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प्रतीक्षा और परीक्षा

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आईये आज का सत्संग शुरू करने से पहले हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का संकीर्तन करे सब मेरे साथ गाये

 

राधे गोविंदा  भजो राधे गोविंदा श्री राधे गोविंद अभाजो राधे गोविंदा ....

 

श्री राधारानी जी बाँके बिहारी जी के चरणों में कोटि केाटि वंदन है ।

आज का हमारा सतसंग का विषय है “प्रतीक्षा और परीक्षा” हम सभी इन दोनों शब्दों का मतलब जानते है । प्रतीक्षा का मतलब होता है किसी का इंतजार करना और परीक्षा का मतलब है किसी का परीक्षण करना. वो कहते है कि आज हमारी परीक्षा है मतलब परीक्षण है कि हम कितना जानते है । ये तो इनकी छोटी सी परिभाषा है.

 

प्रतीक्षा मतलब इंतजार तो इस दुनिया में हर व्यक्ति यहीं कर रहा है । प्रतीक्षा ही कर रहा है तो किसकी कर रह है । तो व्यक्ति एक तो वस्तुओं का इंतजार कर रहा है दूसरा व्यक्ति इस जगत के लोगों का. कि ये व्यक्ति ये कर देगा, वो मेरा ये काम कर देगा ।

 

ये हम वस्तुओं का इंतजार कर रहे है ये क्या है कि फलानी वस्तु  अगर हमारे पास आ जाएगी तो हम सुखी हो जाएगे । हम प्रतीक्षा कर रहे है । हमारे घर में जब टीबी या कोई भी भौतिक चीज आती है तो हम ये सोचते है कि इससे हमें सुख मिलेगा हम ये क्या कर रहे है । तो ये वस्तुओं के प्रति हमारा लगाव औेर मोह है. पर क्या वास्तव में ऐसा होता है । वो वस्तु हमारे घर में आ जाती है तो कुछ दिनों तक तो वो हमें सुख देती है फिर दुःख देने लगती है . पर उसके बाद हमें वो अच्छी नहीं लगती और जो दूसरों के पास होती है वो हमें अपनी से अच्छी लगती है । तो उस वस्तु ने हमें जो सुख दिया वो तो क्षणिक है । प्रेम से केहिए श्री राधे

 

तो जब तक व्यक्ति के पास वस्तु नहीं आती तब तक प्रतीक्षा उसके बाद दूसरी अच्छी लगने लगती है । तो ये वस्तुओं के प्रति हमारा लगाव है । हमें लगता है कि ये भौतिक चीजें ही हमें सुख दे सकती है । जब हमारे पास घर नही होता है तो हमें लगता है कि घर हो जाए और जब घर बन जाता है । तो व्यक्ति को लगता है कि इसके पास तो दो घर है । तो जगत में हमें ये सोचना है कि हम किसका इंतजार कर रहे है सबकुछ तो मिट जाना है । भौतिक चीजें तो दस साल या बीस साल में हमारे सामनें हरी खत्म हो जाती है । कुछ समय बाद उसको् हटा देते है तो जो खराब होने वाली है उनमें हम अपना दिन रात खराब कर रहे है । फिर हम वस्तु को छोड कर देंखें.

 

हम लोंगो की प्रतीक्षा करते है कि वो आ जाए तो हमारा दुख दूर करेगा तो इस दुनिया में केाई पूर्ण है ही नहीं पूर्ण अगर कोई है तो वो केवल भगवान उनकी आखे खा भी सकती है, देख भी सकती है, सुन भी सकती है. पर हमारी आखें सारे काम नहीं कर सकती है । हम पूर्ण नहीं है और जो खुद नहीं है वो दूसरों को क्या करेगा पूर्ण.

