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आत्मा और परमात्मा

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आत्मा और परमात्मा 

 

आज का संतसग शुरू करने से पहले आईये हम दो मिनिट के लिए बड़े भाव से, बड़े प्रेम से का भगवन नाम का संकीर्तन करें.सब मेरे साथ गाईये.

“गोंविद मेरो है, गोपाल मेरो है गोंविद मेरो है, गोपाल मेरो है, श्री बाके बिहारी नंदलाल मेरो है,”

 

आज हम जिस विषय पर चर्चा करने वाले है, वो है आत्मा और परआत्मा। व्यक्ति का ये जो भौतिक शरीर है, वहीं सब कुछ नहीं क्योंकि ये तो बाहरी है, इन भौतिक तत्वों से भी परे एक चीज है , वो है आत्मा, उसके बारे हम बहुत कम ही जानते हैं, आत्मा का एक खास लक्षण होता है वो है “चैतन्य” पर हमें कैसे पता चलेगा कि आत्मा का लक्षण चैतन्य है,

 

इसको हम ऐसे समझ सकते है, जैसे मान लो हमें जहाँ कहीं से भी धूंआ उठ रहा होगा या जहाँ भी ताप होगा। इसका मतलब क्या है कि वहां आग हैं। हमें दूर से समझ आ जाता है कि यहा आग है और धूंआ उठ रहा है। गर्मी लग रही है आग का लक्षण धूंआ और ताप है। वैसे ही आत्मा का लक्षण चैतन्य है चेतना को हम नकार नहीं सकते क्योंकि चेतना बहुत अनिवार्य चीज है।

 

कुछ लोगों का ऐसा मत रहता है कि जैसे भौतिक तत्वों से मिलकर ही शरीर बना है। वैसे ही भौतिक चीजों से मिलकर आत्मा बनी है, जैसे भौतिक चीजें जब किसी विशेष अवस्था में आ जाती है, तो आत्मा बन जाता है। नहीं नहीं ऐसा नहीं है, आत्मा भौतिक चीजों से मिलकर बनी नहीं है। भौतिक चीजों से मिलकर तो हमारा शरीर बना है।

 

जैसे मान लो कि एक मां है जिसके गर्व में एक बच्चा है, तो भौतिक चीजों से मिलकर उस बच्चे का शरीर तो बन गया। सारी भौतिक चीजे मिली और उसका शरीर बन गया, लेकिन कभी-कभी हमने सुना होगा कि डॉक्टर बोलता है कि बच्चें में धड़कन नहीं है। तो इस बच्चे का कोई मतलब ही नहीं है क्यों उसमें आत्मा ही नहीं है,उसके अंदर चेतना नही है। तो चेतना क्या है अगर मान लो भौतिक चीजों से मिलकर आत्मा बनती तो आत्मा भी उस बच्चे में आ जाना चाहिए.लेकिन आत्मा जो कि भौतिक, सांसारिक चीज नहीं है। भौतिक तत्वों से मिलकर भी वो नहीं बनी, इसलिये हम नहीं कह सकते कि आत्मा भौतिक चीजों से मिलकर बनी है। क्योंकि बनी होती तो वो आ जाती न उस बच्चे में, वो भौतिक चीज नहीं है। शरीर भौतिक चीज है,

 

मान लो एक मशीन है मशीन में एक पुर्जा खराब हो गया, एक पार्ट खराब हो गया हम क्या करेगे उस पार्ट को हमने सुधरवा लिया, हमने उस पार्ट को तो सुधरवा लिया, लेकिन वो कब तक नहीं चलेगा जब तक कि लाईट न आये, इलेक्ट्रिसिटी न आये, इलेक्ट्रिसिटी के बिना पुर्जे सुधवाते रहिये कोई काम का नहीं वो पुर्जा, क्यों? क्योंकि लाईट नहीं है. कहने का अभिप्राय लाईट हमे दिखती तो नहीं है, लेकिन होती है। मशीन तो चल रहीं है। तो कैसे चल रही है, लाईट से चल रही है। तो ऐसे ही शरीर और आत्मा है। रेडियों तरगे हमे दिखती नहीं है, इसका मतलब ये नहीं है कि वो है नहीं, वो है. हवा हमे दिखती नही है पर उसको अनुभव तो कर सकते है ना, ऐसे ही आत्मा हमे दिखती नहीं है, लेकिन हम उसको अनुभव तो कर सकते है ना।

