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आनन्द

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आज का सत्संग शुरू करने से पहले से आईये हम कुछ पलों के लिए बड़े प्रेम बड़े भाव से भगवन नाम का कीर्तन करें

 

“श्री राधावर कुंज बिहारी मुरलीधर गोवर्धन धारी”.......

 

आज के हमारे सतसंग का विषय है “आनंद” , इस दुनिया में अगर हम देंखे तो सब को, सबकुछ नहीं मिलता है । हर व्यक्ति के जीवन में कुछ न कुछ कमी रहती है. ऐसा नहीं होता कि सब को सब कुछ मिल जाए, और जिन्हें ज्यादा मिला है वो भी खुश नहीं है और जिन्हें कम मिला वो भी खुश नहीं है । ज्यादा जिसको मिला है वो इस लिए दुखी है कि क्योंकि होड है कि दूसरे के पास हमसे ज्यादा है । और जिसके पास कम है, वो भी दुखी है कि मेरे पास कम है, दूसरे के पास ज्यादा है । और जिसके पास कुछ नहीं है तो वो तो दुखी है ही, प्रेम से कहिए श्री राधे

 

कहने का तात्पर्य ये है कि जिनको ज्यादा मिल गया वो भी दुखी है और जिनको कम मिला, वो भी दुखी है फिर तो बेकार में सारी मारा मारी है । तो आनंद को समझने से पहले हमें संसार में सुख-दुख को समझना होगा. जब हमें इस जान लेते है, समझ लेते है तो यहीं से आनंद शुरू हो जाता है । क्योंकि जहा पर ये सुख और दुख खत्म होता है वहीं से ये आनंद शुरू होता है ।

 

पर बडी विंडबना है कि व्यक्ति सुख और दुख से उपर उठ ही नहीं पाता, कि वो आनंद तक पहुच सके. आनंद तक क्यों नहीं पहुच पाता, क्योंकि वो इसी सुख और दुख मे लगा रहता है । इसी में जिंदगी बीत जाती है, और ना ही वो सुख ही पा पाता है, और ना हीं परमात्मा को.

 

प्रसंग १. – एक संत थे उनके विचार बहुत अच्छे थे, वो कहते थे कि ये दुनिया बहुत नाचीज अमूल्य है।और इस दुनिया में एक रोटी के लिए खरीदना घाटे का सौदा है, व्यक्ति कहता है कि हम तो रोटी कमाने की खतिर ही धन कमा रहे है तो वो रोटी में सुख देख रहा है तो वो इसके लिए बहुत अच्छी बात कहते है । कि जहा तक खाने का मामला है, तो खाना, न तो अच्छा होता है, और न बुरा, उसका सारा स्वाद बस गले तक ही रहता है । और जब वो गले के नीचे उतरा तो सबका एक ही हाल होना चाहे खाना कैसा भी क्यों न हो तो इस खाने के लिए भागमभाग करना, और सुख की चाह करना हमारी सबसे बछी भूल है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

तो खाना जब तक जीभ पर था तब तक स्वाद था जैसे ही वो गले से नीचे उतरा वो अच्छा हो या बुरा उसका एक ही हाल होना है । पर दिक्कत यहा है कि हम  खाने मे सुख ढूढॅ रहे थे, अच्छा है तो सुख मिल गया, और बुरा है तो दुख मिल गया, जो फकीर होते है वो इससे उपर की बात सुनते है इसलिए उनमें और हम में यहीं फर्क होता है । वो सोचते है कि खाना सुख दुख के लिए नहीं होता हे वो तो शरीर के लिए है जो ये साधन है । ये जो शरीर हमें भजने के लिए दिया है जो इस साधन को चलाने के लिए है । दुनिया में हम देखादेखी करते है कि दूसरे के मुकाबले हमारे पास कितना माल है, ये सिलसिला चलता रहता है । क्योंकि और ऐसे ही बराबरी करने के चक्कर में हम तनाव में आते है । यहीं से हम सुख दुख में उलझ कर रहे गए तो हम क्या करते है दूसरों से माल की बराबरी करते है.

