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तर्क-वितर्क

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आइए आज का सतसंग का शुरू करने से पहले दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करें ।

 

राधे-राधे राधे प्रेम अगाधे, श्याम संजीवनी जय जय श्री राधे …….

 

श्री बाँके बिहारी जी और राधारानी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है । “तर्क वितर्क” हम अगर आज के समय को देखें तो किसी भी विषय पर चर्चा करें तो तर्क करने लगते है । आज के समय में लोगों केा हर चीज में साइंटफिक रीजन पहले चाहिए होता है । चाहे केाई भी चीज हो.

 

लोग तो धर्म में और ईष्वर में भी तर्क करते है । लेकिन धर्म और ईश्वर तर्क का नहीं श्रद्वा का विषय है । तर्क का नहीं  लोगों को तर्क सही जगह करना चाहिए और तर्क वितर्क से सिर्फ बहस ही हाथ लगती है । तो हमें इसका सबसे अच्छा उदाहरण है. 

 

प्रसंग १.- गणेश जी उनका हर एक अंग प्रेरणादायक है । उनका पेट इतना बडा है वो बताता है कि बात हमेशा पेट में रखनी चाहिए. जो हम हर बात को गांठ बना लेते है वो नहीं करना है । तो हमें अपने पेट को बढाना है. बातों केा दिल में नहीं रखना है. उन्हें सहन करना सीखना चाहिए.

 

उनके कान सूपे की तरह है जो पहले के लोग गेहूं को झाडने के काम आता था तो वो बता रहे है कि हमें अपने कान से सार की बातें रख ले और व्यर्थ की बातों कों ना सुने. गणेश जी की जीभ अंदर की तरह है । वो हमें बता रही है । कि बुरी बातों को अंदर ले जाना है जीभ पर कंन्टरोल रखना है

 

उनका वाहन चूहा है वो बता रहा है कि जैंसे वो चूहा घर में हो तो सारी चीजे कुतरता रहता है । अलमारी में हो तो सारे कपडों को काट देता है । तो उसकी कुतर कुतर करने की आदत है पर गणेश जी बता रहे है कि मै चूहे पर क्यों बैठे है वो इतने भारी है । और चूहा कमजोर वो बता रहे है । कि तर्क वितर्क को हमें नीचे रखना है और जब हम इस पर सवार रहेंगे तो ये कभी हलचल नहीं कर पाएगा जिसे चूहा हमेशा उछल कूद करता रहते है.  वैसे हम तर्क वितर्क केा नीचे दबाना है । क्योंकि हर जगह तर्क वितर्क अच्छा नहीं होता है । लोगों के तर्क ऐसे होते है कि उनका केाई सार नहीं है ।

 

प्रसंग २. - एक प्रसंग है अकबर के समय का तो उस समय बीरबल उनके बहुत खास थे तो जब वो अपने मंत्री के साथ घूमने निकलते है । तो उन्हेंने देखा कि बगीचे में बहुत सारे कौए बैठे थे तो अंकबर ने बीरबल से कहा - कि बताओ कि ये कितने कौए बैठे है वो मन में सोचते है कि ये ज्यादा ही बुद्धि मान बनता है अब पता चलेगा तो थोडी देर बाद बीरबल कहते है-  कि जहाँपना उन्नीस हजार चार सौ तिरेसठ कौए है ।

 

तो अकबर कहते तुमने कैसे गिन लिए और अगर तुम्हारी गणना से ज्यादा कौए निकले तो!

 

तब बीरबल कहते है-  मेरी बताई गणना से ज्यादा तो समझ लेना कि जो बाहर के कौए है वो अपने देश में छुटटी मनाने आए है ।अकबर ने कहा और यदि कम निकले तो ?

 

बीरबल ने कहा - यदि कम निकले तेा समझ लेना कि यहा कौए छुटटी मनाने बाहर गए है । अकबर से कुछ भी नहीं कहा गया और चुपचाप चले गए

 

तो कहने का मतलब ये है कि लोग फालतू के तर्क करते है । उन्हें ये भी नहीं पता कि वो पूंछ क्या रहे है । और अगर जवाब देने वाला मिल जाता है । तो फिर उसका जवाब भी वो वैसा ही देता है । रही बात आध्यात्म की तो ये तर्क का नहीं ये तो श्रद्धा का विषय है । हम तो हर चीज को ले के तर्क करते है ।लोग कहते है कि भगवान ने सोलह हजार विवाह किए अगर हम दूसरा कर रहे है तो इसमें कौन सी बडी बात है ?  लोग भगवान की लीलाओं में तर्क करते है । अगर भगवान ने इतने विवाह किए तो ये जानना है कि क्यों किए.