 

प्रसंग १-. जैसे एक लडका और लडकी थी तो लडके को लगता कि ये लडकी मेरी जिदंगी में आ जाए  तो उसके सारे काम  बन जाएगे तो वो उससे इतना प्यार करने लगा कि उसके लिए जान भी देनें को तैयार हो गया उसके कहने पर कुछ भी कर सकता था । उसे उसका ही इंतजार था तो एक दिन वो उस लडकी के घर  गया तो  वो सो रही थी तो वो उसके पास गया और उसके तकिए के नीचे एक प्रेम पत्र देखा और पढने लगा. तो बड़ा खुश हुआ पर जब उसने अंत में देखा तो वो किसी दूसरे के लिए था अब वो  आगबबूला हो गया और जान लेने को तैयार हो गया तो वहीं लडकी जो उसे सुख दे रही थी वो उसे  दुख देने लगी

 

तो हम उसका इंतजार कर रहे है. जो खुद ही सुख की तलाष में है । हमें क्या करना है अगर हमें प्रतीक्षा करनी है तो उस परमात्मा की. पर हम लोंगो की और वस्तुओं में दौलत का इंतजार, ही कर रहे है और इसमें जीना मुष्किल हो जाता है ।

 

प्रसंग २- एक बार का प्रसंग है । एक लडकी थी वो रोज एस टी डी पर जाती औैर रोज वो फोन पर बात करती और बुरका पहने रहती थी तो एक लडका रोज वहीं एस टी डी के बाहर बैठा रहता और कहता कि “खुदा करे तो सैलाब आए मेरा महबूब बेनकाब आए” ऐसा करते बहुत दिन हो गए.

 

एक दिन वो लडकी आई पर वो लडका नहीं था तो उसने पूछा कि भाई वो लडका कहाँ गया तो वो बोला कि वो तो मर गया फिर वो लडकी बोली - कि उसके कौन-सी कब्र में दफनाया गया तो वो वहा जाती है उसकी क्रब में और बुरखा हटाती है. तो कब्र से आवाज आती है “खुदा ने चाहा तो सैलाब आया है आज हम पर्दें में है तो मेहबूब  बेनकाब आया है्” । ये क्या है ऐसा कैसा इंतजार, मरने के बाद भी आत्मा को शांति नही तो ऐसा इंतजार ना हो कि मरने के बाद भी मोह ना टूटे. और प्रतीक्षा खत्म ना हो

 

इंतज़ार ऐसा ना हो जो व्यक्ति को बर्बाद कर दे ये तो प्रतीक्षा की बात है ।

 

अब आती है परीक्षा की बारी तो हम भगवान की परीक्षा लेते है उलटा करते है जिनकी प्रतीक्षा करनी चाहिए उनकी परीक्षा लेते है । हम प्रतीक्षा तो जगत कि करते है पर परीक्षा भगवन कि करते है .कि भगवान ये काम कर दो, सौ रूपए का प्रसाद चढाउगा भगवान मेरा ये काम कर दो, ये क्या है भगवान की परीक्षा है. कर्म हम करें परीक्षा भगवान की, अगर काम बन गया तो ठीक है और ना बना तो भगवान तुमने मेरे साथ बुरा किया. जिसने हमारा साथ दिया हमेषा उसकी परीक्षा लेते है और जगत के लोग और वस्तुएँ जो एक दिन हमें छोड देंगी उनकी परीक्षा लेते है । भगवान जो हमेषा साथे देंगे उनकी हम प्रतीक्षा नहीं परीक्षा लेते है ।

 

प्रसंग 3- एक बार का प्रसंग है एक व्यक्ति था एक गाँव में रहता था तो उसमें बाढ आई तो सब लोग खाली करने लगे पर वो व्यक्ति अपने घर में ही रहता है और कहता है कि मै नहीं जाउगाँ मेरे भगवान जी बचाने आएगें धीरे धीरे बाढ का पानी और बढता है । और नाव में कुछ लोग आते है कि चलो पर वो व्यक्ति कहता है - कि मै नहीं जाउगाँ और पानी बढता है तो वो अपने मकान की तीसरी मंजिल पर चढ जाता है कुछ देर बाद हेलिकाप्टर पर लोग आते है । और उससे कहते है कि चलो पर वो फिर भी नहीं जाता और अंत में उसका मकान डूब जाता है. और वो मर जाता है .

