Theme :
Home
Granth
eBook
Saint
Leelaye
Temple
Yatra
Jap
Video
Shanka
Health
Pandit Ji

आशीर्वाद

  Views : 384   Rating : 5.0   Voted : 11
submit to reddit  

राधे राधे. आज का सत्संग शुरू करने से पहले से सब दो मिनिट के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये

"जय राधे-कृष्ण., गोविंद, गोपाल राधे-राधे...." 

राधे राधे श्री बाके बिहारी जी राधा रानी के चरणों में कोटि कोटि वंदन है ।


आज का हमारा सतसंग का विषय है- "आशीर्वाद" तो ये आशीर्वाद क्या है और इसकी जरूरत क्यों पडती है । क्यों ये आवश्यक है अक्सर हम देखते है कि लोग आज की दुनिया में  भाग रहे है सुख और पैसे कमाने की चाह में हर व्यक्ति सुख कमाना चाहता है । और पैसे में ही सुख है इसलिए हर व्यक्ति उसी के पीछे ही भागता है । 

सुख तो खरीदा जा सकता है पैसे से पर चैन नहीं बिस्तर तो खरीदा जा सकता है पर नींद नहींए अच्छा खाना तो पैसे से खरीद सकते हएै पर भूख नहीएं अगर हमें सुख और शांति अपने जीवन में चाहिए. तो हमें अपनी इस दौड को थमाना होगा इस दौड में हमें कुछ ऐसे काम करने होगें क्योंकि इस जीवन का कोई भरोसा नहीं है हम ये नहीं कह सकते है । कि मृत्यु हम से पूछॅ के आयेगी उसका कोई दिनए समय नहीं होता है । इसलिए ऐसा नहो कि ये जीवन बीत जाए और उसके बाद सिवाय पछताने के हमारे पास कुछ भी न हो. 

अगर व्यक्ति केवल अपना परिवार चलाने के लिए कमा रहा है तो ये तो एक पक्षी जानवर भी कर लेता है । फिर हमें मे और उसमें फर्क ही क्या  है. बुद्वि का ही फर्क है क्योंकि भगवान ने इंसान को ही बुद्विमान बनाया है । ओर इसमें रहकर भी लोगों की दुआए आशीर्वाद न ले सके तो फिर बेकार की सारी मारा मारी है । सारा भागना ही बेकार हे. तो ये आशीर्वाद किसको ओर कब मिलता है । तो ये एक संमत्ति है । व्यक्ति संसारिक पैसा तो कमा लेता है वो तो शरीर छूटनें पर छूट जाता है । पर जो ये आशीर्वादकी समपत्ति है । वो कभी खत्म नहीं होगी. ये मरने के बाद भी काम में आयेगी.


आशीर्वाद वो समत्ति वो खजाना है जो बहुत कम लोगों को मिलता है । और इसे पाने के लिए और देने के लिए उस स्तर का बनना जरूरी है क्योंकि ये हर किसी को नहीं मिलता है इसमें है क्याघ् देने वाले की शक्ति भरी है इसमें उसका तपए साधना होती है.उसकी दुआए होती है  और जीवन में अगर हमनें एक भी काम ऐसा नहीं किया जिससे हम लोगों की दुआए पा सके तो हमनें अपनें जीवन में कुछ नहीं किया दुसरों के चेहरे पर हॅसी जो आ जाती है उनकी दुआए जो हमें मिल जाती है । वहीं वास्तव में जीवन की सबसे बडी पूजी खजाना वहीं है पर हम इस ओर कभी ध्यान नही देते  प्रेम से कहिए श्री राधे.

तो हम इसके देने और लेने के लायक बनेंगें उसमें लेबल होना जरूरी है हमनें ऐसा क्या किया कि हमें मिल जाए और हमें में ऐसी कौन सी शक्ति है कि हम किसी को दे दें  । सबके बस की बात नहीं है ये लेना और देना इसके लिए एक स्तर की जरूरत होती है । और ये स्तर आता है । हमारे अच्छे कर्मों सेण् प्रेम से कहिए श्री राधे.

