखें इनकी स्थिति कहाँ है . स्वर्ग तो वो उपर के लोकों में है । और नरक नीचे के लोकों में है । पाताल में है । स्वर्ग मतलब उपर और नरक मतलब नीचे तो जब हम ऐसे काम करेंगे कि नीचे गिर जाए नजरों में, तो वो नरक और जब अच्छे काम करेंगे तो वो स्वर्ग का रास्ता है तो कहने का मतलब हम जैसे कर्म करेगे वैसा ही उसका फल मिलेगा जैसे

 

प्रसंग १. - कि एक बार एक व्यक्ति रेगिस्तान में था तो वहाँ पानी नहीं था तो वहाँ यमराज आए उसकी परीक्षा लेने और उससे बोले कि मुझे पानी पीना है तो उसके पास जो भी पानी था उसने निकाला और दे दिया तो जब यमराज ने पानी पिया तो और असली रूप में आ गए

 

वो कहने लगे कि - मै तुम पर प्रसन्न हूँ । तुम्हारे पास थोडा सा पानी था जो तुमने मुझे दे दिया और प्यास बुझाई मेरी.मेरे पास नियती की किताब है जिसमें सबका लेखा जोखा है । वो किताब मै तुम्हें पाच मिनिट के लिए दे सकता हूँ । तो जब वो व्यक्ति किताब देखने लगा तो उसे पडोसी का पन्ना नजर आया तो उसने देखा कि उनके जीवन में क्या है ? तो उसने देखा कि खुशहाली से भरा उनका भविष्य है तो उसे बड़ा गुस्सा आया की ऐसा नहीं होना चाहिये .तो उसने वो पन्ना फाड दिया. और जब उसने अपना पेज देखा तो उसमें लिखा था कि अगले पल उसकी मृत्यु होने वाली है । और जब तक वो ये पूरा पढ पाता तब तक समय पूरा हो गया और वो मर गया प्रेम से कहिए श्री राधे

 

कहने का मतलब यहीं नर्क का रास्ता है । क्योकि व्यक्ति अपने कर्मों से गिर जाता है । और ईष्र्या तथा जलन इतनी भर जाती है व्यक्ति के अंदर, अगर वो चाहता तो क्या नहीं कर सकता उस वक्त क्योकि मुक्तिी तो दो पल में हो जाती है । पर हमारी ईष्र्या जो दूसरों के प्रति है उससे ही हम नीचे गिर जाते है.

 

कहने का अभिप्राय जो हम पाप कर्म करते है । वो ही नरक है । मन से, वाणी से, शरीर से, जो पाप करते है । उसका फल हमें यही इसी जन्म ने मिलता है.और जो कर्म हमारे रह जाते है । उनके लिए एक व्यवस्था बनाई गई है ये एक विधान है । अगर हम दुनिया का कानून देखें कि कोई चोरी खून करता है तो उसको जेल होती है ऐसे ही अगर कर्म बुरे करते है । तो फिर वो जेल में जाता है तो मन से वाणी से शरीर से कोई पाप करता है । तो वो नरक में ही जाएगा । प्रेम से कहए श्री राधे

 

प्रसंग २. - भागवत में एक प्रसग आता है जिसमें शुकदेव जी ने नरकों का वर्णन किया है तो जब उनहोने ये वर्णन किया है तो फिर राजा परीक्षित डर गए कि नरक में इतनी यातनाय भोगना पडेगी तो शुकदेव जी कहते है कि व्यक्ति कर्मों का हिसाब तो देना ही पडता है । तो परीक्षित कहने लगे कि व्यक्ति क्या करे ? कि उसे नरक में ना जाना पडे

 

तो शुकदेव जी ने कहा - कि इसके लिए व्यक्ति व्रत कर ले. तो राजा परीक्षित ने कहा - कि अब तो व्यक्ति बहुत व्रत करेगें । और पाप करेंगे फिर व्रत करेंगे ऐसा ही करते जाएगें ये तो वैसे ही हुआ जैसे हाथी पानी के अंदर अपनी सूड में पानी भरकर अपने उपर डालता है । और बाहर निकलकर धूल को फिर अपने उपर डाल लेता है । तो ऐसे स्नान का क्या फायदा? तो कहने का मतलब कि व्रत से पाप तो नष्ट हो जाता है । पर पाप की वासना खत्म नहीं जाती है । उसकी जो आदत है वो नहीं जाती है । तो वो केसे जाएगी ? कि अंदर से उसकी इच्छा नहीं हो पाप करने

 

तो शुकदेव जी ने कहा - इसका तो एक ही रास्ता है वो है । “भगवान की भक्तिी”क्योकि जैसे ही व्यक्तिभक्ति करता है तो वैसे ही अन्दर पाप करने कि इच्छा खत्म हो जाती है । और उसके खत्म होते ही वो पाप को भी छोड देता हैं । प्रे्म से कहिए श्री राधे सबको लगता है कि नरक में ना जाना पडे.बसा दुःख होता है. हम कहते है कि बुरे काम मत करो वरना नरक में जाना पडेगा तो ये जो बुरे कर्म हैं हम उस वासना को ही हटा दें. तो पाप रहेगा हीं नहीं.

