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दो पहलू

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आईये आज का सत्संग शुरू करने से पहले हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये

“राधे-राधे-राधे, गोविंद-राधे, गोपाल-राधे,”.......  

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है “दो पहलू”, दुनिया मे हर चीज के दो पहलू होते है एक को हम देख सकते है । और दूसरे पहलू को हम नहीं देख पाते जैसे एक सिक्का होता है । उसके दो भाग होते है एक हेड और एक टेल. तो हम हेड को देखेंगे तो टेल को नही देख पाएगें, इसी तरह टेल को देखेंगे तो हेड को नहीं देख पाएगे. हर चीज के दो पक्ष होते है बहुत-सी जगह तो हमें मालूम है । कि इसके दो पक्ष है , पर हम कभी-कभी हम जानकर भी नहीं देखते, और कभी अनजाने में ही भूल जाते है । इस संसार में आध्यात्म में बस यहीं फर्क ये ही दोनों पक्ष है । तो हम संसार का पक्ष ज्यादा देखते है । और आध्यात्म का कम या देखते ही नहीं है । लेकिन जिन्हें बाहर की दुनिया अपने हिसाब से चलानी हो उसे भीतर की दुनिया अपने हिसाब से चलानी आनी चाहिये,   

 

जो लोग दोनों पक्ष में सतुंलन पर रख पाते है वो ही शांति को पा पाते है । और जो एक पक्ष को ही देखते है,और उसी पर चलते है उनके जीवन में कभी शांति नहीं आ पाती क्योंकि वो दूसरे पक्ष को तो देखते ही नहीं, इस दुनिया में भगवान ने जितनी चीजें बनाई है । उनका अपने आप में मूल्य है । अपने आप में वो कीमती है जैसे वो परमात्मा अनमोल है । पर व्यक्ति संसार में एक ही पक्ष की ओर भागता है । दूसरा देखता ही नहीं. एक पक्ष से काम चलाना बहुत ही खतरनाक है इसलिए दोनों पक्षों में संतुलन रखना जरूरी है. जैसे मान लो मन एक ही चीज के पीछे दौडता है ।क्योकि सारा ताल्लुक मन से है.  तो ये मन बहुत ही महत्वपूर्ण है । और जिन्हें शांति पानी है । उसे अपना परिचय मन से करवाना होगा. और वो कब होगा जब हम बाहर से अंदर की ओर आएगें. व्यक्ति को बाहर वाला ही पक्ष दिख रहा है तो इस मन को जानने के लिए हमें भीतर आना पडेगा. ये मन दोनों पक्षों में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है,

 

“कबीरा मन मरकट भया, नेक न कहू ठहराए, राम नाम बाधे बिना जित भावे तित जाए,”

 

ये मन इतना चंचल है, इसको राम नाम रूपी डोर से ना बाधा जाए, तो संसार की ओर भागेगा सुख सुविधाओं की ओर, तो ये मन क्या करेगा जब हम खुद ही अंदर की ओर नहीं आ रहे, तो हम कैसे जानेगे कि मन कहा जा रहा है । और आध्यात्म पक्ष को तो ये देख ही नहीं पाएगा. तो हमें अगर जीवन में शांति में पानी है । तो हमें अपने मन का परिचय जानना है और उसके बाद इन दोनों से उसका परिचय कराना है । वास्तव में इन दोनों का संतुलन बहुत जरूरी है ।

 

किसी एक का सतुंलन से ये आगें नहीं बड सकता जैसे ये मन ‘लोभ’ पर टिके तो इसका परिचय हमें ‘त्याग’ से कराना चाहिए जब हमारा मन लालच में लगा रहता है । तो हमें लोभ का दूसरा पक्ष से परिचय कराना है वो है त्याग ।

 

प्रसंग १.- एक भिखारी  था तो वो रोज मागने निकलता था तो ऐसी मान्यता थी कि वो अपनी झोली खाली नहीं रखता था उसमें कुछ न कुछ डाल लेता था । तो वो रोज जौ के दाने अपनी झोली में डाल लेता था, तो वो एक दिन ऐसी अपने घर से निकला. तो वो सोचता है कि- हे भगवान! आज एक ही घर से अच्छा मुझे खाना मिल जाए तो भटकना नहीं पडेगा, मेरी मेहनत बच जाएगी, तो तभी राजा की सवारी आ रही थी तो वो खुश हो गया कि आज मुझे राजा इतना दे देगे कि सारी उम्र भर मागना नहीं पडेगा.