प्रसंग १. - एक बार का प्रसंग है एक गुरू थे और उनका एक आश्रम था वो बहुत ज्ञानी गुरू थे उनके आश्रम लोग दूर से शिक्षा पाने के लिए आते थे । वो सभी उनकी सेवा करते थे रोज वो हर किसी को कोई न कोई काम देते थे । पहले का ये नियम था कि जो भी गुरूकुल मै  पढता था उसे काम करना पडता था सेवा करनी होती थी और गुरू की आज्ञा को मानना पडता था तो ऐसे ही वो सबको काम देते थे उन शिष्यों में एक आरूणी नाम का शिष्य था वो उनका बहुत प्रिय था तो एक दिन बहुत बारिश हुई तो गुरूजी ने आरूणी को बुलाया और कहा . कि हमारे जो खेत है । उसमें  पानी न भर जाए, तो तुम जाओ और देखो कि खेत में पानी न भर जाए क्येांकि वो नहर का बाध टूट गया तो खेंतो में पानी भर जाएगा तो पूरी मेहनत बेकार हो जाएगी. 


अब वो उनकी आज्ञा मानकर खेत में गए तो देखा कि नहर टूट गई है और पानी खेंतो में भर रहा है । उसको रोकने के लिए कोशिश कीए मिटटी डालते  उस पर डालते लेकिन वो मिटटी ठहरती नहीं थी जब देखा कि मिट्टी तो ठहर ही नहीं रही तब तो वो उस टूटी जगह पर खुद लेट गए और जब तक लेटे रहे जब तक पानी रूक नहीं गयाण् सारी रात हो गई .  


सुबह जब गुरू ने देखा कि सारे शिष्य है पर आरूणी नहीं आये तो तो वो उसे देखने के लिए खेत पर गए और आवाज लगाई कि आरूणी तुम कहा हो उन्होंने पूछा पर किसी ने नहीं देखा था तो वे शिष्यों के साथ खेत पर गए.  उन्हेांनें देखा कि वो लेटे हुए थे मेढ परण् तो वहीं से उन्होंने  आवाज लगाई तब आरुणी वही से बोले . कि मै यहा हूँ  । उनका सारा शरीर अकड चुका था क्येांकि ठंड में सारी रात वो लेटे हुए था, 


तो गुरू ने कहा - . कि बेटा ये तुमने क्या किया!  तुम क्यों इस नहर में लेट गए तो उन्होंने  कि गुरूदेव मैने बहुत कोशिश की पर इस नहर का पानी नहीं रोक पाया, पर आपकी आज्ञा तो मुझे माननी ही थी इसलिए मै खुद ही लेट गया और खेत में पानी नहीं जाने दिया तो गुरू की आखों में पानी भर आया.

और बोले-  कि वास्तव में पुत्र तुम आज्ञाकारी हो और तुम्हें अब कुछ भी सीखने की जरूरत नहीं है । तुम्हें मै ऐसा आशीर्वाद देता हू कि सारी विधाए तुम्हें अपने आप ही आ जाएगीं और गुरू के आशीर्वाद से आरूणी बडे होकर एक बहुत बडे विद्वान बनेंण् ये केवल गुरू का आर्षीवाद था. 


ये कहानी हमें क्या शिक्षा दे रही कि हमें आशीर्वाद चाहिए गुरू के मुख से वो अनायास ही आशीर्वाद निकल गया क्यों निकला अपने आप क्योंकि गुरूदेव ने अपने तप की सारी शक्ति अपने आशीर्वाद में लगा दी थी और बाकि शिष्यों को क्यों नहीं मिला क्योंकि आरूणी उस स्तर तक पहुच गए थे तो हमें उस स्तर तक पहुचना होगा. क्येांकि आशीर्वाद संतो के मुह से निकलता तो है पर सबके लिए एक सा नहीं निकलता है उसकी कुछ योग्यताए होती है । और हमें उसके हिसाब से बनना है और जीवन में ये जो संसारिक समपत्तिी के पीछे भाग रहे है उसे छोड कर ये आशीर्वाद और दुआए कमानी है जिसने ये संपत्ति कमाई उनका जीवन सवार गया.


