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जन्म और मृत्यु

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आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम दो मिनिट के लिए भगवन नाम का कीर्तन करें

 

“राधे-गोपाला, गिरधर-गोपाला, गोपी गोपाला,प्यारो नंद लाला ......”

 

राधारानी जी के चरणों में केाटि केाटि वंदन

आज का हमारा सतसंग का विषय है ।  “जन्म और मृत्यु” जीवन का सबसे बडा सत्य है । “मृत्यु” हर व्यक्तिी को पता है कि उसे एक दिन मरना है । और इसे स्वीकार कोई नहीं करना चाहता । प्रत्येक व्यक्तिी परिवर्तन को मानता है । जैसे आज वो बच्चा है तो उसे पता है कि कल वो बडा हो जाएगा ।बड़ा हो जायेगा तो पता है कल मै बुढा हो जाऊँगा , ये क्या है ?  ये शरीर का परिवर्तन है । और हर कोई इसे स्वीकार करता है ।

 

बस आम आदमी औेर संत में एक फर्क होता है । हम शरीर कि अवस्थाओ के परिवर्तन को मानते है कि जो संत होते है वो अपनी आत्मा के परिवर्तन को देखते है और हम शरीर के योगीजन जैसे अपने इन अवस्थाओं को परिवर्तन मान लेते है । वैसे ही वो एक जन्म और दूसरे जन्म के परिवर्तन को मान लेते है  कि ये तो शरीर का परिवर्तन है कि एक शरीर से दूसरे में जाना वो उसको मौत की दृष्टिी से नहीं देखते है उनको मालूम है कि इसे दूसरा जन्म मिल जाएगा.

 

आज के विज्ञान में इन्द्रियों के् आनंद के लिए बहुत सारी चीजें है । बहुत वस्तुएँ है । पर आज तक विज्ञान ने कोई ऐसा यंत्र नहीं बनाया जो वृद्वावस्था, बीमारी, और मौत इन तीनों को रोक दे । और ऐसे साधन आ गए कि मौत और जल्दी आ जाए जैसे बिजली का प्रयोग से काम आसान हो जाता है । पर कंरेट से मौत भी हो जाती है । व्यक्ति हर एक चीज क तैयारी करता है पर कभी मरने की तैयारी नहीं करता है । और जिसने ये तैयारी नहीं की. उसका ये जन्म भी बिगडा और अगला जन्म भी क्योंकि मौत जब आएगी, उस समय आपका मन कहाँ है । वहीं आपका जन्म सुधारने वाला है  । आपकी मति कहाँ है उस वक्त.

 

जैसे एक विधार्थी है जो परीक्षा में है उसने तीन साल अच्छाई पढाई की औेर वो पास हो गया, क्योकि अच्छी पढाई की थी पढाई नहीं करता तो पास होता नहीं ? तो ऐसा ही हमारा मौत का काल है अपने जीवन में हमें उसकी तैयारी करनी है कि जब मृत्यु रुपी  परीक्षा में बैठने के लायक हम है कि नही तो हम कुछ भी नहीं करते है तो हम पास कैसे होंगे? जो संत जन है वो अपने जीवन में तैयारी करते है मृत्यु की परीक्षा की अब अगर हमनें पढाई ही नही तो हम सफल नहीं हो सकते है ।  अपने जीवन में हमनें तैयारी ही नहीं की तो मरने की केाई तैयारी नहीं करता तो व्यक्ति मरने के समय भी खुद को याद करता है । संत लोग अपनी मृत्यु को भी उत्सव बना लेते है मृत्यु भी एक उत्सव है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग १- जैसे राजा परीक्षित थे उनको श्राप था कि आज से सात दिन बाद तक्षक साप उनको डस लेगा तो आपकी मृत्यु हो जायेगी .तो डरे नहीं. उन्हेंनें अपने जीवन में मृत्यु का अभ्यास किया वो खुश हुए कि मुझे पता चल गया सात दिन पहले कि मै मरने वाला हू.और उन्होंने सोचा कि अब मुझे मृत्यु की तैयारी करनी है . तो वो राज पाठ छोडकर गंगा के किनारे गए औेर ऋषियों से पुछा - कि मरने के पहले क्या करना चाहिए? पर कोई उत्तर नहीं दे पाया  पर अ्रसल में हम देंखे तो ये प्रश्न हर व्यक्ति का है ।  और हर व्यक्ति को सात दिन ही मिलते है । आठवाँ दिन बना ही नही

 

तो परीक्षित जी ने शुकदेव जी से आत्म ज्ञान लिया शरीर से तो उन्हेंने विरक्ती कर ली. कि ये तो यहीं छूट जाना है पर आत्म ज्ञान के लिए क्या किया उसके लिए गंगा तट पर उन्हेंने शुकदेव जी से भागवत सुनी तो भागवत में क्या है ? नाम संकीर्तन की महिमा है । कि भगवान को याद कैसे करें ये शुकदेव जी ने बताया तो परीक्षित जी ने मरने की तैयारी कि और जब सातवाँ दिन आया तो तक्षक नाग ने तो केवल उनके शरीर बस को भस्म किया है । उसके पहले ही वो बह्रम में लीन हो गए थे. उनका शरीर ही बचा था । क्योकि उन्ह्कोने अभ्यास किया.

