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बड़कपन

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आज का संत्संग शुरू करने से पहले आईये हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे. सब मेरे साथ गाये.

 

"श्री राधे-गोपाल, गिरधर-गोपाला , गोपी-गोपाला, प्यारो नंदलाला".....

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है "बडप्पन" तो बडप्पन एक भाव है , एक स्वभाव है । प्रेम से कहिए श्री राधे. तो जीवन में जिसके अंदर ये बडप्पन आ जाता है । उसके लिए जीना भी उतना ही सरल हो जाता है । हम इस कुछ उदाहरणों से समझेंगे इस दुनिया में हर कोई अपने को किसी न किसी चीज को लेकर बडा मानता है. कोई मकान से अपने को बडा मानता है । तो कोई जेवर, कपडे से बडा मान लेता है. और कोई उॅचा पद से अपने को बडा मान लेता है । और जिस व्यक्ति के पास इनमें से कुछ न हो तो लोग उसको छोटा मान लेते है जिसके पास मकान, कपडा , आभूषण, न हो लोग उसकी उतनी पूछ परख नहीं करते जितनी एक पैसे वाले की करते है . ये क्या है । हम धन को ही सब कुछ मान रहे है । जिसके पास धन है । तो वो बडा और जिसके पास नही तो वो छोटा तो ये गलत है । 
 

हम स्वयं उस परमात्मा के अंश है । हम जड वस्तुओं को लेकर बडा और छोटा मानें तों ये एक बहुत बडी विंडबना है । तो हम इन चीजों का उपयोग कर रहे है । ये चीजें हम से है । हम इन से नहीं है. तो हम इनका उपयोग कर रहे है । और हम इनका आदि और अंत जानते है । इनका अंत है नाश है । क्योंकि दुनिया मे जितनी भी चीजें है जो कि जड है भौतिक है और व्यक्ति अगर इन चीजों मकान, धन, को लेकर बडा-छोटा मानते है । तो इसमें क्या बडप्पन है ।ये तो उसकी भूल है । 

 

प्रसंग १.-  जैसे एक व्यक्ति है उसके पास गुण है । तो ज्यादा व्यक्ति उसके पास जाएगे, अगर गुण नहीं है । तो नहीं जायेगे, तो गुण कौन-सा उसका स्वरूप है, गुण भी तो उसने लिया हैए उसका स्वरुप तो नहीं है अगर गुण नहीं है तो लोग उसके पास नहीं जाएगें, तो दूसरे के जाने से वो बडा कैसा हो गया, और न जाने से छोटा कैसे हो गए,  यदि ऐसा है तो वह पराधीन है. गुणों पर निर्भर है जिस व्यक्ति में बडप्पन है वो कभी पराधीन नहीं रखता स्वत्रंत रखता है । कभी-कभी हमारे बडे हमारे अधीन हो जाते है हमारी बात मान लेते है तो हम समझते है वो हमारे अधीन है । ऐसा नहीं है, वो बडे है हमें वो बडप्पन दिखा रहे है । प्रेम से कहिए श्री राधे. व्यक्ति का स्वभाव और कर्म ही उसे बडा बनाते है । उससे ही उसे बडेपन का भाव आता है बडप्पन और बडेपन का भाव दोनों अलग चीज है । 

 

प्रसंग २.-  महाभारत का प्रसंग है जब युध्ष्ठिर जी ने इन्द्रप्रस्थ बसाया, और राजसूय यज्ञ किया तो पूरे भारत के राजाओं को बुलाया, हस्तिनापुर से भी सबको बुलाया पूरे देश के साधु संतो को बुलाया, सभी यज्ञ मे  गए तो भगवान कृष्ण से सबने कहा कि आप बताइए कि किसको कौन सा काम करना चाहिए. तो उन्होनें कहा -  कि भीम खाने की व्यवस्था देखेंगे, और दुर्योधन तो पाडंवो से जलता है तो ये जरूर बाधा डालेगा यज्ञ में तो उन्होंने सोचा कि इसको ऐसी चीज में लगाया जाए कि दिन रात व्यवस्था में लगा रहे, तो उसे धनकोष मे लगा दिया. तो ऐसे सबको उनके हिसाब से काम देते गए भगवान किसी को स्वागत का, तो किसी को जल व्यवस्था, अतं मे  भगवान स्वंय बचे. तो भगवान ने कहा - अब मै क्या करू? तो सबने कहा . कि आप कुछ मत करो अब कोई काम बचा ही नहीं.