 

प्रसंग ३- एक बार एक व्यक्ति था उसके मन में ये प्रष्न था कि स्वर्ग और नरक में क्या अंतर है ? तो वो एक महात्मा के पास गया तो उनसे पूछा,

 

तो वो बोले - कि तुम खुद ही देख लो तो वो उसके लेकर नरक में गए तो वहाँ बहुत शोर था, सब लोग लड रहे थे, खाने का वक्त हो रहा सबको खिचडी दी जा रही थी तो वहाँ एक परेशानी थी खाने कि चम्मच थी जो खाने की वो तीन फुट की थी तो कोई खा पा ही नहीं रहा था जब कोई भी खाता तो दूसरे को लग जाती और आपस में लडते.

 

ऐसे ही जब वो स्वर्ग में गया तो वहाँ भी वही परेशानी थी. वो ही चम्मच थी पर वहाँ एक अंतर था पर वो लोग आमने सामने बैठे थे और एक दूसरे को खिला रहे थे ओर वहाँ पर शांति थी । तो महात्मा ने कहा – व्यवस्था तो सब जगह एक सी है ये हमारी बुद्धि पर निर्भर करता है कि हम कैसे उसे कैसे लेते है.स्वर्ग और नरक सब यहीं है । जहाँ हम आपस मे प्रेम से रहते है झगडे नहीं होते है वहीं स्वर्ग है । और जहाँ लोग लडते है एक दूसरे को मारते है । वहीं नरक है ।दुनिया में स्वर्ग और नर्क दोनों है तो दोनों इस पृथ्वी पर है । स्वर्ग और नरक हम अपने हाथ से बनाते है । व्यक्ति किसी के हित की परवाह नहीं करता बस अपने ही बारे में सोचता है तो वो स्वार्थ में फसकर नरक में गिर जाता है ।

 

प्रसंग ४- एक बार एक व्यक्ति था उसके पास एक घोडा और कुत्ता था तीनों चले जा रहे थे और अचानक बिजली गिरी और वो मर गए . पर उनको पता नहीं चला कि वो मर गए है. कभी देह आसक्तिी भाव ऐसा हो जाता कि मरने के बाद भी पता नहीं चलता कि मर गए है । और वो चले जा रहे है.चलते चलते देखते है कि रास्ते में एक संगमरमर का दरवाजा है । तो वो तीनों अंदर चले गए क्योंकि वो तीनों बहुत प्यासे थे तो अंदर जाकर देखा कि एक व्यक्ति बहुत सो रहा था । तो उसके जगाया और कहा - कि हम बहुत प्यासे है क्या पानी मिल जाएगा ?

 

तो उसने कहा - सामने जाकर पानी पी लो. पर तुम्हीं पी सकते है तुम्हारे साथ ये जो जानवर आए है वो नहीं पी सकते है । उस व्यक्ति को बहुत दुख हुआ कि ये दोंनो भी चलते-चलते थक गए है और जितना प्यासा मै हूँ उतने ये भी है ।

 

तो वो कहने लगा - कि मुझे नहीं पीना पानी . जब मेरे ये दोस्त है जिन्होंने मेरा इतना साथ दिया तो मै इनके बिना नहीं पीयूगां बिना पिए ही लौट आया. तो वो उसके बाद आगें गया तो वहाँ भी एक धूल भरा जर्जर रास्ता था तो वहाँ वो गया और एक व्यक्ति वहाँ भी सो रहा था । तो उसने उस से बोला - कि भाई मुझे प्यास लगी है क्या पानी मिलेगा? तो वो बोला - कि सामने पानी का झरना है जाकर पीलो तो उसने कहा- कि क्या ये मेरे दोस्त है जानवर ये भी पानी पी सकते है तो उसने कहा तो तीनों ने वहाँ पानी पिया अब पानी पीकर जब वो व्यक्ति लौटा

 

तो उसने पूछा - कि भाई ! ये कौन सी जगह है तो उसने कहा - कि ये स्वर्ग है तो उस व्यक्ति ने कहा - कि भाई जहाँ मै पहले गया वो भी तो स्वर्ग था वहाँ बहुत सुन्दर दरवाजा था । तो उसने कहा - कि नहीं वो नरक था वहाँ वो लोग जाते है जो सिर्फ अपने हित के बारे में सोचते है और उसके लिए अपने मित्रों को भी छोड देते है । और वो वहीं रूक जाते है । वो वहाँ की सुन्दरता को देख लेते है पर वो सिर्फ दो पल की होती है । वो किसी की परवाह नहीं करते है । जो लोग अपना भला चाहते है वो वहाँ रूक जाते है और जो अपने साथ वालों की परवाह करते है वो ही यहाँ तक आ पाते है । जो सबके हित की सोचते है वो यहाँ आ पाते है प्रेम से कहिए श्री राधे

 

कहने का मतलब हम अपने ही बारे में सोचते है हम जो अच्छा कर रहे है ये ही तो हमारे कर्म है । हम तीनों से कर्म ही तो कर रहे है मन से वाणी से तन से और जब व्यक्ति अपने लिए करता है । तो वो कर्मों से गिर जाता है । और उसे नरक मिलता है.