 

जब मृत्यु आती है तो ऐसी अवस्था होती है जैसे एक साथ सौ बिच्छू या सौ सर्प एक साथ काट रहे हो ऐसा लगता है. हम सब इस संसार में आसक्तिी मो से बंधे है कहीं ना कहीं मोह ने हमें बाँध रखा है । इसे छोडना नहीं चाहता तो आत्मा इसे खींच के यमदूत ले जाती है । नौ द्वार होते है शरीर के, एक में से ही आत्मा निकलती है । और हमारे बाल का जो अग्रभाग होता है उसके दस हजारवें भाग के बराबर हमारी आत्मा होती है । इतनी छोटी है ।पर उसकी शक्तिी बहुत है ।

 

तो संत कहते है जब मौत आती है तो भगवान का नाम निकलना चाहिए, मुहॅ से और उनका स्मरण रहना चाहिए  ये संतो ने बताया है हमें वो कैसे आए तो व्यक्ति का मोह शरीर से है और वो अपनों में ही पडा रहता है । जैसे कोई व्यक्तिी है उसके सिर पर किसी ने दस लाठी मारी तो कोई एक सह लेगा कोई दो और कोई दस में भी बेहोश नहीं होगा.तो सबकी अपनी अपनी सहनशीलता होती है  ऐसी मृत्यु के समय केाई लाठी मार रहा हो ऐसी बेहोशी की अवस्था आती है.

 

तो शरीर काम बंद होता है कर्म बंद हो जाते है दिमाक काम करना बंद कर देता है ,ये मरणासन्न व्यक्ति की अवस्था है । मन और बुद्धि ने भी काम करना बंद कर दिया तो ऐसे में स्मरण कैसे हो सकता है । मरते समय में भगवान का स्मरण होना जरूरी है । और अचानक में तो भगवान याद आएगें नहीं अगर हमनें शुरू से ही भगवान को भजा होता तो उस बेहोशी की अवस्था में भी भगवान याद आ सकते थे । नाम उनका हमारी जुबान पर आ सकता था. पर हमने कभी मरने की तेयारी ही नहीं बल्किमरते वक्त रिश्तेदारों को बुला लेते है लोग, और जो मरने वाला होता है उसको भगवान को याद नही  कराते रिश्ते गिना लगते है कि मै आपका पोता पोती हूँ । उसको वो रिश्ते ही याद कराते है जो जीवन भर याद किया उसने तो उसे वो ही याद आएगें,  और जिसको वो याद करे मरेगा वैसी ही उसकी गति हो जाएगी ।व्यक्ति की मरते समय जैसी मति होती है वैसी ही उसकी गति होती है.

 

प्रसंग २. - एक संत थे वो बडे ज्ञानी थे उनके आश्रम में बहुत शिष्य थे तो एक बार उन्हेंने एक शिष्य को बुलाया और कहा कि तुम मेरे प्रिय शिष्य हो मै तो मरने वाला हॅू. तुम्हें एक शक्तिी देकर जा रहा हूँ तुम जब आँख बंद करों और तुम्हें यदि नाद सुनाई दे, घंटा ध्वनि सुनाई दे. तो समझना मेरी मुक्तिी हो गई और नही तो समझना मै यहीं संसार में अटक गया हूँ ।

 

तो शिष्य ने कहा-  कि ठीक है । तो एक दिन वो बिस्तर पर पडे थे पर वो शिष्य नहीं था । बांकी के शिष्य उन्हें घेर कर खड़े हो गए. तो वोएक शिष्य से बोले  - कि मुझे केला खाना है । तो वो मरने वाले है. पर मन कहा लगा है. जिन्होंने जीवन भर भगवान का नाम लिया पर मरने के समय उनका ध्यान नहीं आया हम तो यत्न भी नहीं करते है. आश्रम के आगन में केले का पेड़ लगा था .

 

तो वो शिष्य कहते है - कि गुरुदेव! हम अभी आँगन से ला के दे रहे है । तो वो जब लेने गया तो तभी गुरूदेव चले गए उपर. तो वो शिष्य आया जिसको उन्हेंने ये ज्ञान दिया था तो उसने देख कि गुरूदेव तो मर गए है । अब उसको वो बात याद आई तो उसने आख बंद की तो उसे कुछ भी नहीं सुनाई दिया. तो वो समझ गया कि गुरूदेव की मुक्तिी नहीं हुई । तो कहता - कि गुरूदेव कहाँ गए ? फिर तो वो सबसे पूछता है कि अंतिम समय में गुरूदेव के पास कौन था?