 

तो भगवान ने कहा . कि जो संत आएगे मै उनके चरण पादुकाए उतारूगा और पैर धोउगा,  तो ये है बडप्पन. वो त्रिलोकी नाथ है सब जानते है वहा भीष्म पितामह, पांडव, द्रोणाचार्य, सबको पता है प्रथम पूजा भी भगवान कृष्ण को दी. पांडवो ने कहा . कि अगर यहा कोई प्रथम पूज्य है तो वो कृष्ण है । 
 

पर ये भगवावन की उदारता है कि सबसे बडे होकर भी वो क्या काम कर रहे है संतो के पैर धो रहे है । अपने पीताम्बर से उनके पैर पोछ रहे है ।  यही बडप्पन है  कि बडा होते भी बडेपन का अभिमान नहीं है । भगवान ने सबकेा काम बाटे और अपने लिए कौन-सा काम चुना सेवा का. जिसे लोग छोटा समझते है तो सभी संतो को बडे प्यार से बिठाते है और न पैर धोकर अपने पीताम्बर से पोछते है तो ये बडप्पन है वो वहा सबसे बडे है उनसे बडा न कोई है और ना ही कोई हो सकता है । 

संसार में हम बडे तो है पर बडाई किसमे है ये देखना है । किसी चीज को लेकर हमें बडे बन गए तो वो बडप्पन नहीं है । 
 

 

प्रसंग ३.-  भगवान राधा जी के चरण दबा रहे है तो ये उनकी उदारता है । वो सबसे बडे है तो क्यों राधा जी के पैर दबा रहे है वो उनसे प्रेम करते है तो ये उनही उदारता है कि वो बडे होते हूए भी अपने भक्तों के पीछे भागते है । "मै भक्तों का दास और भक्त मेरी मुकुट मणी" जिनके एक-एक रोम में करोडो ब्रह्माण्ड समाए कई पृथ्वी जिनके अंदर है । वो भगवान त्रिलोकपति दास बनने को तैयार है । ये उनका बडप्पन उदारता है प्रेम से कहिए श्री राधे.
 

तो कहने का मतलब है कि हम अगर इन छोटी चीजें से व्यक्ति का होड करेंगे धन को लेकर कि इसके पास इतना है अगर हम इन भौतिक चीजों को लेकर तुलना करेगें तो बडप्पन जीवन में कभी नहीं आ पाएगा तो हम शांति से बैठकर विचार करेंगे तो किसी के आने या जाने सऐ व्यक्ति छोटा बडा नहीं बनता वो तो अपने स्वभाव कर्मों से ही बडा या छोटा होता है ।लोग जातपात से छोटा बडा मानते है । 

 

प्रसंग ४.-  अगर ऐसा होता तो सदना कसाई के घर भगवान क्यों जाते वो कसाई तो मांस बेचता था एक पलडे में मांस और एक पलडे में शालकराम भगवान को रखता था वो तो उसे चमत्कारिक पत्थर समझता था कि एक किलो तोलो तो भी उतना और दो किलो में भी उतना वो नहीं जानता था कि ये पत्थर भगवान है । 

 

एक दिन जब एक ब्राहमण वहा से निकले तो देखा कि ये शालकराम भगवान है और ये कसाई तराजू में रखे है ।तो उन्होंने उसको डांटा . कि भगवान को ऐसी गंदगी में रखे हो एक पलडें में मांस रखे हो और एक में भगवान को उन्हें बाट बनाके रखे हो तो सदना कसाई ने कहा - कि हमें नहीं पता था कि ये शालकराम भगवान है ।

 