 

संत एक बहुत अच्छी बात कहते है । कि हमें बराबरी करनी है तो इबादत की करो दूसरों से, हमारी इबादत ज्यादा हो होड करो, ये आदत है व्यक्ति की हम कोई चीज नहीं छोड सकते है पर अभ्यास तो कर सकते है । ये मन चंचल है । और हम सांसारिक है हम से नहीं जाती, वो चीज न जाए मन को भागने दो हमें इसका रूख बदलना है । इस संसार से हटाकर परमात्मा की तरफ लगाना है मन को। तो हम माल की बराबरी करते है इबादत की नही, एक गाडी है हमारे पास पर, दूसरे के पास दो है तो हमें भी दो चाहिए तभी सुख मिलेगा तो जो पास एक थी वही दुःख आ गया, हम ऐसे ही होड करते है। जहा व्यक्ति ने माल की बराबरी की वहा से ईष्र्या और जलन, मत्सरता शुरू हो जाती है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग २. - मत्सरता ही व्यक्ति का विनाश कर देती है महाभारत में अगर हम देखें तो दुर्योंधन के पास क्या नहीं था? उसके पिता धृतराष्ट राजा थे, और आगें चलकर नियम के अनुसार युधिष्ठिर को राजा बनना था, पर वो कहता तो वे खुशी से उसको राजा बना देते, पर उसने जिद की क्योंकि उसे पांडवों से जलन थी अरे उसके पास सारे सुख थे पर उसने होड की, कैसी? कि पांडवो पास कुछ भी न रहे और जब राजा ने बाट दियादो भागो में, कि एक हस्तिनापुर और एक इंद्रपस्थ. उसमें भी उसको शांति नहीं मिली वो राजा बनने वाला था पर कैसे बन पाता? वो तो होड में लग गया था । ईष्र्या कहा से आई जब वो होड करने लगा. तो उसका अंत क्या हुआ? महाभारत की कथा हम सब ने सुनी है । फिर उस युद्व में  दुर्याधन का क्या हुआ हम सब को पता है । वो इसी जलन के कारण हुआ और इस सब की होड में हम आनंद को नहीं पहचान सकते है ।

 

व्यक्ति से पूछा जाए कि आप ये काम क्यों कर रहे हो तो उसका एक ही जवाब होगा सुख, खुशी पाने के लिए, कहने का मतलब है व्यक्ति के हर काम का केवल एक ही उददेष्य है सुख, पर ये इच्छा क्या करती है सबसे पहले उस खुशी को ही मार देती है, हमें उस तक पहुचनें ही नहीं देती है । मिल भी गई तो अपने साथ दुख लेकर आएगी. व्यक्ति की एक इच्छा कभी पूरी नहीं होती, एक खत्म होती है तो दूसरी शुरू ये क्रम चलता ही रहता है । कभी खत्म नहीं होता. चलता रहता है.

 

ऐसे ही हम अपना पूरा जीवन बिता देते है । आनंद की बात हमें करनी चाहिए पर जब तक हम इस सुख दुख को नहीं समझेगें, तो आनद तक कभी नहीं पहुंचेगे ,हम कहते है कि हमे किसी से ईष्र्या नहीं व्यक्ति सबका निरीक्षण करता है बस खुद का ही करना भूल जाता है । कि हम कहा है? एंकात में बैठकर व्यक्ति का मन जहा जाता है यकीन मानना हम वहीं है । हमने मन को स्वंतत्र छोड रखा है हम मन के गुलाम है । वो जहा ले जाएगा जिस सुख कामना के पीछे दौडायगा, हम वहीं जाएगें

 

प्रसंग ३- एक ब्राहमण देव थे भगवान का परम भक्त था, पर जीवन में सुख नहीं था वो ये सोचता था कि भगवान में जीवन दिया है तो मै पैसा कमाउगा अब वो भगवान शिव की आराधना करने लगा.  भोलेनाथ है वो प्रसन्न हुए और बोले - कि बताओ! क्या चाहिए? तो वो बोला - कि मुझे सारे सुख मिल जाए.

 

भगवान ने कहा - कि ऐसा तो नहीं हो सकता? पर तुमने तपस्या की है तो उसका फल तो मै तुम्हें देकर जाउॅगा. तो वो एक घंटा देकर गए और बोले कि जब तुम इसे बजाओगे तुम्हें जो चाहिए वो मिल जाएगा पर जब जाने लगे तो वो बोले - कि जो भी तुम इससे मागोगे, वो तुम्हें मिलेगी पर तुम्हारें पडोसी को दो मिलेंगी. इतना कह कर वो चले गए.