 

तो सभी शिष्य बोले - कि हम थे. वो कहता है कि उनकी अंतिम इच्छा क्या थी ? शिष्य ने कहा – कि उनकी इच्छा केला खाने की थी तो मै लेने गया था पर जब तक मै लेकर आया तब तक वो मर ही गए. तो वो ज्ञानी शिष्य बोला - कि मुझै पता कि गुरूदेव कहाँ गए? तो सबको लेकर आँगन में गया और उसने एक केला तोडा उसको छीला और उसको तोडकर देखा कि एक कीडा है उसमें.

 

तो उसने कहा - कि ये गुरूदेव है . तो सब ने कहा - कि कैसे ? तो वो बोला - कि मुक्तिी हमारी आत्मा की नहीं बल्कि हमारे शरीर की होती है । मन की होती है । ये जहाँ होगा वो ही उसकी गति होगी तो गुरूदेव का मन केले में अटका था तो मरते समय हमें देखना कि हम किसे याद कर रह है । हम तो मरते वक्त भी अपनों को याद करते है । पर हमें भगवान को स्मरण करना है नाम तो लेना ही पर उसके साथ मन में भगवान का स्मरण करना है ।क्योकि मन जब तक स्मरण नहीं करेगा तब तक बात बनने नहीं है .

 

और व्यक्ति जब मर जाता है । श्मशान की यात्रा में व्यक्ति कहते है कि अच्छा आदमी था भगवान उसको सदगति दे । भगवान ऊपर से हॅसते है कि अब तुम्हारी बारी है । मरघट में मटकी क्यों फोडी जाती है । क्योंकि व्यक्ति अपने पाप को खुद तो निकाला नही तो दूसरे ही उसके पाप की मटकी को तोड देते है । उसने जीवन भर यहीं किया और सिखाया भी यहीं.

 

"बचपन में सिखाया धराधाम सत्य है । जवानी में सिखाया अर्थ काम सत्य है ।

  जब पिंजरे से प्राण उड गए तो लेागों ने कहा कि राम नाम सत्य है”

 

तो अब मरने के बाद ये कहने से क्या फायदा है । कि राम नाम सत्य है. राम का नाम तो वैसे भी सत्य है. पर जीते जीव्यक्ति से कहो कि राम का नाम सत्य है  तो मरने के बाद क्येां बोलते है  तो हमें अपने जीवन काल में ही उसका अभ्यास करना है ।तो आदत बन जाती है.

 

जैसे एक व्यक्ति है उसको चाय की आदत है अगर वो नहीं पीता तो उसको लगता है कि चाय नहीं पी तो सिर दर्द हो रहा है. हमने चाय नहीं पी तो अच्छा नहीं लग रहा, जन्म से ही तो चाय पीने कि आदत तो हुई नहीं , जब हम बड़े हुए एक बार पी, दो बार फिर आदत हो गई । एक दम से तो नहीं हुई तो इसी प्रकार की आदत हमें एकदम से नहीं होगी हमें अभ्यास करना होगा इसलिए संत कहते है   नाम और स्मरण करते रहो ताकि अंत समय तक याद रहे

 

 

प्रसंग ३- जैसे एक व्यक्ति बूढा है उसके कमरे में लालटेन जल रही है तो वो अपने बेटे से कहता है कि इसे बंद कर दो हम भी जब सोते है तो लाइट बंद कर देते है हम सोने की तैयारी करते है । हल्ला नहीं हो । हम हल्ला बंद करवा देते है । ये हर व्यक्ति करता है तो जैसे हमारी उम्र जा रही है तो हमे तैयारी करनी है जैसे वो बाबा लालटेन कम करवा रहा है ऐस ही हमें अपनी चींजे कम करना है ।कौन सी चीजों को काम करना है ? ये जो मोह हमनें बाँध रखा है उसे कम करना है । ये जो आसक्तिी हमनें खानें पीने में लगा रखी है उसे कम करना है । उस लौ को हमें कम करना है । और अगर ये हम कम नहीं करेंगे तो मृत्यु अच्छी नहीं होगी और फिर हमारा अगला जन्म बिगड जाएगा । तो सबको कम करना है

 

व्यक्ति को दो चीजे ही याद रखनी है एक भगवान का नाम और दूसरा स्मरण तो स्मरण बहुत जरूरी है और बुढापा आते ही सब चीजों को कम करना एक दम नहीं जाएंगी. पर धीरे धीरे अभ्यास से. आग लग जाने के बाद कुआ खोदने से क्या फायदा. ऐसे ही अगर हमनें जीवन भर भगवान का नाम नहीं लिया तो अंत समय में क्या फायदा व्यक्ति हर चीज से भाग सकता है पर अपनी मृत्यु से नहीं वो तो अटल है । एक दिन सबकी आनी है । परीक्षित केा सात दिन पहले ही पता चल गया था पर हमें वो भी नहीं पता चलेगा तो जिसने अपनी मृत्यु सुधार ली. उसने अपनी जीवन सुधार लिया. संत लोग दूसरों से क्यों भगवान का नाम लेने केा कीर्तन करने का बोलते है क्योंकि वो चाहते है हम तो अपनी मृत्यु को सुधार ही रहे है तुम भी भगवान का स्मरण करके अपनी मृत्यु को सुधार लो । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

“राधे राधे ”


 

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