 

फिर तो भगवान ने तो कालिया के उपर नृत्य किया. तो क्या हम भी कर सकते है ?किसी छोटे से साप के सामने आते ही हम चार कदम पीछे भाग जायेगे .उन्हेांने तो वृदांवन में अग्नि का पान किया तो क्या हम कर सकते है ? नही तो जब हम बांकी लीलाओं में उनके समान नहीं कर सकते तो वो तो परमात्मा है ।  भगवन ने अपने एक उगली पर गोवर्धन पर्वत उठाया था तो हम उठा सकते है हम तो एक कंकड भी नहीं उठा सकते एक उगली पर ?

 

उनकी लीलाओं में तो श्रद्वा होनी चाहिए तो तर्क का विषय नहीं है । पर व्यक्ति को तर्क करने की आदत है कि ऐसा क्यों हुआ ? उनकी लीलाओं को तो कोई नही समझ सकता है । जो संत है वो हमें समझाते है कि प्रभु की लीलाओं का क्या आध्यात्मिक महत्व है । उनको मालूम होता है वो कभी तर्क नहीं करते है व्यक्ति जब उनके पास जाते है तो यही पूछते  है कि गुरू देव ऐसा क्यों हुआ ? संत बडे दुर्लभ होते है कभी भी जब हम संत के सामने जाते है तो हमें शांत बैठकर वो हमें क्या बता रहे है वो सुनना चाहिए पर हम ये नहीं करते है ।

 

प्रसंग ३ . - एक बार एक  गुरूदेव थे वो शिक्षा देते थे तो उनके यहाँ एक नया शिष्य आया वो आश्रम में आने ही वाला था लेकिन उसने सोचा कि ये मेरे गुरू बनने लायक है कि नही.

तो उसने कहा - कि गुरूदेव!  मै आपसे कुछ पूछना चाहता हू ।

तो गुरूदेव ने कहा-  कि पूछो!  

तो वो बोला - कि गुरूजी जीवन का उददेश्य क्या है ?

तो गुरूदेव ने कहा - मुझे नहीं मालूम !

तो फिर उसने पूछा - कि गुरूदेव !जीवन का अर्थ क्या है ?

तो फिर गुरूदेव ने कहा - कि मुझे नहीं मालूम

अब तीसरा प्रष्न पूंछा - कि गुरूदेव मृत्यु क्या है ?और मृत्यु के बाद भी क्या जीवन होता है ?

तब गुरूदेव ने कहा - कि बेटा मुझे ये भी नहीं मालूम

तो उसको लगा कि गुरूदेव को कुछ नहीं मालूम

 

और जो षिष्य ये सब सुन रहे थे उनमें से कुछ श्रद्धावान थे उन्हें पता था की मेरे गुरु क्या है . और कुछ नादान थे । तो उनको भी ये लगा कि ये क्या पढाऐंगे ?जब इतनी सी बात का उत्तर नहीं दे पाये ?इन्हें ही जब कुछ पता नहीं है ?

 

फिर गुरूदेव ने बोलना शुरू किया और कहा - कि बेटा ! तुम जीवन की प्रकृति और उसके अर्थो को जानकर क्या करोगे तुमने तो अभी जीना प्रांरभ ही नहीं किया । तुम क्या करोगे अर्थ जानकर तो ये तो वैसे ही हुआ कि थाली सामने रखी और खाने के बारें में ये बोले कि ये ऐसा हेागा , वैसा होगा.

 

तो गुरूदेव ने कहा - कि थाली में तर्क वितर्क करने से अच्छा है अटकले लगाने से तो अच्छा है कि हम उसको खाकर देख ले तो सब समझ में आ जाएगा. तो सारे शिष्यों की बात समझ में आ गयी पर वो शिष्य जा चुका था ।उसने वास्तव में तर्क वितर्क में गुरु का सही ज्ञान तो सुना ही नहीं .

