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क्षमा

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आईये आज का सत्संग शुरू करने से पहले आईये हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये ..

 

आओ आओं , मेरे नंदलालआजो , आओ आओं ,मेरे मेरे गोपालआ जाओ ......

 

श्री राधा रानी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है ।

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है “क्षमा” तो ये क्या है । क्षमा धर्म है ,व्यक्ति का कर्म है, स्वभाव है, जिसके जीवन में क्षमा नहीं उसके जीवन में कभी शांति आ ही नहीं सकती है । क्षमा व्यक्ति का स्वभाव, कर्म, होना चाहिए.

 

हम देखते है कि इस दुनिया में व्यक्तियों की आपस में बनती नहीं है उनके विचार आपस मिलते नहीं है तो फिर झगडे होते है और झगडे में दो व्यक्तियों के अहंकार टकराते है कि वो कहता है कि मै सही हूँ दूसरा कहता है कि मै ही सही हूँ. और ये आगे जाकर व्यक्ति गांठ बाँध लेता है । कि मै इससे से भी बढकर बुरा करूगाँ ये हम गाठ बांध लेते है. कि हम भी बदला लेगे कोई एक दूसरे को क्षमा करना नहीं चाहता और अगर क्षमा कर दे तो सारा झगडा ही मिट जाए.

 

क्योंकि जहाँ एक व्यक्ति क्षमा कर देगा कि ये तो उस व्यक्ति का कर्म है गलती इंसान से ही होती है । क्षमा करने से व्यक्ति को शांति मिलती है । और यहीं सबसे बडी चीज है । दुनिया में शांति के लिए कुछ भी करना पडे तो समझ लेना कि वो चीज अनमोल है । आज की दुनिया में धन पैसा है पर व्यक्ति के पास शांति नहीं है । वो तो जीवन में भाग ही रहा है । अंहकार ही लोगों के टकराते है । अंशाति को रोकने के लिए और शांति को लाने के लिए क्षमा लाना बहुत जरूरी है । तो क्षमा प्रेम है । क्षमा धर्म होना चाहिए ।

 

प्रसंग १-  एक जंगल था उसमें एक गाय रहती थी वो बहुत ताकतवर थी एक बंदर आता और रोज उसकी पीठ पर बैठकर कभी उसके कान खीचता,  कभी पूछॅ. तो ये उसको नियम बन गया पर वो गाय कुछ भी नहीं करती थी. उसको कभी क्रोध भी नहीं आता था तो वो गाय एक उच्च आत्मा थी वो संत थी, तो ऐसा करते-करते बहुत दिन हो गए. तो एक दिन उसके क्या किया कि उसको जोर से काटा और गाय को खून निकल आया पर वो कुछ भी नहीं बोली. तो उपर से आकाषवाणी हुई कि तुम कुछ कहती क्यों नहीं वो तुम्हे रोज तंग करता है ।

 

बंदर पर तुम तो चुपचाप रहती हो तो वो कहती है-  कि भगवान जो अपने से बलवान है उसके सब क्षमा करे देते है उसके अधीन हो जाते है. वो जो कहेगा हम वहीं करेगें तो जो अपने से छोटे को क्षमा करे दे जो उससे कम बलषाली है वास्तव में वो ही महान है । इसलिए बंदर को तो मै मार भी सकती हू पर क्या अंतर रह जाएगा इसमें और मुझ में क्षमा से बढकर कुछ भी नहीं है

 

अंहकार की जहाँ बात आती है । वहाँ व्यक्ति कहता है कि मै क्यों आगें बढकर उससे क्षमा माँगू । बस यहीं नहीं कर पाता व्यक्ति जिसने ये कर दिया ये स्वभाव है क्षमा. व्यक्ति की आदत नहीं स्वभाव होना चाहिए. इन दोंनो में अंतर है स्वभाव व्यक्ति के अंदर से आता है । और आदत वो है जो करते करते बन जाती है और वो छूट सकती है । पर स्वभाव तो जन्म से होता है वो छूटता नहीं है तो क्षमा आदत नहीं स्वभाव होना चाहिए इसलिए ये बडी उॅची चीज है ।

