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वाणी

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आइए आज का सत्संग शुरू करने से पहले कुछ पलों के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये ......

“राधे-राधे-राधे, राधे गोविंदा , श्री राधे-गोविंद भजो, राधे-गोंविदा.....”

श्री बाँके बिहारी जी और राधारानी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है – “वाणी” तो वाणी का मतलब है “बोल”. जो हम बोलते है और ये एक कर्म है. अगर हम देखें तो कर्म को तीन भागों में बाँटा गया है - मनसा वचासा कर्माणा, अगर हम शांत बैठे है तो हमारे मन में कुछ चल रहा होता है तो वास्तव में वो हमारा “मानसिक कर्म” है । अगर हम मन में कुछ नहीं सोच रहे है, और कुछ कर भी नहीं रहे है, तो बोल रहे हे तो वो भी “वाचक कर्म” है । और अगर हम मन से भी कुछ नहीं सोच रहे है, और बोल भी नहीं रहे है तो वो हमारा “क्रियात्मक कर्म” होगा. कर्म को तीन भागों में बाँटा गया है और तीनों महत्वपूर्ण है. व्यक्ति द्वारा किया गया हर कर्म, तीनो कर्म हर पल लिखे जाते है.


हम कहते है कि हमारी तो किस्मत ही ऐसी है, हम तो यहीं लिखवा के आए है, हम ये गलत सोचते है । ये जो हम कर्म करते है उसी का परिणाम हमारे हाथ की रेखाएँ है । ये जो हमारी कुंडली है वो परमात्मा ने नहीं हमने खुद ही लिखी है । कैसे ? पिछले जन्म के कर्मों से हमने  जो मन से वाणी से किए थे उसी के अनुसार हमारा ये जन्म हुआ हम जो आज है वो कल का परिणाम है. और जो हम आज करेंगे वो आने वाले कल का नक्षा बना रहे है । अपने भाग्य की रेखाएँ हम अपने कर्मों से खुद ही लिखते है ।



तो कहने का अभिप्राय है की तो वाणी से हम खुद का जीवन तो बदलते ही है साथ में दूसरे का भी उबदल सकते है । असतुंलित वाणी  आनंद के अवसरों को खो देती है इसलिए वाणी संतुलित होनी चाहिए । तुलसी दास जी ने कहा है – “कि तुलसी मीठे वचन से, सुख उपजत चहूँ ओर, और वशी करण एक मंत्र है तज दे वचन कठोर”



जहाँ व्यक्ति को बोलना चाहिए वहाँ तो वो बोलता नहीं है और जहाँ नहीं बोलना चाहिए वहाँ वो बोलता है एक संतुलित वाणी जीवन में होना चाहिए-  कब, कहाँ और कितना बोलना है . ये हमें आबजरव करना है क्योंकि जो हमारी वाणी है वो यर्थाथ को बदलने की भी शक्ति रखती है । इसलिए अपने शब्दों मन के तराजू में तौलो फिर वाणी में उसको बाहर निकालो । वाणी में बहुत ताकत है ।



प्रसंग १. - एक बार एक जंगल था उसमें बहुत सारे मेढक रास्ता पार कर रहे थे, तो वो उछल-उछल कर एक-एक रास्ता पार कर रहे थे। अब उन्हेांनें देखा नहीं है कि आगें गढढा है तो बहुत सारे तो पार कर गए. पर दो मेढक उस गढढे में गिर गए. तो वो परेषान कि वो उसमें छलांग तो लगाते पर उसे पार  नहीं कर पा रहे थे, तो उनके उपर से बहुत सारे मेढक गढढा पार करते जा रहे थे । तो उनमें से कुछ मेंढक बोले - कि छलागं लगाने से कोई फायदा नहीं है जीवन भर भी प्रयत्न करते रहोगे तो भी पार नहीं कर सकोगे. यहीं करने से तो अच्छा है कि मर जाओ. तुम इस गढढे से नहीं निकल पाओगे.



तो जो दो मेढक थे जब उन्हेांने ऐसा सुना कि उपर वाले मेंढक तो ऐसा कह रहे है तो एक मेंढक कहता है कि मेरे में इतनी शक्तिी नहीं है कि मै इसे पार कर पाउँ मेरी उम्र निकल जाएगी वो मेढक इतना निराष हो गया  कि उसकी मृत्यु हो गई. और दूसरा उछलता रहा और एक समय बाद वो बाहर आ गया तो ये वाणी का असर है एक मेंढक ने दूसरों की वाणी को सत्य मान लिया, कि वो कभी भी गढढे से नही निकल पाएगा. और वो मर गया. पर दूसरा मेंढक प्रयास करता रहा और वो अतं में बाहर आ गया उसने वाणी नहीं सुनी. क्योंकि वो बहरा था उसें किसी की आवाज ही नहीं सुनाई दी. अगर वो भी सुनता  तो वो भी नहीं निकल पाता ओर मर जाता है. हम कहते है कि भगवान जो करता है वो अच्छे के लिए करता है  अगर भगवान ने उसको कान दिए होते, तो वो दूसरों की निराशा भरी बातें सुनता ओर प्रयास ही नहीं करता बाहर निकलने का और मर जाता प्रेम से कहिए श्री राधे


