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दया

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आइए  आज का सतसंग शुरू करने से पहले हम कुछ पलों के लिए भगवन नाम का कीर्तन करें,सब मेरे साथ गाईये .

 

“गोविंद के गुण गाईये, गोपाल के गुण गाईये, द्वार मन के खोल कहिये, आईये हरि आईये ....”

 

आज का हमारा सतसंग का विषय है । “दया” तो दया वो चीज है भगवान जब किसी पर कृपा करते है । यूँ तो उनकी कृपा हर प्राणी पर होती है । भगवान के लिए ये दुनिया उसका परिवार घर है । इसलिए वो हर प्राणी पर दया करता है । और उसकी जो विशेष कृपा किस पर करता है क्योकि ये दया बहुत ऊँची चीज है. ये देखना है हम कहते है ,प्रभु हम पर दया करो तो भगवान कहते है । कि मुझे याद करो अगर हम इसका उलटा करें तो होता है “याद” तो हम भगवान से कहते है कि प्रभु दया करो तो वो कहते है कि पहले मुझे याद करो. पर उनकी दया तो सब पर बरस रही है । हम उन्हीं याद नहीं कर रहे है । जो उन्हें जैसे याद करता है भगवान भी उसका वैसे ही भजन करते है ।

 

प्रसंग १.- महाभारत में एक बार भगवान सुबह आख बंद करके किसी को याद कर रहे है तो युधिष्ठिर ने उन्हें देखा तो पूछा कि वासुदेव ! आप भी किसी को याद करते है ध्यान करते है । आप तो त्रिलोकपति हो आप भी किसी का ध्यान करते हो तो भगवान कहते है कि जो मुझे याद करते है मै उन भक्तों को याद करता हूँ । मै उसको याद ही नहीं करता हूँ उस पर दया भी करता हूँ.

 

कहने का मतलब उसकी दया के बिना उस तक पहूँच ही नहीं सकता है । उसकी दया के लिए हमें क्या करना है । हमें उसे याद रखना है । हमारा जो तरीका उसे याद करने का है, वो ही उसकी दया  करने का है । अगर हम उसे अपना बचा खुचा समय देते है तो वो भी हमारे साथ वैसा ही करेगा जब हमारा बुरा समय है तभी याद कर रहे है, तो ये मापना की हम की स्तर का याद कर रहे है, वो तो सब पर दया करता है,

 

राधा रानी जी तो इतनी करूणामयी है कि वो तो किसी को दुखी देख ही नहीं सकती है । जब भगवान कृष्ण उनके पास जाते है तो राधा जी दूर से ही कह देती है । कि मेरे पास मत आओ तो कहते है कहाँ जाउॅ फिर तो वो कहती है कि वो व्यक्ति बहुत दुखी है जाओ पहले उसका दुख दूर मुझसे उसका दुख देखा नहीं जाता है । तो भगवान राधारानी जी के प्रिय है तो वो उनको पास नहीं आने देती है पहले भक्तों के दुख को दूर करने को कहती है । तो राधी जी की दया तो महान है ।

 

प्रसंग २-  एक बार नारदजी बैकुण्ठ लोक गए और भगवान से बोले कि प्रभु आपका सबसे प्रिय भक्त कौन है । तो भगवान ने कहा - कि मुझे तो सभी प्रिय है । फिर भी नारद जी ने कहा - कौन सबसे प्रिय है । तो भगवान ने कहा - कि वो व्यक्ति देख रहे हो पृथ्वी पर, मुझे बहुत प्रिय है । अब नारद जी को लगा कि भगवान मेरा नाम लेगे तो उन्होंने पूछा वो आपको क्यों प्रिय है?

 

भगवान कहते है - वो किसान है सुबह उठते ही मेरा नाम लेता है कि प्रभु आपने मुझे नींद दी. फिर खेत में जाता है और काम करता जाता है । दिन भर काम करता है और मेरा नाम भी लेता रहता है । मुझे याद करता जाता है एक पल के लिए भी नहींभूलता ओर काम भी करता जाता है. नारद जी को कुछ समझ में नहीं आता.

 

भगवान ने कहा-  कि नारद तुम एक दीपक हाथ मे लेकर पृथ्वी की परिक्रमा करो, और ये दीपक बुझना नहीं चाहिए, नारद जी चलने लगे सुबह से शाम हो गई और आ गए प्रभु के पास और बोले - कि ये दीपक मैने बुझने नहीं दिया. मैने आपका काम बराबर से किया.