 

ये जो चेतनता हममे है बिना आत्मा की न तो आंख देख सकती है, बिना आत्मा के बिना चेतना के ना हमारा हाथ काम कर सकता है। शरीर का कोई पार्ट काम नहीं करेगा। उस मशीन की तरह, अगर ये आत्मा या ये चेतना न हो ,ये बहुत जरूरी है। इसको जानना बहुत जरूरी है पहले तो ये पता लगाना जरूरी है कि आत्मा क्या है। हमने ये जाना कि आत्मा हमारे शरीर के अंदर है। और ये भौतिक चीजों से मिलकर नही बनी है, और इसका लक्षण है चेतना। कोई भी व्यक्ति है उसके लिये सुख चाहिए। दुख कभी किसी को नहीं चाहिए क्यों,? क्योंकि ये सुख जो है वो आत्मा को चाहिए। ये जो आनंद है आत्मा को चाहिए क्यों,? क्योंकि हम तो एक छोटी सी जीव-आत्मा है और वो क्या है परमात्मा। एक दिव्य आत्मा है एक सुप्रीम सोल जिसे हम कहते है। वो परमात्मा है , उस परमात्मा का हम एक छोटा सा अंश है, चूकि हम उसके अंश है तो उसके गुण भी हममें है। तो इसलिये भी हमारी आत्मा को सुख और आनंद चाहिए। क्योंकि वो जो परमात्मा है, वो साक्षात आनंद है, और वो आनंद है हम उसके अंश है तो हमें भी आनंद चाहिए। इसलिये व्यक्ति हमेशा सुख और आनंद के लिये लालायक रहता है।

 

इस दुनिया जितनी भी चीजें बनती है, ये कौन कर रहा है ये शरीर नहीं कर रहा है, ये जो आत्मा है जो हमारे शरीर मे एक छोटे से अंश के रूप में है वो करती है। ये बड़ी-बड़ी इमारते, सडके, पुल कौन बना रहा है। अगर एक पल के लिये ये आत्मा चेतना शरीर से निकल जाये तो ये शरीर काम कर पायेगा बना पायेंगा इमारतें। नहीं बना पायेगा क्यों? क्योंकि उसमें चेतनता नही वो किस काम का, तो कौन कर रहा है ये वो छोटा सा अणु कर रहा है ये काम जो हमारे अंदर है। तो इससे हम अंदाज लगा सकते है जब एक छोटी सी अध्यामिक चिगारी संसार के इतने काम कर सकती है, तो सोचो वो बडी चिंगारी परमा त्मा क्या नहीं कर सकता। सब कुछ कर सकता है इसलिये वो परमात्मा है।

 

जैसे एक समुद्र है, समुद्र में से हमने एक बूंद ले ली तो उस बूंद में भी वहीं गुण है जो उस समुद्र मे है।  क्योंकि हमने उसी समुद्र में से निकाली है, उस बूंद में भी उस समुद्र के गुण होंगे।  ऐसा ही हम उस परमात्मा से निकले हुये है, तो उसके गुण और अंश हम मे भी है। अब शरीर से इसका क्या संबंध है। शरीर जो है इसके साथ एक चीज जुडी हुई वो है “मन” और मन से जुडी हुई है, “इंद्रियां” तो हम क्या करने में लगे है हम इन भौतिक चीज को बढ़ाने में लगे है। हम शरीर की देखरेख तो करते है इसको दिन प्रतिदिन साफ तो करते है, पर क्या हम कभी आत्मा की तरफ देखते है। कभी नहीं. लोग कहते है दिखती नहीं है तो कहा से करेगे। नहीं ऐसा नही है कि वो दिखती नहीं है तो हम उसका कर नही सकते हम अपनी उन्नित के लिये, शरीर का बहुत कुछ करते है पर आत्मा के लिये हम कभी कुछ नहीं करते। हम इस मन के वश में आकर इस बाहरी जगत में ही लगे रहते है,

 