इतिहास में आपको ऐसे कई उदाहर. मिलेंगे कि जिससे सारा जीवन सफल हो गया ये हमें अगर कमाना है । तो हमें इस लायक बनना है यहीं देने के लिए भी है हमें उस उच्चकोटि का बनना पडेगा कि हम किसी को आशीर्वाद दे सकें हर कोई न दे सकता है.  और न ले सकता है आशीर्वाद. हम कहतें है कि बडों का आशीर्वाद जरूर ले लेना क्योंकि उनके पास जीवन का अनुभव ज्ञान और साधना है । उनकी वो पूंजी  है वो अगर हम सें प्रसन्न हो जाएगे तो यू ही दे देगे तो हमें बडों से मागॅनी है तो विरासत में संपत्तिी नहीं उनका आशीर्वाद मागना है क्योंकि अगर उनका हाथ हमारे उपर रहेगा तो जीवन में हर सफलता मिलेगी हमें पर देने के लिए उस लेबल का बनना जरूरी है ।

प्रसंग २.-  एक बार नारद जी पृथ्वी का भ्रम. करने निकले तो उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति जिसके पास सब सुख थे पर बेटा नहीं था पति पतिनी बड़े दुखी रहते थे, तो भगवान के बहुत भक्त थे कि प्रभु हमारा एक बेटा होता तो जीवन सफल हो जाता  अब नारद जी जब भ्रम. करने के बाद बैकुण्ठ पहुचें.

तो उन्होंने कहा . - कि हे भगवन पृथ्वी लोक का भ्रम. करके आया हू.  वहाँ एक दमपत्ति है जो आपके भक्त है और बहुत सज्जन है पर उनके यहा कोई पुत्र नहीं है तो ऐसी कृपा कर दो कि उनके यहा एक औलाद हो जाए. 


तो भगवान बोले -  कि नारद तुम जिसकी बात कर रहे हो उसके इस जीवन में तो क्या कई जीवन तक संतान का कोई योग नहीं है । 


नारद जी बोले-  कि अब योग ही नहीं तो संतान कहा से होगी. एक बार संत उन्हीं के द्वार से निकले और आवाज लगा रहे थे कि भिक्षा दो ! और एक संतान लो एक रोटी दोए एक संतान लो. तो जैसे ही उसकी पत्निी ने सुना कि संत ऐसा बोल रहे है । तो वो रोटी लेकर आई और बोली . बाबा ये लो एक रोटी तो बाबा कहते है . कि जाओ तुम्हारें यहा एक बेटा होगा और फिर वो अंदर गई एक रोटी लाई तो इस तरह वो सात बार गई ओर हर बार-बार उस संत ने एक संतान का आशीर्वाद दिया. सात रोटी दे दी.


और आगें चलकर उसके यहा सात संतानों ने जन्म लिया एक बार फिर नारद जी भ्रम. पर निकले तो देखा कि उसके यहा सात संतान है । उनको बडा आश्चर्य हुआ वो बैकु गए. और बोले . भगवान आप तो बहुत झूठे हाऐ मै पृथ्वीलोक से आ रहा हू उस व्यक्ति के यहा तो सात संतान है । आप तो कह रहे थे कि कोई संतान नहीं होगी उसके यहाँ तो एक नहीं दो नहीं सात सात बेटे है.


तो भगवान कहते है - कि नारद उसकी किस्मत में बेटे नहीं थे पर उस संत के आशीर्वाद में बेटे थे नारद जी को बडा आश्चर्य हुआ कि जो चीज में नहीं कर सकता आप नहीं कर सकते वो एक संत कैसे कर सकता है कि उसके यहा सात सात बेटे हो गए भगवान कहते है । कि नारद वो कोई ऐसे वैसे संत नहीं है उनके आशीर्वाद में बहुत शक्ति है । उनको विश्वास नहीं होता.

तो भगवान कहते है चलो नारद उनकी परीक्षा लेकर के आते है । तो नारद जी और भगवान ने बाह्रम. का रूप रखा और गए संतो के पास तो कुटिया पर गए और बोले. कि हमें भूख लगी है । आप भोजन कराइए.