 

दो परिवार है जिनमें किसी चीज को लेकर झगडा हो जाता है । तो कोट तक बात पहुँच जाती है । तो घर से बाहर तक बात कैसे पहुँची गई क्योंकि किसी ने किसी को क्षमा नहीं किया और वो तो मर गए जिनका झगडा था उनके बाद की पीढियाँ लड रही है उनके जाने के बाद केस चले जा रहा है । और लोगों को ये पता नहीं अब कि झगडा किस बात का है । पर वो अंहकार में लडते जा रहे है तो ये कब  होता है जब व्यक्ति क्षमा नहीं कर पाता है ।

 

प्रसंग २-  भगवान बुद् के एक शिष्य थे वो आश्रम छोडकर जाने लगे क्योंकि उनकी शिक्षा पूरी हो गई थी तो बुद्व ने कहा - कि अब तुम्हारी शिक्षा पूरी हो गई है तुम संसार मे जा रहे हो और तुम्हें दुनिया मे हर प्रकार के लोग मिलेंगे अच्छे और बुरे भी. तो तुम क्या करोगे.?

 

तो वो कहता है-  कि अच्छे लोग मिलेंगे तो मै सोचूगाँ कि भगवान मेरे उपर मेहरबान है । और अगर बुरे मिले तो मै भगवान का शुक्रिया  करूगाँ कि मुझे बुरे तो मिले पर मुझसे तो बुरा नहीं बोले. तो मै उनकेा क्षमा कर दूगाँ ।

 

तो बुद्व बोले कि कुछ लोग तुम्हें बुरा बोल भी बोंलगे तो वो कहता - कि मै उन्हें क्षमा कर दूगाँ कि उन्हेांनें मुझे गाली तो नहीं दी.

 

तो बुद्व बोले कि-  कुछ लोग तुम्हें गाली भी देंगे.

तब तो वो बोला - कि मै उनकेा भी क्षम  कर दूगाँ कि उन्हेंनें मुझे गाली दी पर मेरे उपर हाथ तो नहीं उठाया.

तो बुद्व ने कहा - कि उनमें से कुछ लोग तुम्हारे उपर हाथ भी उठा सकते है वो तुम्हीं मार भी देगं. तो वो शिष्य बोला - कि मै उनकेा भी क्षमा कर दूगाँ. तो बुद्व बोले क्यों?

तो वो कहता है-  कि मै सोचूगा कि इन लेागों ने मुझे हाथ से मारा पर हथियार से नही तो बुद्व कहते है -  की इस संसार में लोग छोटी-सी बात पर हथियार उठा लेते है और एक दूसरे केा मार देते है  तब तुम क्या करोगे?

 

तो वो शिष्य बोला - कि मै फिर भी उनकेा क्षमा कर दूगाँ. ये सोचकर कि उन्हेानें मुझे मारा पर जान से तो नहीं. 

 

तो बुद्व कहते है - कि कुछ लोग तुम्हें जान से मार देंगे फिर तो वो बोला कि - मै उन्हें भी क्षमा कर दूगाँ क्योंकि यें संसार तो दुखों से भरा है । उस व्यक्ति ने मुझे संसार से मुक्तिी दिला दी उसे क्षमा कर दूगा प्रेम से कहिए श्री राधे

 

तो जिस व्यक्ति का स्वभाव क्षमा करना हो वो तो किसी के हर पाप को क्षमा कर देगा उसके लिए ये दुनिया मे गलती हर इंसान से होती है । और बडा वो क्षमा कर दें.