जैसे मान लो कि एक नाव है वो पानी में है, अब हवा आती है बहुत तेज, तो जिस तरफ हवा होगी वो नाव को उसी तरफ बहा ले जायेगी, बस ऐसे ही हमारा मन है। मन क्या करता इंद्रियों से जुडा रहता है इंद्रियां जो पंचइंद्रिया होती है, ये जो आंख,कान, नाक, जिव्हा, त्वचा, ये सब इंद्रिया है। तो ये मन क्या करता है किसी एक इंद्रि पर केंद्रित हो जाता है। जैसे नाव को तेज हवा बहा के ले जाती है, बस वैसे ये मन उस इंद्रि को बहा के जाता है। कोई अच्छी दिख रही है तो ये मन कहेगा कि हमे वहीं चलना है। तो तुरंत ही हमारी आंखे उस चीज को देखने में लग जायेगी। वो अच्छा बुरा है ये हम नहीं देखते बस मन में बहाव है और हम उसकी तरफ बहने लगे। हम मन और इंद्रियों के बस में है। मन शरीर से जुड़ा हुआ है। इसलिये हम सिर्फ भौतिक जगत की चीजों में लगे है। हम इससे बाहर ही नहीं आ पा रहे, तो  हम बाहरी आनंदो मे लगे है, ज्योही की शरीर नष्ट हुआ सब चीजे नष्ट हो जायेगी। पर हम अंदर आकर उस आत्मा की उन्नित कभी नहीं करते, उसके आनंद को नहीं देखते,

 

आत्मा कभी नष्ट नहीं होती उसके पास जो आनंद है वो सनातन है। वो कभी नष्ट नहीं होना है, इसको हम ऐसे समझ सकते है जैसे मान लो कि कोई व्यक्ति है। उसने अपने जीवन में उसने बहुत पढ़ाई लिखाई की, वो आगे चल के एक बहुत बडा ज्ञानी बन गया। एक महान वैज्ञानिक बन गया, या वो बहुत बडा ज्ञाता बन गया, लेकिन जब वो मरा और मरने के बाद उसे दूसरा जन्म मिला तो फिर से उसे पहली क्लास में क्यो जाना पडता है। फिर से पहली क्लास से क्यो पढना पड़ा अगर उसको नोलेज है पहले जन्म में वो इतना ज्ञानी था, तो अगले जन्म मे भी उसको ज्ञानी होना चाहिए। इस जन्म में उसने 20 से 25 साल पढ-पढ के ज्ञान अर्जित करने में गवा दिये, जब वो मर गया तो फिर अगले जन्म में अपने 20 - 25 साल अपने ज्ञान अर्जित करने गवा दे। ऐसा क्यों नही होता कि इस जन्म में उसने पढ़ लिख लिया तो अगले जन्म में वहीं हो। सारी चीजे उसकी बनी रहे। ऐसा इसलिये नहीं होता कि हमने क्या करा किसको पढ़ा रहे है. हम शरीर को पढ़ा रहे है। हम शरीर को पढ़ाने लिखाने में लगे है, और जैसे शरीर नष्ट होगा ज्ञान जो उस शरीर को दिया वह ज्ञान शरीर के साथ ही नष्ट हो जायेगा। वो ज्ञान आगे नहीं जायेगा कभी भी वो ज्ञान आगे इसलिये नहीं जायेगा क्योकि हमारा शरीर तो वहीं छूट गया हमें किसको ज्ञान देना था? हमें ज्ञान देना था आत्मा को, क्यों? क्योकि आत्मा वहीं रहेगी जो पिछले जन्म थी। शरीर नया मिलना है और हमने क्या किया जो नष्ट होना था हमने उसी को ज्ञान दिया। इसको हम ऐसे समझ सकते है, कम्प्यूटर हम सब जानते है,और ऐसा इमेजिन करो कि कम्प्यूटर में हम जो टाईप करते है, काम करते है और अगर सेव (save ) का ओप्शन न हो, तो हम क्या होगा। हम जितनी भी मेहनत कर रहे है वो बेकार हो जायेगी। क्योंकि जब हमने कुछ टाईप किया और कम्प्यूटर हमने बंद कर दिया और जब हमने दुबारा खोला तो हमे सब कुछ साफ मिलेगा। क्यों? क्योकि हमने उसको सेव नहीं किया था, सेव का तो ओप्शन ही नहीं था। बस ऐसे ही ये शरीर है इसमें सेव का ओप्शन नहीं है। इस शरीर को जैसे ही तुमने ज्ञान दिया। इस शरीर में कब तक रहेगा जब तक ये शरीर है। जहां ये शरीर बंद हुआ और अगले जन्म में दूसरा शरीर मिला, तब सब कुछ सफाचट मिलेगा कुछ भी नहीं मिलेगा। उसकी मेमोरी में ही नही है तो कहा से आयेगा, उसके पास, बस ऐसे ही तो हमने किया|

