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अनुशासन

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राधे राधे आइए आज का सतसंग शुरू करने से पहले सब दो मिनिट के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ भगवन नाम का कीर्तन करें.

 

“कृष्ण-राधे की जय, राधे-कृष्णा की जय, वंशी वाले कन्हाई की जय-जय ”

 

आज के हमारे सतसंग का विषय है । “अनुशासन” जिसे हम नियम भी कहते है तो एक जो नियमित व्यवस्था होती है वो नियम है । क्योंकि अगर हम नियम में नहीं रहेगें जीवन में अनुशासन नहीं होगा तो सारी चीजें अव्यवस्थित हो जाएगी फिर जीवन में सबकुछ गडबड हो जाएगा. इसलिए जीवन में नियम होना जरूरी है क्येंकि नियमित व्यवस्था जीवन को सकारात्मक दिशा देती है । प्रेम से कहिए श्री राधे तो कहने का मतलब जीवन में अनुशासन बहुत जरूरी है ।

 

प्रसंग १. - एक बार एक शिक्षक थे वो पढाते थे तो उनके शिष्यों में से एक बहुत गरीब था तो वो अपने साथ उसे काम में लगा लेते थे कि कुछ मदद मिल जाए वो उसे रोज दो घंटे के लिए बुलाते और कुछ लिखवाते थे रोज वो दो घंटे लिखकर चला जाता था तो एक दिन वेा आया तो गुरू ने कहा - कि कल मुझे काम है तो तुम सुबह होने से पहले आ जाना तो अगले दिन वो सुबह जल्दी उठकर गुरूजी के घर पहुँच गया तो गुरू ने दो लाइन बोली फिर कहा कि - बस जाओ हो गया. तो उस शिष्य को गुस्सा आया कि दो लाइन के लिए मुझे परेशान किया और खुद भी हुए, तो वो उसका चेहरे पर गुस्सें के भाव आ गए तब गुरू ने कहा - कि देखो बेटा ! तुम इतना गुस्सा मत हो कि मैने तुम्हें दो लाइन लिखवाई और बस कह दिया. ये तुम्हारे जीवन की बहुत बडी शिक्षा है । और अगर तुम जो नियम बनाओ उसे किसी भी परिस्थ्तिी में टूटने मत दो. अगर तुम्हारा लिखने का नियम है । और मै उसे तोड देता तो तुम्हे लगता कि मै तो ऐसे ही नियम तोडता रहता हूँ । तो ये जीवन में तुम्हारे लिए बहुत बडी शिक्षा है कि एक नियम बद्ध जो जीवन दिनचर्या होती है । तो जीवन को एक सकारात्मक दिशा देती है ।

 

व्यक्ति अपने जीवन में हर रोज नियम बनाते है । अगर हम अपने रोज का जीवन देखें तो हम सुबह से शाम तक हजारों नियम बनाते है । हम कहते है कल जल्दी उठेगें पर नहीं उठ पाते कहते है कि कोई नई चीज शुरू करेगें पर नहीं कर पाते है । क्यों हमने उसका नियम नहीं बनाया अनुशासन में नहीं रहा इसलिए वो एक व्यवस्थित दिनचर्या नहीं बन पाई । तो जीवन में अनुशासन जरूरी है । सोंचे कि अगर जीवन मे अनुशासन व नियम न होता तो क्या होता अगर व्यक्ति एक दिन नियम से सुबह उठे नही तो पता नहीं वो कब तक सोता ही रहेगा, अगर स्कूल में बच्चों का नियम न हो जाने का तो बच्चे किसी भी टाइम पर जाना है तो बच्चा कभी भी सो के उठकर स्कूल जाएगे अगर यातायात के नियम न हो तो व्यक्ति सुबह से शाम तक ही फसाँ रहे रोड पर, तो ये क्या है नियम और व्यवस्था जो जीवन के लिए जरूरी है और जिसके जीवन में ये नहीं है वो कभी भी कोई काम ढगं से नहीं कर सकता है । हम सैनिको को परेड करते देखते है । पर युद्ध में क्या वो परेड काम में आती है । फिर वो परेड क्यों सिखाते है । क्योंकि जो युद्ध है । में व्यक्ति अपना अनुशासन नियम न भूलें । आज दुनिया में इतनी अव्यवस्थाएँ भ्रष्टाचारी हो गई है. क्यों? क्योंकि व्यक्ति ने अनुशासन में रहना छोड दिया है ।

 