 

कहने का अभिप्राय ये हैकि शुकदेव जी ने जब राजा परीक्षित से पूछा - तो उनको बडा आष्चर्य हुआ और शुकदेव जी ने कहा - कि स्वर्ग और नरक दोंनो यहीं है. जहाँ दो भाई एक ही साथ रहते है पर एक दूसरे से बात नहीं करते, नफरत करते है. वास्तव में वही नरक है और जहाँ लोग आपसे में प्यार से रहते है एक दूसरे के सुखदुख में साथ रहते है । उसी का नाम तो स्वर्ग है । और व्यक्ति जब बुरे कर्म करता है तो वो रोगी हो जाता है और पाप शरीर से ही निकलता है । तो जब कोई बडा रोग हो जाता है वो जीते जी तो नरक भोगता है. व्यक्ति करता है पर करने से पहले यह भूल जाता है कि भाले ही मै दूसरों के लिए बुरा कर रहा हू. व्यक्ति करता दूसरे के लिए है गढढा वो दूसरों के लिए खोदता है । पर वो ये भूल जाता है कि कर्म तो ये मैने किया है सामने वाला गिरे या ना गिरे इसी बिगडे हुए कर्म का फल नरक है । जो जैसा कर्म करता है उसे उसका वैसा ही फल मिलता है ।

 

प्रसंग ५. - एक नगर में एक मंदिर था तो वहाँ का सेठ रोज मंदिर में जाता और दीपक जलाता तो उसी नगर में गरीब व्यक्ति रहता रहता तो वो भी रोज आता और भगवान के सामने आकर हाथ जोडता पैर पड के चला जाता तो ऐसे रोज सेठ आता और घी की दिए जलाता और वो गरीब रोज हाथ जोडता और वो दीपक अपने घर के बाहर जलाता क्योंकि उस गली में इतना अधेंरा रहता था, कोई भी रोज उस गढढें में गिर जाता, तो वो ये सोचता कि मंदिर में तो सभी जलाते है उससे अच्छा कि यहा जलाए फिर कुछ समय बाद दोंनों मर गए तो यमराज ने उस गरीब को उच्चश्रेणी की सुविधॅाए दी और सेठ को निम्न केाटि की व्यवस्थाए दी

 

तो वो सेठ कहता -कि ये कैसे न्याय है, मै तो रोज दीपक जलाता था सेठ को बड़ा गुस्सा आया,. तो यमराज कहते है - कि ये जो ये कर्म का विधान है वो पुण्य कि महत्वता के मूल्य पर नहीं होता है वो कर्म की उपयोंगिता पर निर्भर करता है ना कि पुण्य की, कर्म कहाँ ज्यादा जरूरी था उस समय वो दीपक भगवान के यहां जलाना जरूरी नहीं था उस अंधेरी गली में ज्यादा जरूरी है जहाँ मंदिर में रोज दीपक जल रहे है वहा नहीं भी जलाता तो कुछ नहीं हुआ पर जहाँ अंधेरा है वहाँ जलाने से फायदा हुआ कितने लोगों को सुविधा हुई आने जाने की वो दूसरों के हित की सोच रहा है तो इस दूत का पुण्य आप से ज्यादा है इसमें कर्म की उपयोंगिता से काम किया है ।

 

प्रेम से कहिए श्री राधे कहने का मतलब स्वर्ग और नरक व्यक्ति खुद अपने कर्मो से बनाता है उसे मर के जाने की जरूरत नहीं है । यहीं अगर अच्छे कर्म करते है परमात्मा की याद आ रही है तो हम स्वर्ग में है । और अगर संसार में फसे है परमात्मा से विमुख है, तो बस ये मानना कि हम नरक में है जिस जीवन में वो परमात्मा नहीं है उसमें सारी सुख सुविधाएँ होने के बाद भी वो नरक से कम नहीं है । इस संसार मं तो सारी चीजें नाशवान है सब खत्म होना है. और हम इन चीजों के लिए लोगों से ईष्र्या करें उनका जीवन बर्बाद करें तो फिर वो नरक से कम कहाँ है . वास्तव में यहीं स्वर्ग और नरक की परिभाषा है हम अपने कर्मों से ही स्वर्ग और नरक को बना लेते है ।

 

“राधे-राधे”

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