 

अब उसने सोचा कि परीक्षण कर लिया जाए, तो उसने सोचा कि मेरे सामने एक सोने की थाली आ जाए तो आ गई,पहले तो बड़ा खुश हुआ फिर सोचा कि पडोसी के पास दो आ गई, तो उसे बहुत गुस्सा  आया कि मैने तपस्या की सबकुछ किया, और मुझे आधा, पडोसी को दुगना.

 

तो वो बोला - कि मेरे घर के सामने एक गड्ढा खुद जाए, तो उसके पडोसी के घर के सामने दो गढढे खुद गए, फिर उसने उस घंटे को बजाकर कहा - कि मेरा एक पैर टूट जाए, तो उसके पडोसी के दोनेां पैर टूट गए. फिर कहता है कि है घंटा महाराज मेरी आख फूट जाए, तो पडोसी की दोनों फूट गई तो उसका मतलब था, कि मेरे पडोसी अंधे हो जाएगें और घर के बाहर जो गढढा है उसमें जाकर सब गिरेंगे और मर जाएगे.

 

कहने का अभिप्राय ये है कि यहीं ईष्र्या है कि जो हमें नहीं मिला, वो किसी को न मिलें, वो व्यक्ति चाहता तो उस घंटे के रूप में उसके पास सबकुछ था. वो सुखी रहता और पडोसी भी, पर उसने दूसरे के सुख की कामना नहीं की उसने अपने को भी परेशान किया और दूसरो को भी, तो हर व्यक्ति यहीं चाहता है कि जो हमें नहीं मिला वो किसी और को भी न मिले, और मिल भी जाए तो हमसे ज्यादा न मिले पर वो उस समय ये भूल जाता है । कि मै जिन चीजों की कामना कर रहा हू, वो तो सिर्फ भौतिक है, जड है, जरा शांति से बैठकर सोंचे कि जब हम जाएगे तो क्या लेके जाएगें? ये भौतिक चीजें तो यहीं रह जाएगी और उनसे जुडे सुख-दुख में लगे है.

 

और एक चीज है “आनंद’ और ये आनंद क्या है । सुख का उलटा होता है दुख का उलटा सुख, हर चीज के दो पहलू होते है । दिन है तो रात है पर आंनद का कोई विलोम नहीं है, वो एक था है और एक ही रहेगा.  पर ये है क्या? आनंद, आनंद साक्षात बाॅके बिहारी है । जब हम संसार के सुख दुख का ध्यान छोड देगे तो जहॅ पर ये खत्म होगा वहीं से आनंद शुरू होता है, और भगवान का एक नाम है गोविंद, कहने का अर्थ क्या “गोपमं ददाति आनंदम इति गोंविदम” जो इन्द्रयों को आंनद दे वहीं वास्तव में गोंविद है । क्योंकि वहीं पूर्ण है और जो पूर्ण है वहीं हमें सुख दुख से बाहर निकाल सकते है ।

 

लोग कहते है कि क्यों परमात्मा को भजें? क्योंकि वहीं साक्षात आनंद है । और जब तक व्यक्ति इन संसार की चीजों में पडा है, वो पूरा जीवन निकाल देगा और कभी वो सुख नहीं पाएगा, और जिस दिन वो उस परमात्मा की ओर गया उस दिन उसको सुख मिल जाएगा, क्योंकि उनका नाम ही आनंद है । लोग उनको गोविद, कृष्ण, बिहारी कहते है । जब हम उनको जन्मोत्सव बनाते है । तो हम कहते है कि “नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल” की हम ये क्यों नहीं कहते कि नंद के कृष्ण भए, क्योंकि जिस दिन वो बाके बिहारी प्रकट हुए थे, उस दिन ही गोकुल में आनंद प्रकट हुआ था, इसीलिए कहते है कि नंद के आनंद भयो, और नंद के घर में हुए वो यशोदा और नंद कौन है? ये हमारे मन में बैठे है । बस हमें अपने दिल मे प्रकट करना है, नंद कौन है जिनका निर्मल दिल है । वो सुख दुख से जो उपर उठ गए तो भगवान का जन्म नहीं हुआ वो प्रकट हुए, वो क्या बता रहे है । कि मै किसके जीवन में प्रकट हो जाता हू। जो दूसरो को सुख देता है और जो खुद इस सुख दुख से उपर उठ जाता है ।  मै शरीर के रूप में तो नंद के घर में हुआ हू, पर वो हर व्यक्ति के अंदर प्रकट हो सकता है । पर वो चाहे तब तो प्रकट होऊ, भगवान भी हसॅते है कि मै तो उसके अंदर ही हू ।कहीं छिपा हू, पर वो इस सुख दुख में उलझा है तो देख ही नहीं पाता कि मुझे हमें अपनें अंदर ही उनको प्रकट करना है पर हम नहीं कर पाते क्योंकि हम इन सब से बाहर ही नहीं आ पाते है ।