प्रसंग २ - महाभारत में एक राजा पांडू थे उनकी जीवन की एक अच्छी घटना है । वो एक बार वन में गए अपनी दोनों पत्नियों के साथ तो वो एक दिन वो शिकार करने के लिए जंगल गए. तो उन्हें एक आहट सुनाई दी तो उन्हें लगा कि किसी जानवर की है तो उन्हेांनें तीर चला दिया और जब पास जाकर देखा तो एक त्रषि और उनकी पत्निी को जाकर वो बाण लगा और वो दोनों ही मर गए और उन्हेांने राजा पांडू को श्राप दे दिया और अगले दिन जब वो राज सभा में गए तो उन्होने हर एक से ये बात कही कि देखो मुझसे एक अपराध हो गया एक त्रषि और उनकी पत्निी का वध हो गया मुझसे,  तो सबने उनसे कहा कि-  तुमने जान कर तो मारा नही, उनको तो वो कहते है कि चाहे जैसे भी मारा हो पर मुझे प्रायश्चित करना है । तो नियम मतलब नियम ऐसा नहीं कि वो राजा थे तो अपने लिए नियम तोड दें उन्हेांनें तुरंत अपना राज्य छोंटे भाई धृतराष्ट को दिया और खुद वन को चले गए प्रेम से कहिए श्रीराधे

तो कहने का मतलब वो चाहते तो छिपा लेते इस बात को,  पर उन्हेांने ऐसा नहीं किया वो कहते है कि मै अगर राजा होकर नियम पर न चलू तो मेरी प्रजा भी यहीं करेगी प्रजा कहेगी कि जब राजा ही नियम नहीं मानता तो हम क्यों माने उनको किसी ने नहीं देखा था बाण चलाते, पर वो नियम के पक्के थे उन्हेांने अपना पूरा जीवन का त्याग किया और वन को गए. कहने का मतलब जीवन में व्यवस्था न हो तो व्यक्ति जी ही नहीं सकता

 

प्रसंग ३. - एक बार एक राजा अपने बहुत सारे सैनिको को लेकर एक यात्रा पर गया था तो रास्तें में एक गाॅव पडा तो राजा ने सोचा कि यहाँ पर विश्राम करेगें फिर खाना खाने के बाद आगें चले जाएगें तो जब खाना पकाया तो देखा कि नमक किसी चीज में ही नहीं.

सैनिक अपने साथ नमक लाना भूल गए थे तो राजा ने कहा - जाओ पास के गांव से नमक लेकर आओ तो वो गांव में गया. और नमक लेकर आया और सब्जी में डालकर बनाई तो सबने खाना खाया. तो राजा ने कहा - कि तुमने नमक का मोल चुकाया? तो सैनिक ने कहा-  कि नहीं, ये राज्य तो हमारी सीमा में आता है ।और नमक का मूल्य चुकाओ तो राजा कहता है कि हम सब बाद में खाना खाएगें पहले तुम जाओ इस नमक का मूल्य चुका कर आओ वो सैनिक कहता है कि ऐसा क्यों ? तो राजा कहता है कि मै अगर एक बगीचे का एक फल भी तोडता हू तो पीछे सारे सैनिक पूरा बाग उजाड देगें क्योंकि उनके मन मे ये बात रहेगी कि जब राजा खुद ही नियम अनुशासन में नही है तो वैसा ही प्रजा करेगी कहने का अभिप्राय है कि अनुशासन बहुत जरूरी है तो हमारे जीनव में कौन सा अनुशासन आना जरूरी है ।

 

हमारे मन का अनुशासन जैसे हमारा घर है उसमें एक आंगन है जब हवा चलती है तो गदंगी कचरा हमारे घर में आ जाता है तो हम उसको साफ करते है ताकि हमारा आगॅन घर साफ रहे उसमें हमारी कोई गलती नहीं है हवा चलेगी तो कचरा अपने आप आ जाता है । ये प्रकृति का नियम है पर हमारा काम है उसकेा साफ करना. हम उसी कचरे में तो नहीं रह सकते. ऐसे ही हमारा मन है उसमें विषय वासनाओं का कचरा आता ही रहता है । ये जो वासनाओं की आधीं है वो हमारे मन में कचरा लेकर आती है । हम अपने कानों से, आखों से बहुत कचरा आ जाता है हमारे मन में बहुत सारा कचरा इकट्टा हो जाती है तो अपने आगॅन का कचरा तो साफ कर लेते है पर मन की गंदगी साफ नहीं करते.

 

तो इसको कैसे साफ करंगे तो ये अनुशासन और नियम से होगी. जब हम रोज इसे साफ करेगें, संसार में चीजें है, विषय, वासना है, तो आधी तो चलेगी, पर वो हमारे अंदर न जा पाए, तो हमें अनुशासन से चलना है तो हम हर समय अपने मन को व्यवस्था में रखें. उसका हर समय निरीक्षण करे, क्योकि मन में ही विचार आते है । विचार धीरे-धीरे आदत बन जाते है और फिर उसके बाद वो स्वभाव बन जाते है  और स्वभाव से वो संस्कार बन जाते है और फिर वहीं हमारी जिदंगी बन जाते है ।

 

अब एक मन ने हमारा जीवन बदल दिया. अगर हमनें  इसको नियम से रखा होता तो हर समय निरीक्षण किया होता तो शायद ये कभी न होता.