 

वो मरने के बाद उपर जाता है और कहता कि भगवान मैने आपके इंतजार में सबको मना कर दिया पर आप मुझे बचाने नहीं आए तो भगवान कहते कि जो लोग नाव हेलिकाप्टर लेकर आए थे वो मै ही तो था पर हर बार तुमने ही मना कर दिया क्योंकि तुम मेरी परीक्षा ले रहे थे कि मै साक्षात तुम्हें बचाने आउॅ । मै तुम्हें इतनी बार बचाने आया पर तुम नहीं आए प्रेम से कहिए श्री राधे तो कहने का मतलब हम हमेषा परीक्षा लेते है्र तो  हमें प्रतीक्षा करनी है भगवान की इंतजार करना है और परीक्षा संसार के लोंगो की लेनी है कि कौन हमारे साथ है हम तो खुद की भी कभी परीक्षा नहीं लेते भगवान की लेते है इस संसार की परीक्षा लो क्योंकि जिसने संसार को छोडकर भगवान की प्रतीक्षा की है उन सब ने भगवान को पाया है ।

 

प्रसंग 4- तुलसीदास जी के जीवन का प्रसंग है  कि जब वो बडे हुए तो उनकी शादी हुई तो उनको पत्निी से बडा प्रेम था वो उसके बिना रह नहीं पाते थे एक भी पल जब एक दिन वो बाजार गए तो उनकी पत्निी अपने भाई के साथ मायके चली गई और जब तुलसी दास जी घर आए तो उन्हें ना देख कर इतने व्याकुल हो गए कि आधी रात को बारिष में ही उनसे मिलने चले गए और नदी को पार कर जब उनके घर में पहुँचे तो दीवार पर सांप लटका था उसे रस्सी समझकर उपर चढ गए औेर पत्निी के पास पहुँच कर जब खडे हुए तो उन्हेांने उनको धिक्कारा कि तुम इस हाडमासं के शरीर की  इतनी प्रतीक्षा करते हो अगर इतनी परमात्मा की करते तो आज वो तुम्हारे सामने आ जाते तो तुलसी दास जी वहार से चले गए.

 

और परमात्मा में ही अपना मन लगाया ओर उनको कई बार भगवान ने साक्षात दर्षन दिए तो संसार के लोगों की प्रतीक्षा छोडकर भगवान की करनी है । हनुमान जी ने उन्हें दर्षन दिए रामचरित मानस उन्हेंने लिखा तो संसार के लोग अगर हमें मिल भी जाएगें तो साथ छोड देंगे पर वो परामात्मा कभी साथ नहीं छोडेगा.

 

शबरी की तरह प्रतीक्षा करो उसने ये जाना के कौन अपना कौन पराया पर कभी कुछ कहा नहीं और उम्र बीत गई प्रतीक्षा करते करते भगवान राम भी क्या कहते है कि जो शबरी की तरह मेरी प्रतीक्षा करते है उनको मेरे पास आने की जरूरत नहीं है मै खुद ही उनके पास जाता हूँ । मै उन्हें खोजकर उनके पास चला जाता हॅू । कोई शबरी की तरह प्रतीक्षा तो करे । जगत के लोग तो परीक्षा लेते रहते है । हमें प्रकृति में से परमात्मा को निकालना आना चाहिये.  

 

इस जगत की परीक्षा लेनी चाहिए कि कौन अपना कौन पराया है । और जब ये पता चल जाए तो शांत रहना कहना नहीं है किसी से कुछ परीक्षण बस करना है । प्रेम से कहिए श्री राधे तो ये दोंनो शब्द प्रतीक्षा और परीक्षा अपने आप में महत्पपूर्ण है हमें देखना है कि हम किसकी प्रतीक्षा कर रहे है । और किसकी परीक्षा ले रहे है । और अगर हम परमात्मा की परीक्षा ले रहे है और जगत की प्रतीक्षा कर रहे है तो दोंनो ही गलत है ।

 

“राधे-राधे”

 

Comments
2011-10-18 21:14:11 By Vandana Goel

Haribol!

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