तो संत बोले आप बैठिए मै अभी लाता हूँ. क्योंकि संत का तो काम है वो कुछ भी नहीं जोडता वो तो प्रतिदिन भिक्षा मागता है तो सबने आटा दाल दी तो वो सब लेकर आ रहे थे तो रास्ते में बारिष होनें लगी क्योंकि ये भगवान की लीला थी. अब संत आए तो सारी लकडिया गीली हो गई थी तो वो जल नहीं रही थी तो संत ने अपना पैर काटा और उसे जलते चूल्हें में डाल दिया और उस पैर से उन्होंने  खाना बनाया और भगवान को खिलाया उनके पैर से खून बहता जा रहा था उन्हें इस बात की केाई परवाह नहीं थी.


फिर भगवान अपने असली रूप में आए और संतो को आशीर्वाद दिया और पैर वापिस कर दिया जब नारद जी बाहर आए.

तो भगवान बोले - कि नारद अब तुम समझें कि क्यों इन संत के आशीर्वाद में इतनी शक्ति थी कि मेरे विधान में भी वो नही है जो संतए एक बाह्रम. के खाने के लिए पैर काट दे इतना परोपकारी है । उसके आशीर्वाद से सात क्या हजार संतान भी हो सकती है । वो तो प्रकृति  के नियम बदल सकता है, 

जब हमें आशीर्वाद मिलता है तो हम तर्क करते है कि हमें ऐसा क्यों मिला हम ये भूल जाते है कि जो दे रहा है वो कितना महान है कि तभी तो वो इस लायक बना हण्ै हमें वो खुशी से लेना है । उसमें तर्क नहीं करना है 


प्रसंग ३. - महाभारत में एक प्रसगं है भीष्म पितामह द्रोणाचार्य सबको आशीर्वाद देते थे चाहे वो युधिष्ठिर होए या दुर्योधन जब.जब आषीर्वाद देते थे तो दुर्योधन हमेषा तर्क करता था कि आप मुझे वो आशीर्वाद क्यों नहीं देते है, जो पांडवो को देते हो.

तो पितामह कहते है . कि आशीर्वाद ऐसी चीज नहीं कि उठाई ओर दे दी, जिसने विनम्रता से सिर झुकाया उसके लिए दिल से अपने आप आशीर्वाद निकलता है । हाथ उसके सिर पर चले जाते है । पर उसके लिए तुम्हें युधिष्ठिर जैसा उदार धर्मनिष्ठ बनना होगा उनके नाम के आगें धर्मराज इसलिए है क्योंकि वो धर्म के रास्ते पर चले वो हकदार है उस आशीर्वाद के पर तुम नहीं हो और उसे न आशीर्वाद और न जीत मिली. 

तो कहने का मतलब हमें तर्क नहीं करना चाहिए उसे स्वीकार कर लेना चाहिए उसके आशीर्वाद में क्या छिपा है ये वो ही जानता है । 


प्रसंग ४. - गुरू नानक जी अपने संतो के साथ जब एक गाव गए तो लोग कहते है कि यहा के लोग दुर्जन है तो वहा के लोगों को आशीर्वाद देते है कि बसे रहो तो लोगों को आश्चर्य होता हएकि इतने दुष्ट है फिर भी आशीर्वाद दे रहे है कि बसे रहो कि ये ऐसा बोल रहे है फिर दुसरे गाव में जब वो जाते है ।

तो वहा के कुछ लोगों ने कहा. -  कि यहा के लोग बहुत अच्छे और सज्जन है । 


तो नानक जी ने कहा - वहा से जाते हुए कि सब बिखर जाओ अनाज के दानों की तरह तो लोगों ने पुछा -  कि आपने ऐसा क्यों कहाण् कुछ को बहुत बुरा लगाण् जो उनके साथ में लोग उन्हेांनें पूछा . कि आपने ऐसा क्यों कहाघ् तो नानक जी ने कहा कि जिस गाव में दुर्जन लोग थे उनको मैने कहा कि बसे रहो. क्योंकि अगर वो एक ही जगह में बसे रहेगे  तो ज्यादा बुराई नहीं फैला पाएग. क्येंकि जो व्यक्ति जैसा होता है वो सबको वैसा ही कर देता है. और जिस गाव में अच्छे लोग थे उनसे बिखरने को इसलिए कहा-  कि वो जहा भी जाएगें उस जगह को अपने गुणों के कारण अच्छा बना देंगें । वो सज्जनता ही फैलाएगे  तो मेरे आशीर्वाद में  तर्क न करो. 