 

प्रसंग 4 - मान लो एक माँ हे वो एक आफिस में काम करती है तो उसका बच्चा घर में रहता है तो शाम को वो देखती है कि बच्चें ने सारा घर फैला दिया है । कहीं का कुछ पडा है, वो उछल कूदॅ कर रहा हैं । उसे बहुत गुस्सा आता है, यदि वह चाहती तो घर में सब कुछ कर सकती थी. वो अगर आफिस में बैठे हुए घर में फोन लगाती कि बेटे तुम क्या कर रहे हो, मै जब तक घर आउगी तब तक तुम अपना होमवर्क पूरा कर लेना, कपडे गंदे मत करना, अगर वो सख्ती से उसको समझाती तो वो घर का सामान फेंकता नहीं, ना ही उधम करता, दिन में उसको डाटती, फोन पर. तो शाम को अनुशासन में रहता है ऐसे ही अगर हम मन को शाम तक एक बार भी नहीं देखेंगे तो शाम तक ये मन इतनी जगह भाग चुका होगा कि इसे सम्हाल पाना मुष्किल हो जाएगा.

 

क्योंकि मन बच्चे की तरह है वो सोचता कि कोई उसे रोकने वाला ही नहीं है और जब वो बडा हो जाएगा तो फिर वो कन्टरोल में नहीं आ सकता है । वो जब बच्चा था तभी वो सुधर सकता था तो  ऐसे ही हमें अपने मन के साथ करना है । तो हमें रोज देखना है कि  किस तरह के विचार हमारें मन में आते है बुरे विचार आते है तो तुरंत हमें मन को वहा से हटाना है । तो हमे मन से कहना है कि ये गलत है और हमनें अगर ऐसा नियम अपने मन का बना लिया तो मन वहीं करेगा जो हम चाहेंगे, पर हमने इसको नियम में नहीं रखा तो हम इसके गुलाम बन जाएगें और ये जहा चाहेगा हम वहीं चले जाएगें. तो हमें इसको व्यवस्था और अनुशासन में रखना है. क्योंकि बिना अनुशासन के जिदंगी कितनी बेकार हो जाती है । ये हमनें अभी देख कि जीवन में अगर एक दिन के लिए भी अनुशासन और नियम हटा लिए जाए. व्यक्ति का जीना मुश्किल हो जाती. नियम से ही जीवन में व्यवस्था आती है और नियम से ही सकारात्मक दिशा मिलती है.

 

लोग कहते है कि पूजा में, प्रेम में, कोई नियम नहीं होता है । लेकिन हम ये भूल रहे है कि आध्यात्म का पहला पाठ नियम से ही शुरू होता है. प्रेम तक पहुचने के लिए नियमों का बंधन बहुत जरूरी है । प्रेम के चारों तरफ नियम की रेखा है और उसको पार करना जरूरी है । जैसे एक व्यक्ति है वो नदी के इस तरफ है और उसको दूसरी तरफ जाना है । उसे एक माध्यम चाहिए नदी को पार करने के लिए पर जब वो नदी के उस तरफ पहुच जाएगा, तब भी क्या वो नाव में बैठा रहेगा, नहीं अब तो वो नदी को पार कर गया है तो अब नाव की क्या जरूरत है । बस ऐसे ही ये आध्यात्मिक है अभी प्रेम के वो इस तरफ है प्रेम मे आया ही है । तो वो इस नियम रूपी नाव में बैठकर ही इस प्रेम की नदी को पार कर पाएगा जब वो इस प्रेमरूपी नदी को पार कर लेगा. साधना की उॅचाई पर पहुच जाएगा

 

जैसे गोपियां थी, पर क्यों, वो इन नियमों को नही मानती थी कायदे से वो किसी की पत्निी थी तो उनको पतिव्रता होना चाहिए, अपने बच्चों का पालन पोषण करना, ये उनका धर्म है । तो उन्हेांनें ने क्यों ये धर्म छोड दिया, और उन्हें पाप नहीं लगा, क्योंकि गोपियां उस प्रेम की नदी को पार कर चुकी थी वो साधना से उपर उठ गई थी वो नियम में कब तक थी जब तक वो साधन में थी उन्हेांनें जैसे ही साधना की नदी पार की, वो फिर नियम की क्या जरूरत है । वो तो नदी को पार कर चुकी थी तो नदी के इस तरफ खडा है उसकेा नियम रूपी नाव की जरूरत है । जिसने अभी नदी पार नहीं की है । जिसनें अभी आध्यात्म प्रेम में कदम रखा है । तो अभी वो नाव में बैठेगा नदी को पार करने के लिए और पार जाने के बाद उसको नाव की क्या जरूरत है । वो अपनी मजिल को पा लेगा फिर नाव को खुद ही छोड देगा.