 

भविष्य की कल्पना करने लगा फिर वो रास्ते में खडा हो गया जैसे ही राजा उसके पास आया तो उसने अपनी झोली फैलाई और मागने लगा राजा अपने रथ से उतरा वो घुटने टेक भिखारी के सामने अपनी मखमल की झोली फैला दी. तो उसकी समझ में नहीं आया,की भिखारी तो में हूँ ये राजा क्यों मुझसे माँग रहा है,  तो उसने अपनी झोली में से दो दाने जौ के निकाले और राजा को दे दिए. अब राजा ने दो दाने देखे तो वो खुश हुए और वहा से चला गया. तो भिखारी दुखी हुआ कि राजा तो मुझसे ही ले गया और जब वो रात को अपनी झोली खोलता है तो उसमें दो दानें सोनें के हो गए फिर भी वो नहीं समझा कि ये क्या हो गया, उसे सुबह वाली बात याद आई कि ये दाने राजा को दिए थे तो पछताया कि अगर राजा को पूरे दाने दे दिए होते तो सभी सोने के हो गए होते.पर मेने तो त्याग ही नहीं किया  प्रेम से कहिए श्री राधे

 

कहने का मतलब जीवन में कुछ दिया ही नहीं लेने का लोभ है, उसने जीवन में पहली बार दिया और दो दाने पर उसनें पहली बार देनेंका महत्व जाना त्याग का महत्व जाना और अगर मैने हर रोज लेने की जगह देना सीखा होता तो मै आज करोडपति हो गया होता आज ही के दिन मे दो दाने देनें मे इतना सोना आ गया अगर हर रोज दिया होता तो मै अमीर बन गया होता, लोभ की जगह त्याग को समझा होता.

 

अगर हमारा मन लोभ में जाये तो इसका परिचय इसके दूसरे पहलू त्याग से करा देना चाहिए. लोभ का दूसरा पहलू त्याग. लेने की जगह मन को देनें का पक्ष दिखाना. जिस चीज पर ये मन टिके तो तुरंत इसका दूसरा पहलू दिखा देना चाहिए. जैसे व्यक्ति जो है वो एक जगह नहीं चल सकता है इस बह्रंमाड में दो चीजें ही है एक आध्यात्म और दूसरा संसार. भगवान ने तीसरी चीज नहीं बनाई है । जब हम संसार मे होते है तो आध्यात्म में नहीं, और जब आध्यात्म में होते है । हमारा मन भगवान में लगा होता है उन क्षणों में हम संसार से दूर रहते है. पर हम ज्यादा समय हम संसार में बिताते है । बहुत से लोग सिर्फ संसार में ही रहते है । आध्यात्म और भगवान की तरफ तो जाते ही नहीं है । पर ये याद रखना है कि मन को एक पक्ष में लगा दोगे तो शांति नहीं आएगी जीवन में उसमें सतुंलन बनाना बहुत जरूरी है ।

 

एक पलडा भारी होगा तो दूसरा अपने आप उपर चला जाएगा ये हम सब को मालूम है । ये प्रकृति का नियम है । हम संसार वाला पहलू भारी करते जा रहे है । आध्यात्म वाला पहलू हल्का करते जा रहे है । हमें संसार मे अपने कर्तव्य करना है, ऐसा नहीं कि हम आध्यात्म में पूरी तरह चले जाये . क्योंकि व्यक्ति अगर आध्यात्म मे चला जाए जब तक वो सतुंलन नहीं बनाएगा आध्यात्म में और संसार में देानों में संतुलन आ जाए फिर तो व्यक्ति आध्यात्म की ओर ही बढेगा, वो संसार की ओर नहीं फिर अगर आध्यात्म का पलडा भारी होगा. तो कोई बात नहीं पर अगर वो शुरूआत में ही सोचे कि आध्यात्म में जाएगे तो भी गलत है, एकदम से संसार को छोड दे तो उसका पतन हो जाएगा उसे साधना से गुजरना ही पडेगा.