 

मान लो कि, दो बच्चें है दोनों एक से, लेकिन एक को हमने पढ़ाया लिखाया, और दूसरे की तरफ हमने ध्यान ही नहीं दिया। उसको पढ़ाने लिखाने की तरफ हमने कोई ध्यान नहीं दिया अब जिसको हम पढ़ाने लिखाने मे लगे थे, पता चला जब परीक्षा देने की बारी आई तो जिसको हम पढ़ा रहे थे उसको तो परीक्षा में बैठना ही नहीं था। और वो जो दूसरा लडका था जिसको हमने अनपढ़ ही रखा उसी को परीक्षा में बैठना था। तो क्या वो पास हो पायेगा। नहीं होगा पास, क्यों नहीं होगा, क्योंकि वो तो अनपढ है हमने उसको पढ़ाया नहीं था। और जिसको पढ़ाया था उसको तो परीक्षा में बैठना ही नहीं था। बस ऐसे शरीर और आत्मा है कि हम शरीर की भौतिक चीजों उसी को पढ़ाने लिखाने में लगे है। शरीर को सब कुछ करने में लगे है, पर उसको तो मरने के बाद हमारे साथ जाना ही नहीं है। जाना किसको है आत्मा, आत्मा को हम क्या नोलेज दे रहे है, क्या ज्ञान दे रहे है, एक बार बैठकर सोचे कि हमने आत्मा को क्या दिया आज तक उसने कुछ उन्नति की हम इतने बड़े हो गए हमने उसको कुछ ज्ञान दिया, आत्मा को नहीं दिया हमने शरीर की उन्नति के लिये बहुत कुछ किया। अपनी आत्मिक उन्नति के लिये कुछ किया कुछ भी नहीं किया।

 

संत महात्मा होते है ये क्या करते हैं ये अपने शरीर को सब सुख क्यों नहीं देते, आपने देखा होगा कि जैनीईयों जो महाराज जी होते है वे अपने शरीर पर एक वस्त्र तक धारण नहीं करते ठंडी, गर्मी सब कुछ शरीर से सहते रहते है क्यों, क्योंकि उनको पता है इस शरीर को सुख देने से कोई फायदा नहीं है क्योंकि इस शरीर को हम जितना सुख दे रहे है वो सब तो शरीर के साथ मिट्टी में मिल जायेगा। वो दुनियादारी छोडकर अपनी आत्म उन्नति में लग जाते है।और हम क्या है जैसे एक पीलिया का पेसेंट है। एक व्यक्ति है जिसको पीलिया हुआ है उसको चीनी अच्छी नहीं लगेगी उसको चीनी कड़वी लगेगी।  बस ऐसे ही हमारे साथ है कि हमे कौन सा रोग लगा है हमें देहात्म भाव का रोग लगा है। मतलब हम इस देह को ही सब कुछ माने बैठे है,  जब तक हमें ये रोग लगा है यानि हम बीमार है तो आध्यामिक उन्नति वो आत्मा की उन्नति वो आध्यामिक की मिठास कड़वी लगेगी, वो मिठास हम कभी नहीं पा सकेगे। कब तक, जब तक हम इस शरीर की उन्नति में लगे रहेंगे। जब तक कि हमे ये देहात्मिक भाव का रोग लगा रहेंगा। ये रोग कब जायेगा जब हम आत्मिक उन्नति कर लेंगे। और आत्मिक उन्नति क्या है कैसे आदमी कर सकता है। आत्मिक उन्नति आदमी तक ही होगी जब वह अपने आप से अंदर की ओर आयेगा। अपने अंदर आने का मतलब क्या है अंदर आने का मतलब ये है ध्यान करना भगवान का नाम लेना। ये सिर्फ अभ्यास से होगा संतसग से होगा। क्योंकि भगवान के नाम ही वो शक्ति है। जो आपको संसार से निकाल के इस देहात्म भाव से निकाल कर आपको आत्मिक उन्नति में लगा देगे, क्यों संत महात्मा बार-बार हमें संकीर्तन करने को कहते है। भगवान का नाम क्यों ले रहे है, बार-बार, क्योंकि शरीर के लिये तो बहुत कुछ कर लिया, हम संतसग में बैठे है। तो किस लिये बैठे है आत्मिक उन्नति के लिये बैठे है कि हम अपनी आत्मा को ज्ञान दे रहे है। क्योंकि ये जो हम आध्यामिक ज्ञान दे रहे है ये हमारा शरीर छूट जायेगा लेकिन वो जो ज्ञान हमने दिया है संतसग से, वो हमारा शरीर छूटने पर भी रहेगा  और अगले जन्म में वहीं आत्मा को नया शरीर मिलेगा, तो आत्मा तो वहीं रहेगी जो हमने उसको ज्ञान दिया था। शरीर तो नया मिल जायेगा और फिर वहीं उसके साथ पढ़ाई लिखाई नया ज्ञान जुड़ जायेगा। लेकिन आत्मा का ज्ञान वही रहेगा जो आपने पहले जन्म में स्टोर कर लिया जो  जन्म में पिछले सेव हो गया। क्योंकि वो सेव वाला बटन है वो आत्मा के पास ही है, क्योंकि आत्मा में जो ज्ञान स्टोर करोगे वहीं आपके अगले जन्म तक जायेगी। वो कभी नहीं छूटेगी.