तो ये वाणी किसी का भी जीवन बदल सकती है । जबान में जिदंगी और मौत की ताकत होती है । एक शब्द हौसला बढाने वाला होता है वो जीवन को उठा सकता है । और एक निराषा भरा शब्द व्यक्ति को मौत के पास भी ले जा सकता है । इतनी पावरफुल है हमारी वाणी है । संत  कह गए है कि तौल तौल कर छान कर, शब्दों को बोलो.  जैसे हम पानी पीते है तो उसे छानते है क्यों ? क्योकि हम गंदा पानी पिऐंगें तो बीमार हो जाएगे.  यहीं वाणी के साथ है, हमनें अगर अपनी वाणी को नहीं छाना तो याद  रखना ये जो शब्द है वो परिक्रमा करते है और वापिस हमारे पास ही आ जाते है । और उन शब्दों की बहुत मार पड़ती है.  



इसलिए वाणी अनमोल है ये जो जीभ है बहुत कोमल है । बत्तीस दातों के बीच घिरी है । पर इन दातों को तुडवाने उकी शक्तिी रखती है । तो ये जीभ की ताकत है कि वो दातों को तुडवा सकती है ।



प्रसंग २- एक संत थे उनका आश्रम था वो अपने आश्रम में शिष्यों को ज्ञान देते थे और शिष्य उनकी बातों पर अमल करते थे तो गुरू बहुत खुश रहते थे । अब एक बार की बात है जब गुरू बूढे हो गए तो उनको लगा कि अब उनका अंतिम समय आ गया तो आश्रम के सारे शिष्यों को बुलाया.


तो गुरू ने कहा - कि मेरी बात का जवाब देना.

तो सभी ने कहा – हा.

तो गुरूदेव ने कहा - कि मेंरे मुहॅ में कितने दात है ?

तो सभी शिष्यों ने कहा - कि एक भी नहीं .

अब गुरू ने कहा -
बिलकुल सही, मेरी जीभ कैसी है, तो सब ने कहा - कि वो तो सही है बिलकुल वैसी है तो गुरूदेव ने कहा - कि ये जीभ तुम्हें शिक्षा दे रही है कि मै जब पैदां हुआ था  तब ये दांत नहीं थे पर ये जीभ थी, और आज मैं मर रहा हूॅ, तो भी ये जीभ ही है मेरे दांत नहीं है । 



कहने का अभ्रिपाय ये है कि जीभ कोमल है उसने अपनी मधुरता नहीं छोडी. दांत जब पैदा हुए थे तो कठारे थे और कठोरता के कारण ज्यादा नहीं चल सके और आज ये नहीं है । तो तुम जीभ से मधुर रहोगे तो तुम्हारी उम्र लंबी होगी और दांतो के जैसे कठोर रहोगे, तो तुम्हारी उम्र कम हो जाएगी. तुम जल्दी आओगे और चले जाओगे ,  



कहने का तात्पर्य ये जीभ भगवान ने इसलिए दी है कि हम अच्छे बोल आशीर्वाद दे, मधुरता से बात करके जीवन में ये याद रखें कि हम बुरा बोंलेगें तो जीवन बिगाड सकते है, इससे अच्छा मधुर बोलकर किसी के चेहरे पर मुस्कान ने आए । किसी एक का भी जीवन सुधार सकें. तो कहा कितना बोलना है ये बहुत जरूरी है । सिर्फ बोलने से ही सबकुछ नहीं होता है मौन भी जरूरी है और समय आने पर बोलना भी आवश्यक है.दोनों ही जरुरी है .  



कोई अगर खूबसुरत है, धनवान है, ताकतवर हो, तो सारे लोग उसकी ओर आकर्षित हो जाएगें पर ये सब चीजें होने के बाद भी अगर व्यक्ति श्रेष्ठ हो ये जरूरी नहीं है? एक गुण बहुत जरूरी है वो है “वाणी’ हम देखते है कि अगर हम किसी के यहाँ जाते है ओर वो अच्छे से बात नहीं करता है तो हम कहते है कि हम उसके पास कभी नहीं जाएंगे वो तो सीधे मुह बात भी नहीं करता उसके पास वाणी नहीं है तो ये वाणी कीमती है प्रेम से कहिए श्री राधे


प्रसंग ३-  एक बार एक औरत थी उसका एक बच्चा था जो बहुत बीमार था तो उसने सबसे इलाज करवाया पर कुछ नहीं हुआ कोई भी उसे ठीक नहीं कर पाया, वो हर वैध के पास गई, पर कोई उसके बच्चे को ठीक नहीं कर पाया. तो उसके गाँव के पास एक संत थे तो उस औरत ने सोचा कि शायद जो काम दवा न कर सकी दुआ कर देगी. तो वो उनके पास अपने बच्चे को लेकर गई । फकीर से बोली कि आप मेरे बच्चे को ठीक कर दो?