 

कोई व्यक्ति अगर ये कहे कि मै तो वैरागी हू । मुझे संसार शादी, मोह से कोई मतलब नही तो ये तो वहीं बात है कभी रसगुल्ला खाया नहीं और कह दिया कि मैने तो छोड दिया उसका स्वाद कभी चखा नहीं और छोड दिया बात तब है कि वो रसगुल्ला खाए उसका स्वाद ले फिर उसको छोडे पर जिसको खाने ही नहीं मिला वो क्या जाने उसका स्वाद वो तो कहेगा कि मै तो खाता ही नहीं हॅ. तो असल बात तो वहीं है कि वो संसार में रहकर कर्तव्यों को निभाते हुए आध्यात्म के पलडे को संतुलित रखे तब बात है । हम इतना संसार में न खोए कि आध्यात्म केा भूल जाए और आध्यात्म में इतना न डूबें कि संसार की कोई चीज ही ना देख पाए हमे दोनों मे सतुंलन बनाना है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग २.- प्रहलाद जी बचपन से भगवान के भक्त थे संसार से उनको वैराग्य था उनको भगवान से ही काम था और उन्ही का नाम लेते रहते थे । भगवान ने उन्हें छोटी सी आयु में दर्शन दिए थे तो जब उनको भक्तिी मिल गई तो वो बडे होकर कहने लगे - कि मै संसार मे नहीं आएगा मै शादी नहीं करॅगा तो सबने उनको समझाया कि माना तुम्हें भगवान ने दर्शन दिए है । पर संसार में रहकर तुम्हें ये पहलू को भी अपनाना है, तब प्रहलाद जी ने शादी की और अपनी ग्रहस्थ की बागडोर सम्हाली और एक उम्र तक राज किया फिर एक समय बाद राज्य अपने बेटे को देकर भक्ति में लग गए.

 

तो कहने का मतलब एक चीज में नहीं लगना है । बहुत भक्त हुए, संत हुए, ऐसा किसी ने नहीं किया के वैरागी हो गए दोनों में सतुंलन बनाया. और दोनों को बराबर रखना बहुत  जरूरी है । जब-जब ये मन संसार की ओर जाए तो आध्यात्म का पहलू दिखा दो, लोभ पर जाए तो त्याग का पहलू दिखा दो. इसी प्रकार जब ये मन ‘क्रोध’ पर जाए तो हमें इसका परिचय ‘क्षमा’ दया से कराना है. व्यक्ति के मन जब विचार आते है तो कामनाॅ होती है । और जब कामना पूरी नहीं होती तो क्रोध की ओर मन भागता है । वो हम किस पर निकालते है व्यक्ति पर वस्तु पर, जो जब हम क्रोध आए तो दूसरे पहलू क्षमा दया से मन का परिचय करा देना है प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग ३.- जैसे एक जंगल था उसमें गाय थी वो विरक्त थी संसार से अलग थी तो वन में बंदर उसे परेशान करता था उसकी पूछ पकड लेता नोंच लेता पर वो गाय कोई जवाब नहीं देती थी वो चुप रहती थी एक दिन उस बंदर ने उस गाय को काटा तो उसे खून निकलने लगा. पर उसने कुछ नही कहा तो उपर ये देववाणी हुई कि तुम कितनी सहनशील हो वो बंदर तुम्हें रोज परेशान करता है पर तुम उसे कुछ नहीं कहती तुम कहो, तो मै उसे मार डालू क्योंकि वास्तव में उसमे सहनशीलता बहुत थी वो एक संत बन गई थी संत में क्षमा होती है

 