 

तो भगवान ने कहा - कि जब तुम ये दीपक लेकर तीनों लोक में गए तो कितनी बार तुमने मेरा नाम लिया तो नारद जी कहते है - कि मैनें तो एक बार भी याद नहीं किया, मेरा सारा ध्यान तो इस दीपक में था, इसलिए नाम ही नहीं लिया. तो भगवान कहते कि नारद अब तुम्हें समझ में आया कि वो व्यक्ति मुझें प्रिय क्यों है । तो काम करते हुए नाम लेना बहुत जरूरी है । सुमिरन करते रहना चाहिए याद प्रभु की हर पल बनी रहे. याद प्रभु और हमारे बीच की डोर है जो हमें उनसे बाँधें है । तो भगवान कहते है देखो वो व्यक्ति सुबह से शाम तक काम करता है और मुझे नहीं भुलता वो याद करता है काम भी ।

 

कहने का मतलब भगवान सब पर दया करते है । जैसे पंतग होती है और उसकी एक डोर होती है । उसे वो बधी रहती है । पंतग उडाने के वाले के हाथ में डोरी होती है, जो जैसे ही वो खींचता है डोरी तो पंतग भी खिंचती है तो वो तीनों एक दूसरे से जुडे है । डोर हिलेगी, तो पतंग भी हिलेगी ,तो ये पतंग डोर हमारा हाथ, हमारे हाथ की कला है उड़ाती आकाश में है पर क्यों हमारे वश में रहती है ­­तो उडती आकाश में है और रहती हमारे हाथ में है ।

 

तो हम किस तरह भगवान को याद कर रहे है । ये हम पर निर्भर करता है । भगवान अपने भक्त के अधीन है । जो मेरा भक्त चाहेगा जैसा चाहेगा मै तो उसके पीछे पीछे हूँ । पर कब जब वो याद करेगा तो याद और दया का गहरा संबंध है । उनकी दया और हमारी याद इन्हीं दोनों का संबंध परमात्मा की प्राप्ति है । प्रेम से कहिए श्री राधे

 

प्रसंग ३- हम अगर ब्रज गोपियों को देखें तो वो वृदांवन में बहुत याद करती थी और जब भगवान मथुरा चले गए तो और भी ज्यादा करती थी भगवान को ये जो आम दुनिया होती है । यदि कोई मर जाता है  तो इसमें उसका दूर का रिश्तेदार होगा वो दो मिनिट रोएगा, और परिवार वाले एक दो महीने रोएगें, और पत्निी, बच्चे, कुछ समय ज्यादा तक रोएगें पर बाद में धीरे-धीरे वो भी भूल जाते है । मान लो कोई व्यक्ति मर गया दस साल बाद उसके बेटे से कहा जाये कि वैसे ही रो जब वो मरा था तो उसकी पत्निी की आँख से वैसे आँसू नहीं निकलेंगे जैसे जब वो मरा था । वो उसे भूल चुके है ये दुनिया की रीत है ।

 

पर गोपियों का प्रेम देखो तो भगवान कृष्ण के जाने के एक सौ पच्चीस साल बाद भी उसका प्रेम याद कम नहीं हुई बल्कि और बढी जितना रोती थी और कई गुना रोई तो सच्चा प्रेम वो है । जिसमें याद बढे कम न हो, बाकि सब तो मोह, आसक्तिी, बंधन है, तो हमें बाधतें है प्रेम से कहिए श्री राधे

 

इस दुनिया में जिसका जिससे जितना स्वार्थ है उतना ही प्रेम है, स्वार्थ खत्म, तो प्रेम भी खत्म, हो जाता है । यहीं तक सांसारिक प्रेम है, परमात्मा का प्रेम अलौकिक दिव्य है । गोपियों के प्रेम की तरह है । याद हो तो गोपियों के जैसे क्यों भगवान अपनी रानियों से ज्यादा राधा जी गोपियों को चाहते थे क्योंकि वो उन्हें याद  करती थी.

 

याद का मतलब दया है भगवान क्यों राधा जी पर इतनी दया कर रहे है । क्योंकि वो हर पल याद करती रहती है । जो उन्हें जितना याद करता है वो भी उतनी ही दया करते है । गोपियाँ खुद को भी भूल गई , कृष्ण तो प्रेम ही देते है और प्रेम ही लेते है, प्रेम ही खाते है, प्रेम ही पीते है । वो प्रेममय ही है । बस याद करने की जरूरत है तो हमें उनसे उनकी याद माँगनी है । तो ये कैसा याद करना है गोपियों की तरह.