 

भगवान राम तो रावण को क्षमा करने को भी तैयार थे कि तुम मेरी शरण में आ जाओ मै भूल जाउगा कि तुमने सीता का हरण किया है पर वो नहीं माना क्योंकि उसमें अंहकार भरा हुआ था वो लडता रहा भगवान ने रामायण में जब विश्वामित्र राज जी को लेकर जाते है तो रास्ते में गौतम ऋषि का आश्रम था जो बिलकुल उजाड था उसमें  कोई भी जानवर पक्षी नहीं जाते थे वहां उनकी पत्नी एक पत्थर के रूप में थी जो गौतम  ऋषि के श्राप के कारण शिला बन गई थी गौतम ने उन्हें क्षमा नहीं किया तब विष्वामित्र बोले राम इनके पति ने इन्हें क्षम नहीं किया और ये सोच रही है कि  इस दुनिया में एक व्यक्ति ऐसा होगा जोकि इनकेा क्षमा कर देगा तो राम आप इनको तारो तो ये  कथा हम बसको मालूम है । बडा काम है गिरे हुए को उठाना क्षमा कराना श्राप तो हर केाई दे देता है ।

 

परमात्मा इतना मेहरबान है कि वो हमारी बडी गलतियों को क्षमा कर देता है । पर हम क्यों उस परमात्मा के अंष होते हुए भी आपस में लडतें है . ओर एक दूसरे केा क्षमा नहीं करते । उस परमात्मा के रास्ते पर चलना चाहिए. वृक्ष कितना परोपकारी है । वो हमें छाया देता है फल, फूल देता है, अनाज देता है। क्या नहीं करते वो.

 

व्यक्ति क्या करता है उसके काटकर अपने घर के दरवाजे बना लेते है । पर वृक्ष क्षमा कर देता है । जब हम वृक्ष केा पत्थर मारते है तो वो हमें फल देता है । इसी से वो महान परोपकारी है । तो जो क्षमा कर देता है । वो महान है । जो क्षमा ना करे तो  वो तो राक्षस के जैसा है । ये पृथ्वी कितनी क्षमाशील है ।  हम गढढा करते खोदते है पर हमें वो अन्न जल देती है । कितनी क्षमावान है । ये ये सब व्यक्ति यों के  अच्छे बुरे कर्म सभी केा अपने साथ रखती है भेदभाव नहीं करती है । ये क्षमा उसको स्वभाव  है । क्षमा शांति और प्रेम लाती है । जिसके जीवन में क्षमा आ गई उसको फिर किसी की जरूरत नहीं है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग ३-  एक संत थे वो ना किसी का बुरा करते थे ना बुरा सुनते थे तो लोग उनकेा बहुत अच्छा मानते थे पर उनमें से कुछ लोग उनसे घृणा करते थे वो उनके आलोचक थे तो उनकेा लगता था कि वो संत केा मार दें.

एक बार तो उसने सोच लिया कि आज मै इसको मार ही दूगा तो वो रात में गया संत सो रहे थे । और जैसे ही वो तलवार मारने लगा तो तो संत जाग गए तो वो वयक्ति घबरा गया कि ये  अभी शोर  मचाऐंगे और सब लोग आ जाएगें पर वो संत कहने लगे कि हे भगवान इस व्यक्ति को सदबुद्वि दे दो इसके कर्म बदल जाएगे और ये अच्छा बन जाएगा ये भटक गया है । और जब उस व्यक्ति ने संत की ये बात सुनी तो उसके हाथ से तलवार गिर गई. और संत के चरणों में गिर गया.

 

तो क्षमा कितनों का जीवन बदल देगी तो बदलाव सबसे पहले हमें अपने मे लाना होगा पर वो दूसरों मे लाता है इससे बात नहीं बनती. हम अपने अंहकार केा कम नहीं करेंगें तो बात नहीं बनेगेी तो हमे क्षमा लानी होगी अपने अंदर. तो क्षमा प्रेम है, शांति है, धर्म है . और यहीं व्यक्ति का स्वभाव होना चाहिए तो हम सब केाषिष करें तो क्षमा हमारी आदत से स्वभाव बन जाएगी ।

 

“राधे-राधे” 

 

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2011-08-10 16:12:55 By Vipin Sharma

Radhe Radhe

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