 

तो गुरूदेव ने उसे पहली शिक्षा दी कि जब तुम वेद अध्ययन शुरू कर रहे हो । तो तर्क वितर्क से दूर रहना जब तुम इस जीवन मे आगे बढोगे तो तुम्हें एक अच्छी चीज मिलेगी वो है “अनुभव” जैसे खाने के बारे में सोच कर उसका पता नहीं लगाया जा सकता उसे चखना ही जरूरी है ।

 

ऐसे ही जीवन है । जब तक हम उसको जियेंगे नहीं हमें उसका अर्थ पता ही नहीं चलेगा ऐसे ही परमात्मा है हम उसके बारे में भी तर्क वितर्क करते रहते है । पर अगर हमें उसे जानना है तो जब तक हम अपने भीतर नहीं उतरेगे तो पता नहीं चलेगा कि क्यों भगवान ने ये लीलाए रची । हमसब के मन में प्रष्न उठते है पर जिस दिन हम अपने अंदर उतर कर उस परमात्मा का अनुभव कर लेंगे उसी दिन से मान लो सारे प्रष्नों के उत्तर मिल जाऐंगे.

 

लेकिन जब तक हम तर्क वितर्क करते रहेंगे तो कुछ नहीं होगा परमात्मा अनुभव की चीज है । ऐसा नहीं है कि आज किसी ने बताया और कल हमें पता चल गया ऐसा नहीं है । उसको जानने के लिए हमें अपने अंदर उतरना ही पडेगा

 

प्रसंग ४. - महाभारत में जब पांडवों को वनवास हुआ था और जब वन में उनको प्यास लगी थी और जब वो एक-एक करके जल लेने गए थे सरोवर का जल पीने के बाद वो एक-एक करके मरने लगे थे और जब अंत में युध्ष्ठिर गए तो यक्षराज प्रकट हो गए और कहा - कि जब तक मेंरे प्रष्नों का उत्तर नहीं दोगे तब तक तुम जल नहीं पियोगे.

तो उन्हेंनें कहा -  कि धर्म तर्क का विषय है क्या ? तो युध्ष्ठिर जी ने कहा - कि धर्म तर्क का विषय नहीं है । क्योंकि जितने भी संत हेांगे वो अपने अनुसार इसका अनुभव करते है ।

तब उन्हेांने पूछा - कि धर्म का भेद क्या है । तो युध्ष्ठिर जी ने कहा - कि धर्म केा व्यक्ति को अपने अंदर उतर कर देखना है । वहीं भेद है । ये तर्क की वस्तु नहीं है ।

तो कहने का मतलब है कि साधक को तर्क नहीं करना है ।  जब तक हम मंजिल तक नहीं पहुँच जाते किसी भी रास्ते को बुरा नहीं कह सकते है । लोग अपने धर्म केा तो श्रेष्ठ कहते है । पर दूसरे के धर्म केा नहीं है । पर वो शक्तिी तो एक ही है उसे केाई भगवान, अल्ला ,ईषु, कह देता है । वहीं गीता है वहीं कुरान है,  वही सिख्खो का धर्मग्रन्थ है , सब एक है पर पर धर्म को बाँटा हमनें है ।

 

जैसे सारी नंदियाँ अलग है कोई पहाड़ से गुजरकर जाती है कोई मैदान से जाती है पर वो जाकर मिलती समुद्र में ही है । मंजिल सबकी महासागर है । तो महासागर ही वो परमात्मा है भगवान ने तो ये सारे रास्ते बनाए है जिसको जो चुनना है चुन ले वो सारे उसके पास ही आकर खत्म होते है । सब नाम अलग है पर शक्ति एक है । और जब तक हम परमात्मा को जान नहीं लेते है हम तर्क नहीं कर सकते है ।

 

प्रसंग ५. - अगर हम शबरी जी के जीवन केा देखें तो जब सोलह वर्ष की थी तो वो मंतग ऋषि के आश्रम में वो रहती थी तो वो कहने लगे कि तुमने मेरी बड़ी सेवा की है मेरी तो आयु तो पुरी हो गई है  मैने तो अपने जीवन में भगवान के दर्षन नहीं किए पर तुम अपने जीवन में दर्षन जरूर करोगी भगवान के पर शबरी जी ने उनसे ये नहीं पूछा - कि भगवन कब आएगें? उनका सारी उमर बीत गई , बुढी हो गई.  अपने जीवन में तर्क नहीं किया. इतनी बुद्धि भी नहीं लगायी .