 

व्यक्ति का जो भौतिक शरीर है उसके तीन तत्व है सत्य, रज और तम, इन तीनों में ही व्यक्ति जीता है कभी-कभी हमारे अंदर बहुत अच्छे विचार आते है, तो उस समय हम सातविक गुण में है। कभी-कभी हमारे अंदर दोनों, अच्छे और बुरे विचार आते है. तो हम कौन से गुण में है हम बीच के राजसी गुण मे है. और जब हमें बुरे विचार आते है, तो हम अपने तीसरे तामस गुण में है। ये व्यक्तियों के तीन प्रकार के गुण होते है. सब व्यक्तियों मे होते है। सत्य, रज और तम तो इन तीनों में ही व्यक्ति हमेशा उलझा रहता है. इन तीनों से बाहर नही आ पाता, व्यक्ति कभी इन तीनो से कैसे बाहर आयेगा इन तीनों को जब लाघ जाता है। जब अपने भौतिक शरीर से निकलकर आत्मा की तरफ जाना और ये तीनों को कब लांघने में समर्थ होगा वो जब वो संतसग में जायेगा, संतो के पास आयेगा। उनसे भगवान नाम की चर्चा करेगा। उनके गुणगान करेगे उनकी कथा सुनेगे। और जो कि हम इस भौतिक देहात्म में है। इस देह को ही सब कुछ माने हुये है तो हम से जुडे जितने भी लोग है वो भी इस दौड़ में शामिल है। सब अपनी देह को सबकुछ मानकर अपने में लगे है। पति-पत्नि, घर, बच्चें, परिवार, जितने भी लोग हमसे जुडे है सब के सब बधे हुए है, और जो खुद बंधा हुआ है, तो वो दूसरों को क्या छुडाएंगा, जैसे मेरे हाथ बंधे हुये है और मै आपको कैसे खोल सकती हूं। मैं कब खोल सकती हूं आपको, जब मै स्वतंत्र हूं जब हम स्वतंत्र होगें, तब ही हम दूसरों को खोल सकेगे। जब हम खुद ही स्वतंत्र नहीं होगे., तो दूसरों क्या स्वतंत्र करेंगे। तो हम बंधे हुये है. किसमे, इस भौतिक शरीर में इसके आगे जब हम अपनी आत्म उन्नति नही कर पा रहे तो दूसरे का क्या करेंगे। हम अपने बच्चों की, अपने माता-पिता की जो भी हमारे आस पास जुडे है या संसार के किसी की भी आत्म उन्नति नहीं कर सकते है हम। क्यों नही कर सकते? क्योंकि हमे पता ही नहीं आत्मा क्या है। आत्मा की उन्नति कैसी होती है।  

 