तो गाय ने कहा-  कि जो अपने से जो बलवान है वो चाहे क्रोध करे या कुछ भी करे हम उसका कुछ भी नहीं कर पाते तो अपने से बलवान को हर कोई क्षमा कर सकता है । पर अपने से जो निर्बल है उसको क्षमा करना बडी बात है उसको तो मार भी सकते है । मै इस बंदर पर कभी क्रोध नहीं करती हॅू । चाहू तो इसे मार भी सकती हू । क्रोध ही सबकुछ नहीं होता क्षमा करना सबसे बडा होता है ।  भगवान प्रसन्न हुए है कि तुम महान हो मै तुम्हारी परीक्षा ले रहा था तुमने हर बार उसे क्षमा किया तो जब हमारा मन क्रोध की ओर जाए तो इसके दूसरे पक्ष क्षमा दया से इसका परिचय करा देना है । ये मन तो भागता ही रहता है । हमें निरीक्षण करना है कि ये मन कहाँ जा रहा है ये क्रोध की ओर जाए तो क्षमा से लोभ की ओर जाए तो त्याग से संसार की ओर जाए तो आध्यात्म से इसका परिचय करा देना है । पर हमे इन दोंनों में सतुंलन बनाना है मन अगर लोभ मे ही टिका है तो वो लोभ उसका विनाश कर देगा अगर मन केवल क्रोध में रहेगा क्षमा में नहीं जाएगा तो वो उसका विनाश कर देगा अगर मन संसार में ही टिका रहेगा. आध्यात्म मे नहीं जाएगा.  वो संसार  की वासनाए उसका अंत कर देगी तो दोनों पहलू काम के है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

इसी तरह जन्म और मृत्यु दो पहलू है । मौत से हर व्यक्ति डरता है । जब ‘जन्म’ है तो मन का परिचय ‘मृत्यु’ से भी कराना है । कहने का तात्पर्य ये है कि जब व्यक्ति मृत्यु को जान लेगा तो वो उसे डरेगा नहीं ये जन्म क्या है । जन्म तभी सार्थक होगा जब सही जिया जाएगा और जब जीवन को ठीक से समझ लिया जाएगा तो मृत्यु अपने आप समझ आ जाएगी जैसे एक बीज होता है । जब तक उसमें अकुंरण नहीं होगा तब तक् उसमें और सामान्य बीज में पत्थर में कोई अंतर नहीं है बीज में अकुंरण की क्षमता है तो बीज में जब अकुंरण होता है । जीवन प्रारंभ होता है,उसके बढ़ने में उसमें कई प्रतिकूल परिस्थ्तिया आती है,कभी मौसम कभी बारिश कभी धूप, कभी ठंड, जब वो पौधा बनता है और फिर वो फल देने लायक होता होता है ।

 

हर पेड़ में अच्छे फल नहीं लगते और ये अच्छे फल क्या है? यही वह मृत्यु है ,तो जीवन में जब हम सारी परिस्थ्तियों से लडेगें तो इसमें मृत्युरूपी फल होगा जब होशरूपपूर्ण मृत्यु होगी, वहीं सही मृत्यु है क्योंकि मौत तो हर एक को आनी है । होशपूर्ण मृत्यु में व्यक्ति को डर नहीं लगेगा कि जीवन समाप्त होने वाला है उसको उत्सव लगेगा जन्म और मृत्यु में संतुलन बनाया वो उसने जितना जीवन केा जिया उतना ही मृत्यु को भी स्वीकारा मृत्यु अंत नहीं है । भगवान कृष्ण ने कहा - कि हमारी आत्मा एक शरीर को त्याग कर दूसरे शरीर में जाती है । हमारे कपडों की तरह जैसे हम रोज बदलते है । आत्मा शरीर बदलती है । मरती नहीं है । इतना जो जान लेगा जीवन के दोनों पक्षों को जन्म और मृत्यु को दोनों में सामजस्य बिठा पाएगा तो उसका जीवन सफल हो जाएगा हमें मन को सारी चीजे सिखानी है दोनों में सतुंलन बनाना है । जब जब ये भागे एक ओर, तो इसका निरीक्षण करना कि ये गलत जा रहा है तो दूसरे पहलू से इसका परिचय कराना है । सतुलन करना है.

 

“राधे –राधे”   

 

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