कहने का मतलब संतो के आशीर्वाद में तर्क न करो उसका एक गूढ रहस्य होता है जो सिर्फ वो ही जानते है । बस हमें तो तो ये कोशिश करनी है कि हम उस स्तर के बन जाए और जब भी हम अनायास ही संतो के पास जाए उनका हाथ अपने आप हमारे सिर पर आ जाए और वो हमें आशीर्वाद दे दे  उसके लिए हमें वो गुण. अपने में लाने होगें वो स्वभाव करना होगा तभी हम उसके स्तर पर आएगें ।

प्रसंग ५. - एक संत एक बार रेगिस्तान में जा रहे थे वो वो सात्विक संत थे तो बडी प्यास और भूख से व्याकुल थे कुछ भी नजर नहीं आ रहा था तो एक पेड दिखा उनको वो हरा भरा फल लगें थे उसमें तो उन्होने  फल खाए ओर उसके पास झरना था तो वहीं पानी पिया और वो सो गए. 


जब उठे तो बहुत प्रसन्न हुए कि ये पेड कितना परोपकारी है । मै कितने दिनों से भूखा थाइससे मुझे फल मिले और झरने से पानी मिला मुझे छाया दीए तो वो उस वृक्ष कहते है कि मै तुम्हे क्या आशीर्वाद दू कि तुम हमेषा फल दाऐ छाया दाऐ ये तो तुम अब भी दे रहे हाण्े पर मै तुम्हें आशीर्वाद देता हू. कि हे वृक्ष तेरे बीज से जितने भी वृक्ष हेागे  तुझ जैसे ही हो और वो दोनो हाथ से उसको आशीर्वाद देकर चले गए तो इस आशीर्वाद का अर्थ क्या है । संत क्या कह रहे है कि तुझ जैसे कई वृक्ष हो तो उस पे हमेशां करोडो फल होगऐं और उतने ही बीज उससे निकलेगे. उनमें से कई पेड बनेंगे.  तो उस पेड से कई और पेड हेागें पहले एक पेड था जो एक संत की प्यास बुझाता था पर अब कई पेंड हेागें जो न जाने कितने संतो और लोंगों की प्यास बुझाएगें और फल देगें सबको उसकी सारी पीढिया तर जायेगी .



तो कहने का मतलब कि हमें तो आशीर्वाद मिले उसके साथ जो हमारे साथ है उनका जीवन भी सफल हो जाए आगें वाली पीढियों को भी वो आशीर्वाद मिले हमें ऐसा परोपकारी बनना है क्योंकि आशीर्वाद देने और लेने के लिए सामान्य वस्तु नहीं कि दे दिया ये एक व्यक्ति का तप है उसके जीवन भर की ताकत है । वो एक बार प्रसन्न हो गया तो संत तो महान होते है अपने जीवन में वो अच्छे काम ही करते है तो जब हम संत के चरणों में जाए भक्त के चरणों में जाए उच्चकेाटि का हो तो वो हमें कुछ दे पाए या ना पर उसके मुहॅ से दो बोल अगर आषीर्वाद के निकल गए तो हमें  संसार की सबसे बडी समपत्तिी मिल गई बस इसी में  जीवन की सार्थकता है. बुरे कर्म करके बदुआए लेना आसान है पर अच्छे कर्म करे दुआए लेना उतनी ही मुश्किल है । किसी का जीवन बिगाडना सरल है पर बनाना कठिन है और हम अगर किसी एक का जीवन बना दिया तो ईश्वर के आशीर्वाद के अधिकारी हो गए तो मान लो जीवन में सब कुछ मिल गया अब किसी की जरूरत नहीं है । तो हमें भी यहीं करना है । प्रेम से कहिए श्री राधे

                                                                         "राधे-राधे"    
                   

Comments
Enter comments


 
 
Tags :
Copyright © radhakripa.com, 2010. All Rights Reserved
You are free to use any content from here but you need to include radhakripa logo and provide back link to http://radhakripa.com