यहाँ एक प्रश्न उठता है.कि क्या हमे अपनी आत्मिक उन्नति के लिये सब कुछ छोड़ देना चाहिए। संसार घर परिवार ही छोड़ दो, क्या ? क्योंकि व्यक्ति जब अंदर आयेगा तो भौतिक चीजों से दूर होता जायेगा। तो इसमे ऐसा नहीं है कि सब कुछ घर बार छोड़ के व्यक्ति जंगल में भाग जाये। नहीं हमे इसी संसार में रहते हुये इन्ही सब चीजों के बीच रहते हुये, इन सब से बाहर निकलना है। जो हम जीवन जी रहे है उसको जीते हुये हमे बस इतना करना है कि बाहर से हटके हम अपने अंदर आ जाये। बाकि जो हमारे कत्वर्य है वो हमे करते जाना है। वो कभी नहीं छोड़ना क्योंकि व्यक्ति कभी अपने कर्म से नहीं भागना.  अपने कर्तव्य को तो हमे निभाना ही हैं। उससे कभी मुंह नहीं मोडना लेकिन उसके साथ-साथ हमे अपनी आत्मिक उन्नति भी करनी है। क्योंकि व्यक्ति अपने परिवार के लिये करता है, अपने बच्चों के लिये करता है, अपने पति-पत्नि के लिये करता है। सब के लिये करते है, हम पर हम अपनी आत्मा के लिये कभी कुछ नही करते । तो हमें बस यही जानना है कि हम अपनी आत्म उन्नति के लिये क्या कर सकते है।

 

संत और भगवान बस ये हमारी आत्म उन्नति मे सहायता कर सकते है,संसार में किसी से भी  कितना भी गहरा सम्बन्ध क्यो न हो. लेकिन यदि वो आपको संसार के बंधनों में बांध रहा है। तो हकीकत मे वो आपका हितेषी नहीं है। पत्नि होने पर भी, वो पत्नि नहीं है जो आपको संसार न छुड़ा सके। पति होने पर भी वो पति नहीं है, जो आपको संसार न छुड़ा सके। सही हितेषी वो है जो आपको बाहर से निकालकर अंदर ले आये। क्योंकि ये आत्मा का ही ज्ञान हमारे साथ जा रहा है। इस आत्मा को जो कुछ हम पढ़ा देगे जो कुछ हम सीखा देंगे बस वहीं हमारे साथ जायेगी। और इस आत्मा को पढ़ाने लिखाने वाले संत महात्मा है।जब संत मंडली मे जाके भगवत चर्चा करते है,भगवान की कथा कहते है जब मुंह से भगवान नाम का उच्चारण करवाते है, बस उसी से हमारी आत्मा को उन्नति होती है।

 

बस वही लालटेन वाली बात आ जाती है। कि व्यक्ति अगर अँधेरे में खडा तो हो, हाथ में लालटेन हो आगे बढ़ेगा उसको प्रकाश अपने आप मिलता जायेगा। कि हमे कहां जाना है, उसको कहीं रस्ता ढूढने की जरूरत नही है। और वो जब हम आत्मिक रूप से देखेंगे। तो वो फिर भगवान से मिलने में कभी बाधा ही नहीं आयेगी। क्योकि जब हम शरीर से हट जायेगे, तो शरीर से हटते ही मन भी हट जायेगा। इंद्रियां भी हट जायेगी सब चीजे वहीं बाहर रह जायेगी। क्या रह जायेगी, एक आत्मा कौन-सी निर्विकार, निर्लिप्त  क्योंकि उसमें किसी प्रकार दोष नहीं है, और वही आत्मा फिर परआत्मा में लग जायेगी। और वो जो संबंध है आत्मा और परआत्मा का बस सबसे बड़ा सबसे गहरा संबंध वही है। क्योंकि आत्मा के पास ही वहीं सनातन आनंद है, और आनंद ही साक्षात वो भगवान परमात्मा है। और जब ये सनातन आनंद उस परआत्मा से मिल जायेगा उसके आगे व्यक्ति को फिर कुछ भी पाने की जरूरत नहीं। संसार का कोई सुख देखने की जरूरत नहीं और वह कुछ चाहेगा ही नही क्योंकि उसे जो चाहिए था वो उसे वही मिल गया। बस यही आत्मा और परआत्मा है।

 

"जय जय श्री राधे "


 

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