 

जब हमारी  इबादत इतनी गहरी हो जाए कि हम अपने अंदर ही चले जाए तब वो हमारा भजन गहरा होगा, यू तो हम देखते है दुनिया में हर व्यक्ति पुजा पाठ करता है, पर भजन करते वक्त, हमें इतना सा निरीक्षण करना है ।कि क्या हम मन से बैठे है वहाँ ? अगर मन बाजार में है सुख दुख में लगा है तो वो आनंद नहीं आएगा, वो कब आएगा जब हम अपने अंदर जाएगें, और जब हम अपने भीतर जाएगें । तो हमारी  इबादत गहरी हो जाएगी, उसी को फकीरों नें मौज कहा , उस फकीर के पास कुछ भी नहीं है फिर भी वो मौज उसके पास है । जिसको फकीरी भाषा में मौज कहते है उसको हमारी भाषा में आनंद कहते है । तो क्यों उसके पास वो मौज है ।

 

प्रसंग ४.- देखो दो व्यक्ति है दोनों एक से हाल में है दोनेां एक रास्ते से जा रहे है, उनके पास कपडे नहीं है, दोनों फटे हाल में है । दोनों के पैरों में जूतें नहीं है । पर दोंनों  में एक फर्क है क्या ? एक व्यक्ति अभाव ग्रस्त है, और दूसरा एक विरक्त है, तो विरक्त है उसके पास क्या है उसके पास आनंद है । उसके आनंद को दुनिया की कोई भी दौलत कम नहीं कर सकती, वो मस्त अपने आप मै.  और जो दूसरा हे वो दुखी हे क्योंकि वो अभाव में है । वो ये मानता है कि मेरे पास कपडे जुते नहीं है । मेरे पास पैसे नहीं है । इन दोनों में अंतर देखिए जिसके पास अभाव है उसके पास कितना भी पैसा आ जाए वो दुखी बना रहेगा, जो दूसरा जो विरक्त है वो सुख दुख से उपर उठ चुका है । उसे इस बात की कोई परवाह नहीं है, कि मेरे पास कपडें, जूते, पैसे नहीं है । उसके कदमों में तीनों लोको की संपत्ति भी डाल दो तो उसे कोई फर्क नहीं पडेगा वो सुख दुख से उपर है । वो उस आनंद में डूब चुका है हमें उसी आनंद में डूबना है, उस दूसरे व्यक्ति की तरह अभावग्रस्त नहीं बनना है, वास्तव में हम अभाव में ही है इसलिए इस सुख दुख में पडें है और हमें इस सुख दुख की द्वन्द को हटाकर उस आनंद मे डूबना है । क्योंकि हर चीज अपने अंदर है उसे खोजने की देर है और उसे हमें ही खोजना है । और वो आसान है हमे एक ही चीज करना है ।

 

हमे उस परमात्मा की शरण मे जाना है । ओर उस पर ही सबकुछ छोड देना है । जब व्यक्ति पूर्ण समर्पण कर देता है तो भगवान कहते है । कि मै तुम्हें सब कुछ दूगा, तू बस एक बार सब छोडकर मेरी शरण में तो आ जा, और जो खुद आनंद है वो अपने शरणागत को क्यों आनंद नहीं देगें, वो उसे सुख दुख से परे करे आनंद में डूबो देते है । जो आनंद मे डूब गया. उसे दुनिया में आने की जरूरत नहीं रहती वो तो बस अपने आप में ही मस्त रहता है । वो मौज ही अपने अंदर लाना

 

“राधे राधे” 

 

Comments
2011-12-29 15:55:55 By Ronak

anand hi anand hai, koti koti dhanyewad

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