अब ब्राहमण ले आए और उन्हें गंगा जल से नहला कर सोने के सिंहासन पर बिठायाए चंदनए पुष्प से पूजा करी रात में उन्हें स्वप्न में भगवान ने दर्शन दिए और कहा-  कि ब्राहमण! तुम मुझे जहा से लाए हो कल मुझे वहीं जाकर रख देना, तो वो कहता है-  कि क्यों प्रभु! मैने आपको नहलाया फिर भी आपको उसी कसाई की गंदगी में जाना है । तो भगवान कहते है । कि जो आनंद तुम्हारे सोने के सिहांसन में भी नहीं है । वो उस सदना कसाई के तराजू में है . जब वो मुझे उस तराजू में रखकर तौलता है मांस को दिन भर वो उपर नीचे होता है ।  वो मुझे पलडे में झुला रहा है और जब वो काम करता है तो मुहॅ से मेरा भजन करता है । मै जब उसकी हाथ रूपी पालने में झूलता हूँ.  भजन सुनता हूँ , यहा तो मै बस सोने के सिहांसन पर बैठा रहता हूँ  । मुझे तुम वापिस कर दो उसका जो भक्ति भाव है मुझे वो चाहिए. प्रेम से कहिए श्री राधे  
क्हने का तात्पर्य है कि भगवान क्यों उस कसाई पर रीझ गए, कोई जात से बडा नहीं होता कि ब्राहमण है या कसाई है

 

"जात पात पूछें नहीं र्कोइ, हरी को भजे सो हरी को होइ"

 

जिसने उस हरी को भजा वो किसी भी जात का हो वहीं बडा है । हम भगवान को सोने से सिंहासन से तौलते है या तराजू से भक्ति भाव से वहीं बडप्पन है । अगर हम भगवान को इन भौतिक चीजों से तौल रहे है उनका और अपने को बडा मान रहे है तो ये गलतफेहमी है  क्योंकि उनसे न तो हम बडे है और ना ही भगवान वो तो जगत को देने वाले है.  उनको कौन क्या दे सकता है । हम भगवान के सामने दीपक जलाते है. पर चाद सुरज जैसा उजाला उसने सबको दिया है । तो क्यों वो हमारा एक दीपक स्वीकार कर लेता है क्योकि ये एक भक्त का भाव है । वो तो पूरे जहान को खिलाने वाला है । वो हमारा भोग क्यों ले लेता हैए ये एक भक्त का भाव है । प्रेम से कहिए श्री राधे 
 

भगवान ये हमें सिखाते है अपने चरित्र से चाहे वो सुदामा का प्रसंग हो एक पल मे क्या नहीं दे दिया भगवान ने सुदामा को वहा भी उन्हेांनें अपना बडप्पन दिखाया ये कभी नहीं कहा कि मै बडा हूँ , और मेरा मित्र छोटा है । अपने सिंहासन पर बिठाया अपने पंलग पर उनको सुलाया क्यों भगवान बिदुरानी के घर गए. इसी तरह जो धनवान है अगर वो अपनी बडाई में लगा रहे तो इसमें क्या बडाई,  वो दूसरों को अपनी तरह ही समझे तो वह बडप्पन है.  

 

प्रसंग ५.-  महाभारत का एक प्रसंग है जब भीष्म पितामह का अंतिम समय आता है तो उनके पास सब लोग जाते है । और भगवान यृध्ष्ठिर से कहते है कि तुम जाकर इनसे ज्ञान लो इनको सब कुछ पता हैए राजधर्म, योगधर्म के बारें मे आप कुछ ज्ञान लीजिए.
 

तो युध्ष्ठिर जी कहते है कि आप ज्ञान दो तो पितामह कहते है कि देखो जब नदी समुद्र में गिरती है तो बहुत सारे बडे.बडे वृक्ष भी नदी के साथ बहते हुए समुद्र में जा मिल जाते है । तो एक दिन समुद्र ने नदी से पूछा-  कि तुम्हारा जल कितना शक्तिशाली हएै तुम्हारा इसका बहाव तुम नदी पहाड से होकर आती है । समुद्र नदी से कह रहा है । और तुम पल भर में कहा से कहा पहुँच जाती हो, लेकिन इसका क्या कारण है कि बडे-बड़े पेड तो तुम्हारें बहाव में आ जाते है. पर छोटे पौधे हरियाली लताओं को तुम बहा कर नहीं ला पाती हो.