फकीर बड़े अच्छे थे मरदू भाषी थे तो वो बोला – कि माता मै कोषिश् करता हूँ, तो वो गाँव में बच्चे को लेकर गया और गोदी में लेकर बैठ गया तो सारे गाॅव वाले आ गए तो उनमें से एक व्यक्ति बोला कि क्या तुम्हें यकीन है कि तुम इसे ठीक कर दोगे.



तो फकीर बोला - कि तुम बहुत मूर्ख हो तुम्हें ये सब चीजें नहीं मालूम.



तो जब उसने ऐसा बोला तो व्यक्ति गुस्सा से लाल हो गया और संत को कुछ बोलने ही बाला था की संत उसके पास आए, और बोले-  कि देखो बेटा ! मेरे एक शब्द ने तुम्हें इतना क्रोध में ला दिया, तो क्या दूसरे शब्द से तुम शांत नहीं हो जाओंगे. देखो मैंने एक शब्द कहा की तुम मुर्ख हो. तो ये एक शब्द तुम्हे चुभ गया. अगर तुम्हे गुस्से में आ गए तो दूसरा शब्द तुम्हे शांत नहीं कर सकता. इन दो शब्दों में उन संत ने इतनी बड़ी बात कह दी, कि उस व्यक्ति को सब समझ में आ गया, और प्रार्थना खत्म होते ही वो बच्चा ठीक हो गया.



उस दिन संत ने एक बीमार को स्वस्थ नहीं किया, दो बीमारों को ठीक किया. एक उस बच्चे को और एक उस व्यक्ति कोजिसकी वाणी मधुर नहीं थी. वो अपनी वाणी से बीमार था. वास्तव में संत ये कहना चाहते है कि मै जब उस परमात्मा से प्रार्थना करूगाँ तो मेरी वाणी क्यों नहीं सुनेगा जब मै उससे दीन भाव से प्रार्थना करुगा ,जब तुम जैसा इंसान मेरी वाणी से गुस्सा और शांत हो सकते है,तब वो परमात्मा क्यों नहीं सुनेगा.



पहले अपनी वाणी में वो ताकत, वो मधुरता तो लाओ,कि हम जो भी कहे वो परमात्मा उसके सुन ले । पर हम अगर दुआएँ करते है तो अपने लिए मागॅते कुछ अपनी वाणी का प्रयोग करते है तो अपने लिए पर इस वाणी का प्रयोग यंत्र समझकर करो. अपने शब्द लोगो की प्रसन्नता के लिए करो, दूरों को माफ करने के लिए करो, एक वाणी हमें सबका प्रिय बना देगी और एक वाणी हमें सबका दुष्मन बना देगी.  


महाभारत में तो हर एक पल में एक उदाहरण मिलता है । द्रोपदी की एक वाणी ही महाभारत का कारण बनी थी दोपदी ने कहा था दुर्योधन जब पानी में गिर गया था तो द्रोपदी ने कहा था कि अंधे का पुत्र अंधा ओर उनके ये दो बोल उसे चुभ गए ओर उसे इस कदर लगे कि वो दो शब्द ही महाभारत का कारण बने. शायद पांडव उसको माफ कर देते, पर दुर्योधन ने किसी का आदर ही नहीं किया उसने अपने पिता, भीष्म पितामह, किसी का भी आदर नहीं किया. जब उसने किसी का आदर ही नहीं किया तो वो वाणी ही महाभारत का कारण बनी. तो वाणी का हमें उपयोग अच्छे से करना है.


ओर जो कम शब्द की वाणी होती है । वो हमारे व्यक्तित्व को सुगधित कर देती है तो बोल बडे अनमोल है इन्हें सम्हाल कर रखना है । क्योंकि बोलने से, ना बोलना बेहतर है और सच बोलना चाहिये वो मोन से अच्छा है. कि हम सच बोलें अब देखिए कि हमने यहा दो चीजें देखी कि बोलने से ना बोलना कब बेहतर है जब झगडा हो रहा है और दो में से कोई एक ना बोले तो झगडा अपने आप खत्म हो जाएगा. और दूसरे में जहा मौन उसे अच्छा है सच बोलना जैसे द्रोपदी का जब भरी सभा में चीरहरण हुआ था तो उस सभा में कोई नहीं बोला था सिर्फ एक महात्मा विदुर ही थे जो उस सभा में बोले थे और उन्होने ये कहा था कि मै चुप नहीं रहूगाँ. तो दो परिस्थ्तिी पर निर्भर करते है कि कब और कहाँ क्या और कितना बोलना है । बस यहीं हमें देखना है कि हमें कब और कितना बोलना है ।

                                                             
                                                                  “राधे-राधे”

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