 

प्रसंग ४- एक बार नारद जी बैकुण्ठ गए तो बाहर उन्होंने एक रजिस्टर देखा उसमें भक्तों की लिस्ट थी तो उसे खोल कर देखा तो उन्होंने देखा कि उनका नाम सबसे पहले था, तो वो बहुत खुश हुए. जब जाने लगे तो रास्ते में हनुमान जी मिले. और कहा कि मै भगवान के पास से आ रहा हॅ वहाँ भगवान के भक्तों की लिस्ट मे मेरा नाम सबसे उपर था और आपका तो था ही नही.

 

तो हनुमान जी कहते है-  कि मुझे इससे कोई मतलब नहीं कि मेरा नाम लिस्ट में ऊपर है कि नीचे है यह है कि नहीं. मै तो परमात्मा को याद कर रहा हूँ और उसका कृपा मुझ पर बरस रही है । मेरे लिए यहीं काफी और सोचने लगे अपने आप पर अहम हो गया कि मै सबसे बडा भक्त हू.

 

फिर कुछ समय बाद वो पुन: बैकुण्ठ गए, तो अंदर एक रजिस्टर और  रखा था तो उनकी इच्छा हुई इसे खोल कर देखे ये भी भक्तों का रजिस्टर है । तो उसे खोला तो उसमें उनका नाम ही नही था उसमें हनुमान जी का नाम था सबसे उपर, तो उन्होंने भगवान से पूछा कि ये क्या है । बाहर मेरा नाम सबसे ऊपर था अन्दर वाले में हनुमान जी का नाम है

 

तो भगवान ने कहा-  कि नारद जो बाहर वाला रजिस्टर है वो उन भक्तों का है जो मुझे याद करते है । और अंदर वाला रजिस्टर उन भक्तों का है जिन्हें मै याद करता हूँ । कहने का तात्पर्य है कि हम तो भगवान को याद करते है पर हमे उस स्तर का बनना है कि उसकी दया हमें पर विशेष रूप से बरसे, जब भगवान जिसे याद करे वो भक्त है ।

 

कहने का तात्पर्य है कि हम सब संसार में है । आदमी अपना कर्तव्य करता है । लोग कहते है कि समय नहीं है तो समय की जरूरत कहाँ है । बस हम काम करते जाएँ और भगवान का नाम लेते जाएँ तो हमें अपने काम में भगवान को नहीं भूलना है । वास्तव में वो याद ही भगवान की कृपा है । हमें भगवान को याद करना नहीं भूलना है । जो भी काम हो वो भगवान के लिए हो उसमें मोह और आकर्षण न हों । उससे हम दूर रहें. हम कोई भी काम करें तो वो भगवान के लिए ही करें, हर काम उनको ही अर्पण हो

तो हम कर्म के बंधन से मुक्त रहेगें, फिर लोभ में नहीं फसेंगे ये कब होगा जब हम हर पल भगवान को याद करेंगे. इस याद में ही सबकुछ छिपा है । हम घंटो मदिंर में पूजा में बैठे रहते है पर सिर्फ शरीर से मन तो हमारा और कहीं होता है । तो वो याद नहीं है फिर हम कहते है कि भगवान हमें याद नहीं करते है तो पहले हम याद करने का तरीका तो देखें हम किस तरह कर रहे है, फिर वो भी हम पर वैसे ही दया करेगा?

 

वो कहते है कि “दया ये क्या कम है घनश्याम प्यारे, जो चरणों में तेरे ठिकाना मिला, बडे भाग्यशाली है वो तेरे बंदे, जिन्हें आप से दिल लगाना मिला, वो क्या बागे जन्नत की परवाह करेगे, जिन्हें आप सा आशियाना मिला है “

 

भक्त तो वो है जो जन्नत की भी परवाह न करे, उन्हें स्वर्ग से कोई प्रयोजन ही नहीं है । क्योंकि उन्हें कृष्ण जैसा आशियाना मिला, ये उनकी दया है कि उनके चरणों में हमें ठिकाना मिला ये कम है क्या ? हजारों में से उसने हम पर दया की तो हम संसार से हटकर उनके श्री चरणों में जाकर मिले गए । ये दया है उनकी, तो बस उसकी दया और हमारी याद वो दोनों ही हमें परमात्मा तक पहुँचाएगीं ।

 

“राधे-राधे”   

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