 

नदी के उस पार क्या है उस पार वो कृष्ण है । फिर भी वो नाव में ही बैठा रहे तो ये उसकी मूर्खता है ।  कहने का अभिप्राय है कि जो गोपिया थी, वो साधन सिद्ध थी वो प्रेम की नदी को पार कर चुकी थी तो उनके  लिए को नियम बंधन नहीं था, पर ये बात आध्यात्म मे हर किसी के लिए लागू नहीं होती है । क्योकि प्रेम , आध्यात्म में नियम पहले जरूरी है फिर बाद में ये बात आती है जब हमारी साधना परिपक्व हो जाती है । प्रेम मे आगें बढ जाते है तब प्रेम और भक्ति में कोई नियम नहीं होता.

 

अगर व्यक्ति पहले ही उस नाव में न बैठे तो क्या होगा तो क्या वो पार कर पाएगा, नहीं, वो तो नदी मे डूब कर मर जाएगा. उसका पतन हो जाएगा. उस साधना के पथ पर अगर वो नियम को नहीं पकडेगा इसीलिए वो नदी को पार कर जाए तभी नाव को छोडे बस यही अनुशासन है. जीवन का और ये व्यवस्था बहुत जरूरी है जीवन में और अगर ये नहीं होगी तो सारी चीजें गडबड हो जाएगी. व्यक्ति न तो टाइम पर खाएगा, न सोएगा, कुछ भी चीज समय पर न हो,

 

तो ये नियम चाहे व्यक्ति संसार में रहे या आध्यात्म में जब तक व्यक्ति परिपक्व नहीं हो जाता तब तक उसको अनुशासन में रहना ही पडेगा उसको, हमें अपने मन को हमेश अनुशासन मे रखना है ताकि ये चाहतो कि ओर भागेगा नहीं, इसे हर पल याद रहेगा कि पीछे कोई डंडा लिए खड़ा है, इसको पता रहे कि कोई गंदा विचार इसके पीछे है । हम दूसरेां को नियम बहुत सिखाते है पर खुद के मन को अनुशासन में रहना नहीं सिखा पाते है । हर रोज अपने से किए हुए वादे कभी नहीं निभा पाता हम कहते है कि आज हम ये काम नहीं करेगे, ये बुरा विचार अपने मन में नहीं लाएगें, आज हम गलत नहीं बोलगे नहीं, पर हम ऐसो नहीं का पाते क्यों क्योंकि हमने अपने मन को नियम अनुशासन में रहना ही नहीं सिखाया अगर हमने सिखाया होता तो देखते कि कैसे हमारे मन में गलत विचार आते कैसे हमारे मन में इतना कचरा आ गया, हमनें कभी मन की सफाई ही नहीं की और कचरा आता गया और हमें गंदगी में रहने की आदत हो गई तो ऐसा क्यों हुआ.

 

क्योकि ये जो नियमों का बंधन है ये सबको अखरता है । सभी प्राणी इस नियम के बंधन को त्याग कर स्वतन्त्र होना चाहते है तो आजाद होना अच्छी बात है । पर जरूरत से ज्यादा आजादी भी व्यक्ति का विनाश कर देती है । तो अपने लिए अनुशासन  बनाए तभी सारी चीजें सहीं चलेंगी आज दुनिया मे इतना भ्रष्टाचार क्यों है । पहले के जमाने में राजा गलती करते थे तो खुद के लिए भी नियम बनाते थे पर आज व्यक्ति गलती करता है तो खुद ही छुपाता है । पाप करता है तो छुपाता है कि कोई देख न ले हमारा गलत काम ये हम क्या करे है, तो व्यक्ति ने केाई व्यवस्था नियम ही नहीं बनाए,

 

वो तो सोचता है कि हम तो स्वत्रंत है जो चाहेगें तो करेंगे करता भी है । पर वो भूल जाता है कि कर्म व्यक्ति के जीवन का आइना है । जो वो करेगा वो ही उसको भोगना पडेगा क्योंकि मन एक बार चंचलता करेगा तो जन्मों तक भोगना पडेगा व्यक्ति को ऐसा नहीं है कि इसी जन्म में भेागना पडेगा उसके वो पाप कर्म खत्म नहीं होते तो याद रखना कि मन एक बार भी चंचलता न कर पाए.क्योकि इससे हमारे कई जन्म बर्बाद हो जाए तो इससे पहले ही हम मन को अनुशासन में  रहना सिखाए और आध्यात्म का भी यहीं नियम है ।जो हम सबको निभाना है ।

 

“राधे-राधे”     

 

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