 

क्योंकि परमात्मा और गुरू तर्क का नहीं ये तो श्रद्वा का विषय है और उस गुरू की श्रद्वा का फल देखिए कि भगवान राम खुद उनका पता पूछते हुए उनके पास आए ये गुरू चरणों में श्रद्वा का फल है ।तर्क नहीं किया था उन्होंने.

 

प्रसंग ६. - वाल्मीकि जी को देखिए वो पहले चोरी किया करते थे और जब एक बार वो डकैती करने जा रहे थे तो रास्ते में नारद जी मिले तो उन्हेंने उनको पकड लिया.

 

तो नारद जी बोले - कि मेरे पास कुछ नहीं है । सिर्फ भगवान का नाम है यही दे सकता हूँ . पर वाल्मीकी जी नहीं मानेबोले तुम्हारे पास जरुर कुछ न कुछ जरुर होगा . तो नारद जी ने कहा - कि मै सब कुछ दे दूँगा पर पहले तुम ये बताओ कि तुम ये चोरी किसके लिए करते हो.

 

तो वो बोले-  कि मै परिवार के लिए करता हूँ, 

 

तो नारद जी कहते है - कि एक चोरी के कर्म का फल तुम्हारे परिवार वाले भी भोंगेंगे क्या ?

 

तो बोले - कि हां

 

तो नारद जी ने कहा-  कि जाओ तुम पहले जाकर अपने घर मे पूछ कर आओ तक तक मै यहाँ बधा हूँ   तो वो घर गए और पत्निी से पूछा-  कि क्या तुम मेरी चोरी के कर्मों का फल भी भोगोगी बच्चों से पूछा  तो सबने मना कर दिया कि हम नहीं भोगेगे वो तो आपको ही भोगना पडेगा जो कर्म करता है उसी को फल भोगना पडता है . तो वाल्मीकी जी लौटकर आए नारद जी को बोले की आप सही कह रहे थे . और पूछा कि अब क्या करू?

 

तो नारद जी ने कहा-  कि तुम राम नाम को जपो तो वाल्मीकी जी ने कहा- कि मुझे राम का नाम नहीं आता तो नारद जी ने कहा - कि तो तुम मरा मरा जपो तुमने लूट मार ही की तो जब वो मरा मरा कहते थे तो म हट जाता था और राम बन जाता 

 

तो वाल्मीकी जी ने ये नहीं पूछा कि मै कब तक मरा-मरा कहू । और मै ये क्यों कहू तो तर्क नहीं लगाया गुरू की वाणी में, तर्क नहीं लगाया तो वो परमात्मा गुरू मंत्र तर्क का विषय नहीं है ।

 

और सब जानते है कि आगें चलकर वाल्मीकी जी ने कितने बडे काव्य लिखे और फिर रामायण लिखी तो ये डाकू से संत का सफर उन्हेांने श्रद्धा से तय किया तो उस परमात्मा ने मिलने में एक पल भी नहीं लगाया क्योंकि मन साफ हो गया तो इसमें तर्क जैसे केाई नहीं है गुरू जो कह दिया वहीं ठीक है उसमं अपनी बुद्वि नहीं लगानी है । हर एक भक्त के जीवन के ऐसे उदाहरण है ।

 

क्योंकि ये कभी तर्क का विषय हो ही नहीं सकता हम तर्क करके जीत भी जाए कि ये सही और ये गलत तो इसका सार क्या है । हमारी श्रद्वा ही कम होगी उससे तो हमें कभी भी हो तर्क नहीं परमात्मा में श्रद्वा रखनी है । यहीं साधना के पथ में हमें आगें ले जाएगी सारे समाधान हमारे अंदर ही है । जैसे हम उस परमात्मा को जानेंगे वैसे सारे प्रष्नों के उत्तर मिल जाएगें. हमें कुछ भी करने की जरूरत नहीं सारे प्रष्नों के हल अपने आप ही मिल जाएगें ।                              

 

 “राधे-राधे”


 

 

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