 

तो नदी ने कहा -  कि जब-जब मेरे जल का प्रवाह आता है तो जो छोटी घास बेंले रहती है । वो झुक जाती है और मुझे रास्ता दे देती है. तो मै उनको बहा के नहीं ला पाती हूँ . क्योंकि वो झुक जाती है पर वृक्ष नहीं झुकते वो सीना तान के खडे रहते है और मुझे रास्ता नहीं देते है । तो मै उन्हें बहाव के साथ उखाड कर ले आती हूँ . 
 

तो कहने का तात्पर्य है कि वृक्ष बहुत बडे है और घास बहुत छोटी है पर छोटा होनें पर भी वो अपना बडप्पन नहीं भूलती है । कि नदी आ रही है तो मै उसको रास्ता दे दूँ . तो वो घास छोटी होते हुए भी बडी हो जाती है और वो वृक्ष है वो बडे होते हुए भी बडप्पन नहीं दिखाते और झुकते नहीं है । रास्ता नहीं देते नदी को तो वो उनको बहा के ले जाती है ।

 

वो कहते है कि "बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड खजूर पंथी को छाया नहीं  फल लागे अति दूर"

 

खजूर का जो पेड होता है वो बहुत ही लंबा होता है । उसके फल बहुत उपर होते तो जब कोई राहगीर निकलता है तो वो उसके फल भी नहीं खा पाता. और ना ही उसको छाया मिलती है. तो ऐसा बडा होना भी क्या काम का, कि न ही तो फल खा पा रहा और ना ही किसी को छाया मिल रही है । ऐसा बडप्पन क्या काम है इसमें क्या बडे है बडाई छोटा बनने में ही है दूसरेां के साथ विनम्र होने में ही है । बडा होने पर अगर अंहकार आ गया तो वो तो फिर अकड में ही टूट जायेगा है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग ६.-  एक राजा था वो कहता कि मै गुरू बनाना चाहता हूँ. पर उसे जो बडा और विद्वान है, कोई ऐसा व्यक्ति राज्य में है  तो वो आगें आए अब जितने विद्वान थे सब आ गए ओर पैसे वाले भी आ गए राजा ने कहा था जिनके पास पैसा हो वो ही आए तो राजा ने पूछा तो किसी ने कहा -  कि मेरे पास इतनी जमीन है, इतना पैसा है, इतने आश्रम है मेरे, दूसरे ने कहा कि मेरे पास सौ एकड जमीन है और मेरे बहुत शिष्य है। ऐसा करते करते बहुत लोग आए विद्वान आए.
 

एक गुरू बैठे थे वो कुछ नहीं बोले तो राजा ने कहा - कि आप कुछ बोलिए, तो वो बोले कि मै भी बडा हूँ ,पर मै आपको दिखा नहीं सकता आपको मेरा बडप्पन देखना है तो मेरे साथ चलना होगा, तो राजा ने कहा -  कि चलो! फिर वो एक वन में गए और एक पेड के पास जाकर रूक गए. जो राजा ने कहा - कि यही आपका आश्रम है तो गुरू ने कहा - कि ये जो वन, जमीन आसमान देख रहे हो यहीं मेरा है । ये खुला आसमान मेरी जागीर है ये जमीन वृक्ष ही मेरी जागीर है । जो उसने ये वाक्य बोले तो राजा उनके चरणों में गिर पडा और बोला वास्तव में आप ही मेरे गुरू मै आप ही की खोज कर रहा था .

 

मै जानता हूँ ,धन से कोई बडा नहीं होता है वो क्या सिखाएगा जिसमें धन का अंहकार हो,  मान हो क्योंकि हम जिन चीजों को लेकर बडे बन रहे है वो सारी चीजें तो यहीं छूट जानी है । अगर हम पद धन को लेकर बडे बन रहे है तो लोग धन के लिए क्या नहीं करते है भूल जाते है कि ये सब यही छूट जाता है । ये सब तो जड है । बडा कौन है, जो स्वतत्रंता दे, हक नहीं जमाये और जैसे ही ये जडता जाती है, वस्तुओं के प्रति दासता जाती है वैसे ही ये पराधीनता छूट जाती है और हम भक्त बन जाते है । तो हमें अपने कर्मों से ही बडा बनना है भगवान कृष्ण जैसा ही बडप्पन लाना है ।

 

 

"राधे-राधे"


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